विज्ञान

क्या दो दशक पूर्व मुजफ्फरपुर में बच्चों की मौत लीची से हुई थी?

हाल ही में आए एक शोध में दावा किया गया है कि 1995 में मुजफ्फरपुर में हुई बच्चों की मौत का कारण लीची थी. हालांकि इस दावे पर तमाम सवाल उठ गए हैं.

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साभार : geishaboy500/Flickr

पिछले हफ्ते जबसे एक नामी मेडिकल जर्नल में प्रकाशित एक शोध में यह बात सामने आई कि 1995 में बिहार के मुजफ्फरपुर में फैली दिमागी बीमारी के लिए लीची फल जिम्मेदार था, तबसे लीची को लेकर शुरू हुई बहस रुकने का नाम ही नहीं ले रही है. शोध से जुड़े वैज्ञानिकों का दावा है कि उन्होंने बीस साल पहले इस बीमारी से हुई मौतों की वजह का पता लगा लिया है पर ऐसे कई सवाल हैं, जिनका जवाब अब तक मिलना बाकी है.

30 जनवरी, 2017 को जारी हुए लैंसेट ग्लोबल हेल्थ के जर्नल में भारत के राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) व अमेरिका के रोग नियंत्रण और निषेध सेंटर की संयुक्त जांच रिपोर्ट के परिणाम प्रकाशित किए गए हैं. रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने यह दावा किया है कि 1995 में मुजफ्फरपुर में फैली बीमारी, जिसमें ज्यादातर बच्चों ने अपनी जान गंवाई थी, का कारण पता लगा लिया है. उनके अनुसार इसकी वजह लीची में मौजूद कुछ टॉक्सिन यानी विषैले तत्व थे, जिन्हें खाली पेट खा लेने से बच्चे बीमार पड़े थे. इस बीमारी का प्रकोप हर साल देखने को मिलता है और ये वही समय होता है जब लीची आती है.

गौरतलब है कि लीची उत्पादन में मुजफ्फरपुर देश में सबसे आगे है. यहां काम कर रहे मजदूरों के बच्चे कई बार जमीन पर गिरी लीचियों से ही अपने भोजन की जरूरत पूरी करते हैं. पहले हुए कई अध्ययनों के अनुसार इस बीमारी का कारण लू लगना या बैट वायरस का संक्रमण भी हो सकता है.

हालांकि यह अध्ययन विवादों के घेरे में भी आ गया है. ऐसा कहा जा रहा है कि इस अध्ययन में डॉ. टी. जैकब जॉन और डॉ. मुकुल दास को उचित श्रेय नहीं दिया गया है. डॉ. जॉन और डॉ. दास ने पहले ही कुपोषित बच्चों को हुई इस रहस्यमय दिमागी बीमारी की वजह लीची में पाए जाने वाले विषैले तत्वों को बताया था. इस चूक का पता लगने पर इस जर्नल ने डॉ. दास से संपर्क साधने की कोशिश की है.

पर बड़ा सवाल यह है कि क्या हर साल फैलने वाली इस बीमारी का कारण वाकई में लीची ही है या इसके पीछे कोई और ही कहानी है?

लैंसेट के शोध में कहा गया है कि लीची में दो तरह के टॉक्सिन, हाइपोग्लाइसिन ए (एमपीसीए) और मिथायलीन साइक्लोप्रोपाइल ग्लाइसिन (एमसीपीजी) पाए जाते हैं. इससे मिलते उदाहरण पहले अफ्रीका और वेस्टइंडीज में भी देखे गए हैं. वहां पाए जाने वाले ‘एकी’ फल खाने पर लोगों में उल्टी की शिकायत देखी गई थी पर एकी में सिर्फ एक ही टॉक्सिन एमपीसीए पाया जाता है.

शोध में यह नहीं बताया कि कितनी खुराक लेने पर बुखार होगा?

