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पश्चिम बंगाल: सुंदरबन का एक द्वीप, जहां लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया गया है

ग्राउंड रिपोर्ट: पश्चिम बंगाल का घोड़ामारा दुनिया के सबसे बड़े मैंग्रूव फॉरेस्ट में गिने जाने वाले सुंदरबन डेल्टा का एक टापू है. पहले यह 8 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ था लेकिन बीते चार दशकों में नदी के कटाव से सिकुड़ते इस टापू के लोगों के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है.

घोड़ामारा द्वीप के अस्तित्व पर मंडराते संकट की कई वजहें हैं, जिनमें एक वजह जलवायु परिवर्तन भी है. (फोटो: उमेश कुमार राय)

घोड़ामारा द्वीप कभी आठ वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ था, लेकिन आज यह चार वर्ग किलोमीटर का रह गया है. (फोटो: उमेश कुमार राय)

घोड़ामारा द्वीप/सुंदरबन (पश्चिम बंगाल): लॉट नंबर आठ (जेटी का नंबर जहां से नावें खुलती हैं) से दिन की आखिरी लॉन्च जब घोड़ामारा द्वीप के लिए खुलती है, तो एक तख्ती लटका दी जाती है. तख्ती में सफेद चॉक से कुछ समय दर्ज होते हैं.

ऐसी ही तख्ती घोड़ामारा द्वीप की कुछेक दुकानों व ऐसी जगहों पर भी झूलती हुई मिलती हैं, जहां ज्यादा से ज्यादा लोग जुटते हैं. दरअसल, तख्ती में टापू में रहनेवाले लोगों के लिए आपात सूचना दर्ज होती है. यही सूचना अगले दिन लोगों की दिनचर्या तय करती है.

घोड़ामारा लौट रही अंतिम लॉन्च में सवार तीन दर्जन से ज्यादा लोग इस सूचना को अपने मन के कागज पर दर्ज कर लेते हैं. तख्ती में दर्ज है, घोड़ामारा से पहली लॉन्च सुबह 6 बजे खुलेगी. यानी अगर किसी को मेनलैंड पर जाना हो, तो सुबह छह बजे से पहले नहीं जा सकता है. इसी तरह तख्ती में टापू में लौट आने का वक्त है शाम 5:30 बजे. मतलब कि शाम 5:30 बजे लॉट नंबर आठ से घोड़ामारा के लिए आखिरी लॉन्च खुलेगी.

घोड़ामारा दुनिया के सबसे बड़े मैंग्रूव फॉरेस्ट में गिने जाने वाले सुंदरबन डेल्टा का एक टापू है. सुंदरबन पश्चिम बंगाल के उत्तर व दक्षिण 24 परगना जिले से लेकर बांग्लादेश तक फैला हुआ है. कोलकाता से टापू तक पहुंच में करीब पांच घंटे लगते हैं. काकद्वीप (लॉट नंबर आठ) से 45 मिनट तक पानी से होकर सफर करना पड़ता है, तब जाकर आता है यह द्वीप.

पश्चिम बंगाल के हिस्से के सुंदरबन में करीब 100 द्वीप हैं. इनमें से करीब 54 द्वीपों पर लोग रहते हैं. इन्हीं 54 द्वीपों में से एक घोड़ामारा भी है. यहां की आबादी करीब पांच हजार है और वोटरों की संख्या 3600 है.

वर्ष 2015 में इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) ने 10 साल के सैटेलाइट डेटा का विश्लेषण कर बताया था कि सुंदरबन में 9990 हेक्टेयर भूखंड कटाव के कारण पानी में चला गया है.

घोड़ामारा द्वीप की बात करें तो पहले यह 8 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ था और यहां के लोग अपनी जिंदगी को लेकर बेफिक्र रहा करते थे, लेकिन बीते चार दशकों से लगातार सिकुड़ते इस टापू ने लोगों के माथे पर शिकन की लकीरें गहरी कर दी हैं.

शोध बताते हैं कि वर्ष 2012 तक घोड़ामारा का क्षेत्रफल सिमटकर 4.43 वर्ग किमी रह गया है और अगर इसी तरह टापू नदी की आगोश में आता रहा, तो डेढ़-दो दशकों में इसका वजूद खत्म हो जाएगा.

घोड़ामारा द्वीप मथुरापुर संसदीय क्षेत्र में आता है. इस सीट पर दस बार माकपा ने जीत दर्ज की और दो बार कांग्रेस ने.

