राजनीति

राजू यादव: बिहार में आरा से महागठबंधन के प्रत्याशी, जो भाजपा के आर​के सिंह को टक्कर दे रहे हैं

राजू यादव भाकपा माले की तरफ से आरा लोकसभा क्षेत्र के उम्मीदवार हैं. उनका सामना केंद्रीय मंत्री और पूर्व नौकरशाह आरके सिंह से है. आरके सिंह भाजपा प्रत्याशी हैं.

राजू यादव बिहार में आरा लोकसभा सीट पर भाकपा माले से प्रत्याशी हैं.

राजू यादव बिहार में आरा लोकसभा सीट पर भाकपा माले से प्रत्याशी हैं. (फोटो साभार: द जनमित्र/यूट्यूब)

कई साल पहले दिल्ली के जंतर मंतर पर राजू यादव की पार्टी की ओर से एक बड़ी किसानों की रैली हुई थी. उस रैली में अचानक मेरी मुलाकात राजू से हुई थी. वे वहां भोजपुर के किसानों के समूह के साथ आए थे.

दिल्ली की मीडिया को आमतौर पर लाल झंडा वालों का कोई प्रयास दिखाई ही नहीं देता, क्योंकि उनके मालिकों को पता है कि अनवरत चल रहे वर्ग संघर्ष में किससे उनका वर्ग हित सधता है और कौन उनका वर्ग शत्रु है.

यह रैली नवंबर 2018 की संसद मार्ग वाली किसान रैली जैसी ही थी. इस रैली में भी राजू की पार्टी शामिल थी. राजू से मेरी मुलाकात पर्यावरण से जुड़े जनसंघर्षों में होती रही है.

भोजपुर के गिद्धा और बिहिया में स्थित कैंसरकारक एस्बेस्टस कारखानों से होने वाले ज़हरीले गैस, धूल और कचरे से ग्रामीणों और मजदूरों की तकलीफ को अन्य किसी दल के नेता ने कोई तवज्जों नहीं दी.

मुद्दे की गंभीरता को समझते हुए राजू ने तत्परता से अपने सभी साथियों को मेरा साथ देने के लिए कहा और कारखाने का दौरा कर लोगों के कष्ट को समझाया.

उनकी पार्टी ने बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को पत्र लिखकर कहा कि वैशाली और मुजफ्फरपुर के लोगों के शरीर का जीव विज्ञान भोजपुर के लोगों के जीव विज्ञान से अलग नहीं है.

उनकी पार्टी ने लिखा था कि अब जबकि बोर्ड ने यह तय कर दिया है कि एस्बेस्टस कारखाने को रिहायशी इलाके मे स्थापित कर लोगों के जान को जोखिम में नहीं डाला जा सकता, इस तर्क को भोजपुर में लागू नहीं करना उचित नहीं है.

राज्य सरकार के इस दोहरे मापदंड को राजू ने समझा. तमिलनाडु की निभी कंपनी की गिद्धा स्थित कारखाने के बंद होने में संघर्ष के साझा प्रयासों में वे हमेशा शरीक रहे हैं.

राजू और उनकी पार्टी ने इससे होने वाले लाइलाज रोगों को रोकने के लिए जनसंघर्ष का साथ दिया. उन्हें पता था कि एस्बेस्टस नामक खनिज के प्रयोग पर 60 से अधिक देशों में पाबंदी है. उन्होंने संघर्ष का साथ जनसरोकार को सर्वोपरि मानकर दिया, किसी संकीर्ण सियासी नफे-नुकसान के नजरिये से नहीं.

बिहिया स्थित कारखाने के एक मजदूर की मौत हो गई तो राजू शाहपुर क्षेत्र में स्थित उनके परिवार से मिलने पहुंच गए. मजदूर की बेटी ने राज्य मानवाधिकार आयोग में इस संबंध में एक याचिका दी थी. कंपनी ने मजदूर के परिवार को मात्र 5000 रुपये का मुआवजा दिया था.

इस कंपनी को एक कारखाने चलाने की अनुमति है मगर आरोप है कि यहां दो कारखाने नियम-कानून को ताक पर रखकर चलाया जा रहा है.

भोजपुर के ही कोइलवर-बबुरा-छपरा रोड क्षेत्र में सोन नदी के पास एक ऐसे कारखाने का प्रस्ताव आया जिसके तहत बिहार के 18 ज़िलों का औद्योगिक कचरा और 150 अस्पतालों का कचरा जलाया और दफनाया जाना था.

ऐसे कारखाने का असर 10 किलोमीटर क्षेत्र के वर्तमान और भविष्य की पीढ़ी के सेहत पर दिखायी पड़ता. पूरा इलाका रोगग्रस्त हो जाता. इस संबंध में जब पर्यावरण बचाओ, जीवन बचाओ जनसंघर्ष समिति ने आंदोलन किया तो राजू ने साथ दिया.

कारखाने को लेकर अम्बिकाशरण सिंह विद्यालय में जो सरकारी जनसुनवाई हुई उसमें वे शरीक हुए और जन स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वाली सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. सरकार ने लिखित तौर पर अपना प्रस्ताव वापस ले लिया.

दिलचस्प बात यह भी है कि कुछ साल पहले एक रात जब किसी ने आरा-पटना रोड पर गिद्धा के विश्वकर्मा मंदिर को ध्वस्त कर दिया तो पार्टी ने तत्कालीन स्थानीय सरपंच ददन गुप्ता और मज़दूर यूनियन के लोगों के साथ मिलकर एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया.

आडंबररहित इस मंदिर का प्रांगण सराय का काम करता है. पाकड़ के पेड़ के नीचे स्थित इस मंदिर के चबूतरे पर मजदूर और मुसाफिर फुरसत के लम्हों में बैठते है.

राजू कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी-लिबरेशन) की तरफ से आरा लोकसभा क्षेत्र के उम्मीदवार हैं. उन्हें सभी वाम दलों और राष्ट्रीय जनता दल सहित महागठबंधन का भरपूर समर्थन प्राप्त है.

आरा-भोजपुर में राजू का सामना पूर्व नौकरशाह और केंद्रीय मंत्री आरके सिंह से हैं. आरके सिंह ने अपने केंद्रीय गृह सचिव के कार्यकाल में देश के आधे से अधिक मतदाताओं के मतदाता पहचान पत्र संख्या को आधार संख्या नामक काले परियोजना से जोड़ दिया था.

सुप्रीम कोर्ट ने भी आधार कानून को आंशिक तौर पर असंवैधानिक पाया है. ऐसे में राजू की पार्टी ही एकमात्र पार्टी है, जिसने अपने घोषणा पत्र में आधार परियोजना को पूरी तरह से निरस्त करने की बात कही है.

जनता के मुद्दों को लेकर किसानों, मज़दूरों और शिक्षकों के साथ बिहार के आरा से लेकर दिल्ली के जंतर मंतर तक लड़ने वाली पार्टी के नुमाइंदे को अपना नुमाइंदा बनाना आरा के प्रबुद्ध मतदाताओं के हाथ में है.

तीन तारों वाले चुनाव चिह्न में संघर्षों की लालिमा तो है, जनता जनार्दन को ये रंग पसंद है या नहीं ये तो 23 मई को ही पता चलेगा.

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं.)