मंगला हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर, बिजनौर (उ.प्र.) के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. विपिन वशिष्ठ ने डॉ. जैकब जॉन के विश्लेषण का दूसरा पहलू रखते हुए एक लेख लिखा है. द वायर से बात करते हुए उन्होंने बताया, ‘अधपके एकी फल में एमसीपीजी से ज्यादा एमपीसीए पाया जाता है, जो कि अधपकी कच्ची लीची में मिलने वाले एमपीसीए से कहीं कम है. एकी में एमपीसीए की मात्रा 1000 माइक्रोग्राम/ग्राम होती है वहीं अधपकी लीची में एमसीपीजी 18.5 से 152 माइक्रोग्राम/ग्राम तक होता है.’

वे आगे कहते हैं, ‘पकी हुई लीची में तो इसकी मात्रा और भी कम होती है. इसके अलावा एक बात ये भी है कि आज तक कहीं भी, किसी भी अध्ययन में ये बात सामने नहीं आई है कि लीची के गूदे में एमपीसीए पाया जाता है. इसी तरह कच्चे फल की तुलना में एमसीपीजी की मात्रा पके हुए फल में बहुत कम होती है. हां, एमपीसीए से हाइपोग्लाइसीमिया या कोई दिमागी बीमारी हो सकती है पर ये इस बात पर निर्भर करता है कि इसकी कितनी खुराक शरीर में पहुंची है. प्रस्तुत अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं ने कहीं यह नहीं बताया है कि बच्चों में इन टॉक्सिन से होने वाली यह दिमागी बीमारी, इन्हें कितनी मात्रा में लेने के बाद हुई. मान लीजिए कि हम अगर एमपीसीए की उतनी मात्रा (एलडी 50) जिसे घातक कहा जा रहा है, उसे चूहे पर प्रयोग करें, यानी 90-100 मिलीग्राम/किलोग्राम, तब हमें पता चलता है कि कोई बीमारी पनपने के लिए लीची की बहुत ज्यादा मात्रा की जरूरत होगी, जो कोई कुपोषित छोटा बच्चा नहीं खा सकता, और चलिए ये भी मान लीजिए कि उसने खा भी लिया तो इसे डायरिया होगा न कि कोई दिमागी बीमारी.’

जब बीमारी फैलती है तो कच्ची लीची नहीं मिलती

उन्होंने यह भी साफ किया कि जिस समय यह बीमारी फैलती है तब अधपकी या कच्ची लीची मिलने की संभावना भी काफी कम होती है. अक्सर जून के शुरुआती हफ्तों में यह बीमारी देखी गई है, पर अमूमन तब तक लीची की फसल अच्छी तरह से पक चुकी होती है. इसके अलावा शोधकर्ताओं ने मुजफ्फरपुर जिले के उस अस्पताल में भर्ती उसी उम्र के एक ऐसे बच्चे को चुना जिसे दिमाग संबंधी बीमारी नहीं थी. सही तो यह होता कि वो किसी एक घर (जहां बच्चे बीमार पड़े हों) या पास-पड़ोस के घर, या उस प्रभावित इलाके के आसपास के घरों से इस बीमारी के फैलने की विश्वसनीय जानकारी इकट्ठा करते.

उस पूरे क्षेत्र में रह रहे सैकड़ों बच्चे लीची खाते रहे होंगे. उन बच्चों के मूत्र में इन टॉक्सिन की जांच की जा सकती थी. ऐसा क्यों हुआ कि लीचियां तो सैकड़ों बच्चों ने खाईं पर यह दिमागी बीमारी सिर्फ एक-दो को ही हुई? क्या उन्होंने बाकियों से ज्यादा लीची खाई थीं? या उसकी वजह उनका कुपोषित होना था या फिर उनका लीची खा लेने के बाद खाना न खाना? क्या ऐसा भी हो सकता है कि कोई और ही वजह हो जिसका अब तक पता ही नहीं चल पाया है?

डॉ. वशिष्ठ ने इंडियन पीडियाट्रिक्स नाम के जर्नल में लिखे अपने लेख में यह भी कहा है कि हाइपोग्लाइसिन से हुई विषाक्तता के केस में इलाज के वक्त चढ़ाए गए ग्लूकोस से भी कोई मदद नहीं मिली. उम्मीद थी कि इसका असर मौत से बचाने में सहायक होगा पर यह भी मौतों को रोकने में नाकाम साबित हुआ. ऐसा सोचा गया था कि हाइपोग्लाइसिन इन्सुलिन की तरह ही काम करता होगा पर ऐसा नहीं था.