वर्ष 2009 से तृणमूल के वरिष्ठ नेता चौधरी मोहन जटुआ यहां से सांसद हैं. इस बार भी तृणमूल कांग्रेस ने उन्हें ही टिकट दिया है. माकपा की तरफ से डॉ. शरत चंद्र हाल्दार, भाजपा की तरफ से श्यामाप्रसाद हाल्दार मैदान में हैं. कांग्रेस ने कृतिबास सरदार को उम्मीदवार बनाया है.

देशभर में चुनावी सरगर्मी के बावजूद यहां के लोग चुनाव की जगह अपनी दुश्वारियों पर ज्यादा बात करना चाहते हैं.

टापू के पूरब की तरफ हुगली नदी के किनारे से कुछ मीटर दूर 49 वर्षीय निताई घड़ाई परचून की एक छोटी-सी दुकान चलाते हैं. वह साल-दर-साल नदी को अपनी तरफ बढ़ता हुआ देख रहे हैं.

निताई घड़ाई के दादा की 70 बीघा जमीन थी. पूरी जमीन नदी के कटाव की भेंट चढ़ गई. (फोटो: उमेश कुमार राय)

निताई घड़ाई के दादा की 70 बीघा जमीन थी. पूरी जमीन नदी के कटाव की भेंट चढ़ गई. (फोटो: उमेश कुमार राय)

उनकी दुकान से थोड़ी दूर शीतला मंदिर है जिसका एक हिस्सा पूरी तरह नदी में समा चुका है. पास ही एक विशाल पेड़ था, मिट्टी के कटाव से वह पेड़ भी गिर चुका है.

निताई बताते हैं, ‘40 साल पहले नदी का किनारा करीब एक किलोमीटर दूर था. उस वक्त हम लोगों को किनारे तक जाने के लिए एक घंटे तक पैदल चलना पड़ता था. अब तो 500 मीटर से भी कम दूरी रह गई है.’

निताई की दुकान जिस तरफ है, उसी तरफ घोड़ामारा का खासीमारा मौजा (बांग्ला में मोहल्ले को मौजा कहा जाता है) हुआ करता था. खासीमारा मौजा 8.73 हेक्टेयर में फैला हुआ था. अभी यह खत्म हो चुका है. इसी तरह यहां 910 हेक्टेयर का एक और मौजा हुआ करता था लोहाचारा. यह मौजा भी नदी की भेंट चढ़ चुका है.

निताई घड़ाई बताते हैं कि यहां कभी बहुत बड़ा बाजार लगा करता था, जहां जरूरत का सभी सामान मिल जाता था, लेकिन अब सब पानी में चला गया है.

वे कहते हैं, ‘मेरे दादाजी की यहां 70 बीघा जमीन थी. अभी हमारे पास एक बित्ता भी जमीन नहीं है. परचून की दुकान के भरोसे ही मेरा परिवार चलता है.’

निताई घड़ाई की कहानी इकलौती नहीं है. यहां रहने वाला शायद ही कोई परिवार होगा जिसकी जमीन नदी ने न लील ली हो. स्थानीय लोग बताते हैं कि फिलवक्त यहां की 90 प्रतिशत से ज्यादा आबादी गरीबी में है क्योंकि उनके पास खेती के लिए भी अपनी जमीन नहीं है.

70 वर्षीय शेख अफताब उद्दीन के पास भी कभी सैकड़ों बीघा जमीन थी. अब वो भी भूमिहीन हैं. मायूस अफताब उद्दीन कहते हैं, ‘हमारे पास अब अपनी जमीन नहीं है. यहां रोजगार भी नहीं है और दिन-ब-दिन नदी हमारी तरफ बढ़ रही है. सरकार अगर हमारा पुनर्वास करेगी, तभी हम बचे रह सकेंगे. वरना तो हमारी जिंदगी में अंधेरा ही अंधेरा है.’

सुंदरबन वैश्विक धरोहर के रूप में दर्ज है. घोड़ामारा द्वीप पर ईस्ट इंडिया कंपनी के कारिंदों की आमद करीब 200 साल पहले हुई थी. स्थानीय लोग इस द्वीप के नामकरण को लेकर एक दंतकथा सुनाते हैं.

करीब 250 साल पहले एक अंग्रेज घोड़ा लेकर यहां आया था. उसने घोड़े को एक पेड़ से बांध दिया और कहीं चला गया. कुछ देर बाद जब वह लौटा तो देखा कि घोड़ा मरा पड़ा है.

