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मध्य प्रदेश: आदिवासियों के लिए लोकसभा चुनाव में जंगल पर अधिकार प्रमुख मुद्दा है

मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में हाल ही में प्रदर्शन कर आदिवासियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल पूछा कि सुप्रीम कोर्ट में वन अधिकार क़ानून पर सुनवाई के दौरान उनकी सरकार मौन क्यों थी?

मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में आदिवासियों की रैली में शामिल लोग. (फोटो: अनुराग मोदी)

मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में आदिवासियों की रैली में शामिल लोग. (फोटो: अनुराग मोदी)

बीते एक अप्रैल को मध्य प्रदेश के बुरहानपुर ज़िला मुख्यालय पर जागृत आदिवासी दलित संगठन के बैनर तले आयोजित ‘चेतावनी रैली’ में इकट्ठा हुए पांच हज़ार आदिवासी एवं अन्य संगठनों के प्रतिनिधियों के तेवर से यह साफ़ था कि वर्तमान लोकसभा चुनाव में जंगल पर आदिवासियों के अधिकार का मुद्दा उनके लिए एक प्रमुख चुनावी मुद्दा होगा.

इन संगठनों ने कांग्रेस और भाजपा से वन अधिकार के मुद्दे पर अपना पक्ष साफ़ करने को कहा है. ‘वोट हमारा-राज तुम्हारा नहीं चलेगा’ का नारे देते हुए आदिवासियों ने कहा कि अब आदिवासी चुपचाप आंख बंदकर अपना वोट नहीं देंगे.

इस आंदोलन से जुड़े जन संगठनों के प्रतिनिधियों का कहना था कि पिछले दो माह में हुई कुछ घटनाओं से ऐसा लगता है कि आदिवासियों से उनका जंगल हमेशा के लिए छीनने के लिए अंग्रेज़ों के समय से भी बड़ी साज़िश की जा रही है.

इतने सालो से वो जिस बात के लिए डर रहे थे, वो चुनाव के ठीक पहले सच्चाई बनकर उनके सामने खड़ी नज़र आ रही है.

असल में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले जंगल को लेकर दो फैसलों में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की भूमिका ने इन आदिवासियों को उद्वेलित कर दिया है.

पहला है, वन अधिकार क़ानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई में केंद्र सरकार द्वारा समय पर आदिवासियों का पक्ष नहीं रखे जाने के चलते फरवरी माह में आया सुप्रीम कोर्ट का आदेश.

इसके तहत वन अधिकार क़ानून के अंतर्गत पेश दावों को ख़ारिज कर 12 लाख आदिवासियों की बेदख़ली होना था. और दूसरा, चुनाव की घोषणा के ठीक पहले 7 मार्च को वन कानून, 1927 में संशोधन का प्रस्ताव. हालांकि, दोनों ही मामले में फ़िलहाल कोई कार्यवाही नहीं होगी; क्योंकि, एक तो केंद्र सरकार की अंतरिम याचिका के चलते सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई माह तक बेदख़ली के अपने ही आदेश पर रोक लगा दी है. दूसरा, वन क़ानून में परिवर्तन चुनाव के बाद ही संभव होगा.

बुरहानपुर में रैली के बाद हुई आमसभा में जन संगठनों के प्रतिनिधियों ने साफ़ कहा कि असल में सरकार जंगल में आदिवासियों को कुछ छोटे-मोटे अधिकार देने का नाटक कर सारा जंगल निजी हाथों में सौंपने की ताक में थी. इसलिए चुनाव के हो हल्ले की बीच सरकार वन क़ानून, 1927 में ऐसे परिवर्तन ला रही है, जो आदिवासी का जंगल में रहना मुश्किल कर देगी और उन्हें फिर से गुलामी के तरफ धकेलेगी.

इसलिए, न सिर्फ़ चुनाव के दौरान बल्कि चुनाव के बाद भी देशभर के आदिवासी संगठनों को एक लंबी लड़ाई की तैयारी करना होगी.

वक्ताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से यह सवाल पूछा कि सुप्रीम कोर्ट में वन अधिकार क़ानून पर सुनवाई के दौरान उनकी सरकार मौन क्यों थी? अगर वो पहले ही पूरी तरह से सही बात कोर्ट के सामने रखती तो बेदख़ली का यह आदेश नहीं आता. मोदी जी को आदिवासियों और वन अधिकार क़ानून के पक्ष में बोलना चाहिए था.

वक्ताओं ने मोदीजी से यह भी सवाल किया कि चुनाव की घोषणा के ठीक दो दिन पहले उनकी सरकार ने वन क़ानून, 1927 में अंग्रेज़ों को भी शर्मसार करने वाले प्रावधान प्रस्तावित क्यों किए किए?

और, मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार से भी पूछा गया कि वे इस पर क्यों मौन हैं? वो उनकी ही यूपीए सरकार द्वारा लाए गए वन क़ानून, 2006 का सही-सही पालन सुनिश्चित करवाने के लिए कोई कार्ययोजना अब तक क्यों नहीं पेश कर पाए? आज जब कांग्रेस के 41% विधायक आरक्षित वर्ग से है तब उन्हें मज़बूती के साथ आदिवासियों के पक्ष में खड़े होने के लिए चेताया गया.

रैली से मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के नाम प्रेषित ज्ञापन में पूरजोर मांग की गई कि उनकी सरकार सुप्रीम कोर्ट में मज़बूती के साथ आदिवासियों के पक्ष में खड़ी हो, वन अधिकार क़ानून को पूरी तरह लागू करवाए, ग्राम सभाओं के हक़ों का हनन न हो.

