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‘जे एंड के बैंक’ को आरटीआई, सीवीसी और राज्य विधानमंडल के दायरे में लाया गया

राज्यपाल सत्यपाल मलिक के इस फैसले को लेकर सियासी बयानबाज़ी तेज़ हो गई है. पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने कहा कि राज्य के विशेष दर्जे के कारण इस फैसले को रद्द करना चाहिए. वहीं केंद्रीय राज्यमंत्री डॉ. जितेन्द्र सिंह ने कहा कि राज्य की सत्ता में रहे कुछ परिवार बैंक को अपनी जागीर समझ दुरुपयोग करते आए हैं.

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‘जे एंड के बैंक’ (फोटो: ट्विटर)

 

जम्मू: जम्मू कश्मीर में ‘जे एंड के बैंक’ (जम्मू-कश्मीर बैंक) को सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम, मुख्य सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) के दिशानिर्देशों और राज्य विधानमंडल के दायरे में लाया गया है.

अधिकारी ने शुक्रवार को बताया कि जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक की अध्यक्षता में गुरुवार की शाम राज्य प्रशासनिक परिषद (एसएसी) की बैठक हुई, जिसमें ‘जे एंड के बैंक’ को सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (पीएसयू) के तौर पर मान्यता देने के प्रस्ताव को पारित कर दिया गया है.

एसएसी ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी कि जम्मू-कश्मीर सूचना का अधिकार अधिनियम, 2009 के प्रावधान अब पीएसयू के तहत आने वाले अन्य बैंकों की तरह ही जम्मू-कश्मीर बैंक पर भी लागू होंगे.

उन्होंने बताया कि इसके अलावा, बैंक को अब सीवीसी के दिशा-निर्देशों को भी मानना पड़ेगा.

उन्होंने बताया कि राज्य के अन्य पीएसयू की भांति ही ‘जे एंड के बैंक’ भी राज्य विधानसभा के प्रति जवाबदेह होगा. बैंक की वार्षिक रिपोर्ट को राज्य के वित्त विभाग द्वारा विधानसभा में पेश किया जाएगा.

पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने राज्यपाल से जम्मू-कश्मीर बैंक को सार्वजनिक उपक्रमों की श्रेणी में शामिल करने के अपने फैसले को रद्द करने की मांग की.

उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर बैंक को पीएसयू की श्रेणी में शामिल करना राज्य के विशिष्ट दर्जे को समाप्त करने की साजिश का एक हिस्सा है.

दैनिक जागरण की ख़बर के अनुसार, महबूबा ने कहा कि जम्मू-कश्मीर बैंक राज्य का एक स्वायत्त वित्तीय संस्थान है. राज्य प्रशासनिक परिषद की बैठक में लिया गया फैसला पूरी तरह से अनुचित है.

राज्य प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि बैंक की कार्यप्रणाली में उसका दखल देने का कोई भी इरादा नहीं है. बैंक के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर ही श्रेष्ठ हैं और यह उनकी स्वायत्त है. बैंक को पहले की तरह आरबीआई ही रेगुलेट करने का काम करेगा.

राज्य प्रशासनिक परिषद के फैसले का उद्देश्य बैंक की कार्यप्रणाली में बेहतर प्रशासन और पारदर्शिता लाना है. जम्मू-कश्मीर बैंक को आरटीआई के दायरे में लाना और सीवीसी के दिशा-निर्देश लागू करना सिर्फ पारदर्शिता लाना है.

बैंक राज्य विधानसभा को जवाबदेह होगा और इसकी वार्षिक रिपोर्ट राज्य विधानसभा में ही रखी जाएगी. बैंक में सही पारदर्शिता आरटीआई एक्ट लागू होने से आएगी. सभी प्रशासनिक और भर्ती नियम इससे जुड़े हुए हैं.

केंद्रीय राज्यमंत्री डॉ. जितेन्द्र सिंह ने कहा कि बैंक को राज्य की सत्ता में रहे कुछ परिवार इसे अपनी जागीर समझ दुरुपयोग करते आए हैं. राज्यपाल का यह फैसला वित्तीय संस्थानों में पारदर्शिता को बढ़ाने के केंद्र के फैसले के अनुरूप है.

सिंह ने आगे कहा, ‘चार दशकों से जम्मू-कश्मीर बैंक का लाभ सिर्फ राज्य के कुछ परिवारों को ही मिल रहा है. राज्यपाल को बैंक का आडिट कराकर, कर्ज न चुकाने वालों और गैर सत्यापित निवेशकों के नाम सार्वजनिक करने चाहिए. राज्यपाल के फैसले पर वहीं लोग हंगामा कर रहे हैं जिन्होंने बैँक का अनुचित लाभ लिया है. कुछ लोग जिनका प्रत्यक्ष आमदनी का जरिया नहीं है या नाममात्र की आमदनी है, रातों रात अमीर बन गए हैं. हिंदोस्तान में ही नहीं दुबई व यूरोप के मुल्कों में भी संपत्ति के मालिक बन गए हैं.’

(समाचार एजेंसी भाषा के इनपुट के साथ)