चूंकि, सुंदरबन आदमखोर रॉयल बंगाल टाइगर का ठिकाना था (अब भी है), तो समझा गया कि बाघ ने ही घोड़े को मार डाला होगा. उसी वक्त से इस द्वीप का नाम घोड़ामारा (घोड़े की मौत) हो गया.

सुंदरबन में सबसे पहला पोस्ट ऑफिस घोड़ामारा में ही खुला था. दस्तावेजों से पता चलता है कि पोस्ट ऑफिस महज एक दिखावा था. अंग्रेज असल में इस पोस्ट ऑफिस का इस्तेमाल जासूसी के लिए करते थे. इसी पोस्ट ऑफिस से बाहरी जहाजों पर नजर रखी जाती थी. कई दशक पहले ये पोस्ट ऑफिस भी कटाव की जद में आ गया.

साढ़े चार दशकों से ये टापू क्यों पानी की आगोश में समा रहा है, इसका जवाब यहां रहने वाले हर शख्स के पास है और उन्हें ये भी बखूबी मालूम है कि इसमें उनकी कोई भूमिका नहीं है.

नदी के कटाव के कारण घोड़ामारा द्वीप पर स्थित शीतला मंदिर का एक हिस्सा पूरी तरह ढह चुका है. (फोटो: उमेश कुमार राय)

नदी के कटाव के कारण घोड़ामारा द्वीप पर स्थित शीतला मंदिर का एक हिस्सा पूरी तरह ढह चुका है. (फोटो: उमेश कुमार राय)

दरअसल, घोड़ामारा के अस्तित्व पर मंडरा रहे संकट की कई वजहें हैं. इनमें से दो वजहों पर काफी चर्चा हुई है और अब भी गाहे-ब-गाहे हो रही है.

एक वजह है जलवायु परिवर्तन के चलते बढ़ता जलस्तर और दूसरी बड़ी वजह है मालवाही जहाजों की बेतहाशा आवाजाही.

70-80 के दशक की बात है. तब हल्दिया बंदरगाह तक मालवाही जहाजों की खूब आवाजाही हुआ करती थी, लेकिन कुछ समय बाद ही पुराने रूट में मुश्किलें आने लगीं. इस मुश्किल का हल ये निकाला गया कि हुगली नदी से होकर जहाजों की आमदरफ्त की जाए.

हुगली नदी से जहाज लाने और ले जाने से आसपास पड़ने वाले प्रभावों का मुआयना करने के लिए डच की एक कंपनी की मदद ली गई. जहाजों को जिस नए रूट से गुजरना था, उसी रूट में घोड़ामारा टापू भी था.

डच कंपनी ने पड़ताल कर बताया कि जहाजों की आवाजाही से नदी के पानी में हरकतें तेज होंगी, जिससे कटाव बढ़ेगा और द्वीपों पर खतरा मंडराएगा.

डच कंपनी ने इस समस्या का हल भी बताया था. उसने सात द्वीपों में गाइड वाल लगाने का सुझाव दिया. मगर सरकारी कामकाज का अपना तरीका होता है, तो इस मामले में भी वही तरीका अपनाया गया. सात में से महज एक द्वीप नयाचर में गाइड वाल लगाया गया.

नतीजतन जहाज के वेग से नदी ने घोड़मारा द्वीप को धक्का मारना शुरू किया किया जिससे कटाव बढ़ने लगा.

जादवपुर विश्वविद्यालय के समुद्र विज्ञानी तुहिन घोष कहते हैं, ‘जहाजों की आवाजाही ने घोड़ामारा को बहुत नुकसान पहुंचाया है.’

घोड़ामारा के लगातार सिकुड़ने की एक दूसरी वजह जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र के जलस्तर में इजाफा है. सुंदरबन में बहुत-सी नदियां बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं, इसलिए समुद्र में जलस्तर बढ़ने से नदियों का जलस्तर भी बढ़ रहा है.

समुद्र के जलस्तर में इजाफा मुख्य रूप से कार्बन उत्सर्जन के कारण हो रहा है. कार्बन उत्सर्जन के कारण वैश्विक तापमान बढ़ रहा है, जिससे ग्लेशियर तेजी से पिघलने लगा है और इसकी वजह से समुद्र का जलस्तर बढ़ता जा रहा है.