इसके अलावा उद्योग और विनाशकारी परियोजनाओं को वन भूमि न दी जाए, वन विभाग के संरक्षण में चल रही वनों कटाई पर रोक लगे और स्थानीय समुदायों के टिकाऊ उपयोग के अलावा जंगलों पर कोई भार न पड़े. इसके अलावा वन क़ानून, 1927 में प्रस्तावित बदलाव के ख़िलाफ़ भी वो खड़े हों.

Tribal Protest Madhya Pradesh

मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में आदिवासियों द्वारा निकाली गई रैली. (फोटो: अनुराग मोदी)

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने बीते 13 फरवरी को वन अधिकार कानून 2006 के तहत अपात्र पाए गए वन भूमि के दावेदारों को बेदख़ल करने का आदेश दिया था, जो 28 फरवरी को फ़िलहाल जुलाई तक स्थगित किया गया.

मध्य प्रदेश के 3.5 लाख से ज़्यादा आदिवासियों पर वनभूमि से बेदख़ली का ख़तरा मंडरा रहा है. जबकि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के बेदख़ली के आदेश के बाद दायर अंतरिम याचिका में यह माना है कि दावे को तय करने की प्रक्रिया सही ढंग से नहीं हुई है एवं जिनके दावे ख़ारिज हुए उन्हें सुना भी नहीं गया.

आदिवासियों ने कहा कि वन अधिकार कानून, 2006 की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं. इस क़ानून में ग्राम सभाओं को वन अधिकार के दावों का जांच कर पात्रता तय करने का हक़ है, पर ग्राम सभाओं के बैठने के पहले ही या ग्राम सभाओं के प्रस्तावों को नज़रअंदाज़ कर वन विभाग एवं जिला प्रशासन द्वारा दावों को अपात्र बताया जा रहा है.

आदिवासियों के अनुसार, सामुदायिक वन अधिकार कहीं पर नहीं दिए जा रहे है. रैली में आदिवासियों ने बताया कि किस तरह पीढ़ियों से उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है, उनको अपने घर और खेत से उजाड़ा गया है, उनके घर जलाए गए हैं, महिलाओं और बच्चों के साथ मारपीट कि गई है, उन्हें जेल में बंद किया गया है, उनके खेत नष्ट किए गए हैं और मवेशी ज़ब्त किए गए हैं.

वन अधिकार क़ानून के तहत यह सब प्रतिबंधित है पर क़ानून के पारित होने के बाद भी ये सिलसिला जारी है और इस आतंक के ख़िलाफ़ सभी नेता और प्रशासन मौन हैं.

रैली में यह भी सवाल उठाया गया कि जंगलों के असली दुश्मन कौन है? हाल ही में संसद में 2016 में पेश जानकारी के अनुसार, हर वर्ष लगभग 67,000 एकड़ (लगभग 25,000 हेक्टेयर) वन भूमि किसी परियोजना के कार्यों के लिए हस्तांतरित किया जाता है.

संसदीय स्टैंडिंग कमेटी में पेश जानकारी के अनुसार पिछले 5 वर्षों में ही लगभग 2 लाख 15 हज़ार एकड़ (86,89.09 हेक्टेयर) वन भूमि उद्योग और परियोजनाओं को दी गई.

साथ ही आदिवासी वक्ताओं ने एक उदाहरण देते हुए कहा कि कैसे सरकार जंगल को हमेशा के लिए मिटाती है.

वक्ताओं ने बताया कि जब आदिवासी ज़रूरी घरेलू उपयोग के लिए लकड़ी लेता है, तो वो कुल्हाड़ी से काटता, जिससे उस कटे हुए ठूंठ से पुन: नया पेड़ उगता है. मगर, वन विभाग आरे से पेड़ की कटाई करता है, इसलिए उसके घिसाव से पेड़ की पुरुत्पादन की क्षमता नष्ट हो जाती है और पेड़ फिर से उग नहीं पाता.

वक्ताओं ने आरोप लगाया कि केंद्र की भाजपा सरकार सारा जंगल निजी कंपनियों को देने की तैयारी कर रही है.

वक्ताओं ने कहा कि हाल ही में, छतीसगढ़ में चार लाख एकड़ जंगल अडाणी से जुड़ी कंपनी को कोयला निकालने के लिए दिया जा चुका है. बाकी जंगल पर्यावरण बचाने के नाम पर दिया जाएगा. इसलिए सरकार आदिवासियों और जंगल में रहने वाले बाकी लोगों की रोज़मर्रा की ज़रूरतों को भी अपराध बनाकर उन्हें जेल में डालने और भारी जुर्माने ठोकने की तैयारी कर रही है.

रैली में बुरहानपुर के औद्योगिक क्षेत्र और नेपा मिल द्वारा जंगल में किए जा रहे भारी नुकसान की भी तीखी आलोचना की गई.

‘जंगल नहीं बिकेगा, कोई नहीं हटेगा’, ‘वन अधिकार क़ानून लागू करो’, ‘आज़ाद देश में अंग्रेज़ों का कानून नहीं चलेगा’, ‘आदिवासी लड़ेगा, पीछे नहीं हटेगा’ जैसे नारों से शहर को गूंजा दिया.

रैली में लोक संघर्ष मोर्चा (महाराष्ट्र), समाजवादी जन परिषद, श्रमिक आदिवासी संगठन, शहरी मज़दूर संगठन, किसान आदिवासी संगठन एवं जागृत आदिवासी दलित संगठन शामिल थे.

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं.)