यह अध्ययन बताता है कि हाइपोग्लाइसीमिया यानी ब्लड शुगर का लेवल नीचे आ जाना इस सिंड्रोम का मुख्य लक्षण है. डॉ. वशिष्ठ बताते हैं, ‘बच्चों को होने वाली कुछ बीमारियों जैसे इन्सेफेलाइटिस, सेप्सिस, पेट के कुछ संक्रमण या निमोनिया में उनका ब्लड शुगर लेवल थोड़ा कम हो ही जाता है. अध्ययनकर्ताओं ने बताया है कि सामान्य खून में ग्लूकोज लेवल 2.66mmol/L होता है, यानी हाइपोग्लाइसीमिया का माइल्ड या हल्का असर. हाइपोग्लाइसीमिया का गंभीर असर जो एकी फल से हुई विषाक्तता की घटना के समय देखा गया था, वो यहां नहीं था.’

लीची और बीमारी में संबंध मुमकिन पर जरूरी नहीं

वे आगे बताते हैं, ‘इसके अलावा हाइपोग्लाइसिन ए से लीवर, दिमाग, और किडनी जैसे कई अंगों के टिश्यू (ऊतक) प्रभावित होते हैं, पर यहां इन मामलों में कहीं भी लीवर से जुड़ी किसी तकलीफ की शिकायत नहीं देखी गई. लीवर बिल्कुल ठीक से काम कर रहा था. और एक महत्वपूर्ण बात यह कि हाइपोग्लाइसिन ए की विषाक्तता का एक प्रमुख लक्षण उल्टी होना है पर किसी रिपोर्ट में किसी मरीज को उल्टी होने की बात नहीं कही गई. वैसे लैंसेट ने इस अध्ययन में यह भी लिखा है कि हमारे शोध के निष्कर्ष के अनुसार लीची और बीमारी के बीच में संबंध मुमकिन तो है पर जरूरी नहीं है कि यही आखिरी सच हो.’

इसके इतर, हालांकि राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र, मुजफ्फरपुर के वैज्ञानिक लैंसेट की इस रिपोर्ट को खारिज कर रहे हैं. यहां के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक सुशील कुमार पुरबे ने ‘द एशियन एज’ से बात करते हुए इस अध्ययन को ‘अधूरा और विरोधाभासी’ बताया है. उन्होंने यह भी कहा कि वे इस अध्ययन से जुड़े शोधकर्ताओं को इस रिपोर्ट पर जवाब भेजने की सोच रहे हैं.

मुजफ्फरपुर के एसके मेडिकल कॉलेज में बाल रोग विभाग के प्रो. बृजमोहन के अनुसार, ‘कम ग्लूकोज की वजह से जिन बच्चों की जान गई थी, वे कुपोषण के शिकार थे. अब तो बीमार बच्चों की संख्या में खासी गिरावट देखी गई है. साल 2016 में तो सिर्फ 60 बच्चे ही अस्पताल में भर्ती हुए थे. उन्होंने अंग्रेजी वेबसाइट स्क्रॉल डॉट इन से बातचीत में कहा, ‘बच्चे तो अब भी लीची खा रहे हैं, पर अब तो कोई बीमार नहीं पड़ रहा. इस बीमारी के बारे में बहुत कुछ है जो अभी सामने नहीं आया है.’

बहरहाल इस अध्ययन के आने से लीची को लेकर आम जनता के मन में संशय तो आ ही गया है. हो सकता है जैसा प्रो. बृजमोहन कह रहे हैं वैसा हो, इस मामले का कोई पहलू हो जिस पर अभी किसी की नजर न पड़ी हो. इस मामले पर और शोध होना चाहिए. आखिर पता तो चले जिस बीमारी ने इतनी जानें लीं, उसका कारण क्या है.