कार्बन उत्सर्जन से संबंधित आंकड़े बताते हैं कि चीन, अमेरिका, यूरोपीय संघ और भारत सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करता है. पिछले साल दिसंबर में जारी ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट की रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनियाभर में जितना कार्बन निकलता है, उसमें 58 प्रतिशत हिस्सेदारी इन देशों की है.

शमशुल साहा तीन-चार महीने केरल में मजदूरी करते हैं और बरसात में अपने घर लौट कर मछलियां पकड़ते हैं. (फोटो: उमेश कुमार राय)

शमशुल साहा तीन-चार महीने केरल में मजदूरी करते हैं और बरसात में अपने घर लौट कर मछलियां पकड़ते हैं. (फोटो: उमेश कुमार राय)

विशेषज्ञ बताते हैं कि कार्बन उत्सर्जन में भारत के अन्य हिस्सों का चाहे जो किरदार हो, घोड़ामारा में तो कार्बन उत्सर्जन शून्य है क्योंकि यहां कोयले का कोई इस्तेमाल नहीं है. यहां के घरों में रोशनी सौर ऊर्जा से होती है और गाड़ियों के नाम पर इक्का-दुक्का मोटरसाइकिलें हैं.

यहां रहने वाले लोग सवाल करते हैं कि जलवायु परिवर्तन में उनकी कोई भूमिका नहीं है, फिर वे क्यों इसका दुष्परिणाम झेलने को अभिशप्त हैं. लेकिन, उनका सवाल चार किलोमीटर की परिधि में दम तोड़ देता है.

ऊपर बताई गई दो वजहों के अलावा घोड़ामारा पर बढ़ते संकट की एक तीसरी वजह भी है, जिस पर बात नहीं होती है.

जानकारों का कहना है कि हुगली नदी, जिससे यह द्वीप घिरा हुआ है, अपने मूल मार्ग से खिसक रही है. हुगली नदी पूरब की तरफ जा रही है. चूंकि घोड़ामारा उसके नए मार्ग में आ रहा है, तो कटाव का असर यहां ज्यादा दिख रहा है.

बहरहाल, घोड़ामारा में लगातार हो रहे कटाव के चलते पिछले 20 से 25 सालों में सैकड़ों परिवार अपना पुश्तैनी घर-बार छोड़ कर सागरद्वीप व काकद्वीप चले गए. कुछ परिवारों को पूर्ववर्ती वाममोर्चा और कांग्रेस सरकार ने ही अन्यत्र बसा दिया है.

यहां वही लोग अब तक ठहरे हुए हैं, जिनके पास दूसरी जगह जमीन लेकर रहने की आर्थिक हैसियत नहीं है.

शेख आफताब उद्दीन कहते हैं, ‘जिनके पास पैसा था, संसाधन था, वे चले गए. जो असहाय हैं, वे यहां पड़े हुए हैं.’

यहां खेती करने लायक जमीन कुछेक लोगों के पास ही है. बाकी लोग इन खेतों में ही मजदूरी करते हैं. मेनलैंड से उनका संपर्क नदी के रहम-ओ-करम पर है, क्योंकि लॉन्च का आना-जाना ज्वार-भाटा पर निर्भर है.

घोड़ामारा में 946 लोगों का मनरेगा जॉब कार्ड बना है जिसके तहत हर वर्ष 100 दिनों का रोजगार मिलता है, लेकिन केंद्र सरकार की तरफ से समय पर पैसा नहीं मिल रहा है. ये बात पंचायत प्रधान संदीप सागर भी मानते हैं.

रोजगार के अवसरों की किल्लत से यहां पलायन भी खूब हो रहा है. स्थानीय लोगों की मानें, तो घोड़ामारा के कम से कम 300 लोग केरल में कंस्ट्रक्शन साइट पर मजदूरी करते हैं.

46 वर्षीय शमशुल साहा पहले घोड़ामारा के पूर्वपाड़ा मोहल्ले में रहते थे. नदी के कटाव में उनका मोहल्ला बह गया, तो वह बाजार की तरफ आ गए और सरकारी जमीन पर झोपड़ी डाल दी.

वह हर साल तीन-चार महीने तक केरल में मजदूरी करते हैं. वहां एक दिन के 500 रुपये मिलते हैं, इसलिए लोग केरल जाना पसंद करते हैं.

शमशुल बताते हैं, ‘सर्दी के तीन-चार महीने केरल में बिताते हैं. केरल में हम लोग एक कमरे में कम से कम चार लोग रहते हैं, ताकि किराया कम लगे. बारिश का सीजन हम घोड़ामारा में ही बिताते हैं.’

(फोटो: उमेश कुमार राय)

(फोटो: उमेश कुमार राय)

बारिश में हुगली नदी में बंगालियों की सबसे पसंदीदा हिल्सा मछली की आमद होती है, जो सबसे महंगी बिकती है. इसलिए लोग इस मौसम में यहीं रह कर हिल्सा पकड़ते हैं. हालांकि, उनका कहना है कि इसमें भी मेहनत ज्यादा है और कमाई कम.

शमशुल समझाते हैं, ‘हिल्सा मछली को पकड़ने जाने के लिए सात लोगों की जरूरत पड़ती है. हम लोग नाव लेकर सुबह 7 बजे निकलते हैं. एक बार जाल को फेंकते हैं, तो उसे 4-5 घंटे बाद निकालते हैं. इसके बाद दोबारा फेंकते हैं. दिनभर में दो बार ही जाल डाल पाते हैं. जिन सात लोगों को साथ ले जाते हैं, उन्हें रोज का 300 रुपये और एक वक्त का भोजना देना पड़ता है. मछलियां पकड़ाएं या नहीं.’

उन्होंने कहा, ‘एक दिन में औसतन पांच किलो मछलियां पकड़ लेते हैं. तीन चार महीने में लगभग 1 लाख रुपये की मछली बिकती है और 15-20 हजार रुपये की कमाई हो जाती है.’

शमशुल के घर में पांच सदस्य हैं. उन्होंने कहा, ‘मेरा बेटा मजदूरी करता है और मैं कभी यहां आकर हिल्सा पकड़ता हूं, तो कभी केरल जाकर ईंट-बालू ढोता हूं. जिंदगी ऐसे ही कठिन दौर से गुजर रही है. उस पर नदी के कटाव ने मुश्किल और बढ़ा दी है.’

घोड़ामारा में रोजी-रोजगार का टोटा तो है ही बुनियादी सहूलियतें भी मुकम्मल नहीं हैं. अस्पताल के नाम पर एक अदद हेल्थ सेंटर है, जहां आपात स्थिति से निपटने के लिए कोई संसाधन नहीं हैं.

घोड़ामारा पानी से घिरा हुआ है और शाम के बाद नाव का चलना खतरे से खाली नहीं होता है, ऐसे में अगर रात में किसी को कुछ हो जाए, तो रात के गुजर जाने के इंतजार के सिवा कोई उपाय नहीं बचता.

स्थानीय लोगों ने बताया कि यहां जब महिलाएं प्रेग्नेंट होती हैं, तो डिलिवरी की अनुमानित तारीख से करीब महीने भर पहले ही मेनलैंड में चले जाते हैं और किराये पर कमरा लेकर महिला को रखते हैं. ताकि आपात स्थिति में तुरंत अस्पताल पहुंच सकें.

शैक्षणिक संस्थान के नाम पर एक प्राइमरी स्कूल है. प्राइमरी से आगे की पढ़ाई के लिए बच्चों को नाव की सवारी कर काकद्वीप या अन्यत्र जाना पड़ता है.

दिलचस्प बात ये है कि पश्चिम बंगाल में सुंदरबन के विकास के लिए ढाई दशक से एक अलग विभाग चल रहा है, मगर अस्तित्व के संकट से जूझ रहे टापू को चलाने के लिए कोई एहतियाती कदम अब तक नहीं उठाया गया है.

इस विभाग के मौजूदा मंत्री मंटुराम पाखिरा से जब पूछा गया कि घोड़ामारा द्वीप को बचाने के लिए क्या किया गया, तो वह इतना ही कह पाए कि हमारी सरकार ने बहुत काम किया है और अब भी कर रही है.

उनकी नजर में पश्चिम बंगाल की मौजूदा तृणमूल कांग्रेस सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि ये है कि उसने पूर्ववर्ती वाममोर्चा सरकार के समय में ‘नो मेंस लैंड’ घोषित घोड़ामारा द्वीप को उस टैग से बाहर निकाला.

मगर, घोड़ामारा के लोग अपने द्वीप को सिर्फ ‘नो मेंस लैंड’ टैग से नहीं, बल्कि उस संकट से भी बाहर निकलना चाहते हैं, जिसके चलते रात-बिरात उन्हें घरों के नदी में डूब जाने के सपने आते हैं और नींद उचट जाती है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)