प्रासंगिक

1982 की बॉम्बे कपड़ा मिल की चर्चित हड़ताल की पूर्वकथा

जनवरी 1982 में मुंबई के कपड़ा मिलों के दो लाख से ज़्यादा मज़दूर अपनी विभिन्न मांगों को लेकर अनिश्चिकालीन हड़ताल पर गए थे. दत्ता सामंत के नेतृत्व में लगभग दो साल तक चली इस हड़ताल ने पूरे कपड़ा मिल उद्योग के साथ सरकार को भी हैरान कर दिया था. इस ऐतिहासिक हड़ताल पर लेखक हब वैन वर्श की किताब ‘द 1982-83 बॉम्बे टेक्सटाइल्स स्ट्राइक एंड द अनमेकिंग ऑफ अ लेबरर्स सिटी’ का अंश.

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1910 में कोलाबा के ताजमहल होटल के सामने बनी कॉटन ग्रीन मिल्स (फोटो साभार: विकीमीडिया कॉमन्स)

1982 की जनवरी में, मुंबई के कपड़ा मिलों के दो लाख से ज्यादा मजदूर अनिश्चिकालीन हड़ताल पर चले गए. हालांकि कुछ मजदूर पहले से ही अपने नियोक्ताओं से वेतन के सवाल पर संघर्ष कर रहे थे, लेकिन पूरे कपड़ा मिल क्षेत्र में संगठित तौर पर की गई कार्रवाई ने मिल मालिकों और सरकार को हैरान कर दिया था.

स्थापित मजदूर संघों और उनके नेताओं को दरकिनार करके एक नए मजदूर नेता- दत्ता सामंत के नेतृत्व को स्वीकार करने के मजदूरों के फैसले से भी मिल मालिक झटका खा गए थे. एक प्रशिक्षित मेडिकल डॉक्टर दत्ता सामंत ने कई कंपनियों में कामयाबी के साथ हड़तालों की अगुवाई की थी और ऐसी शर्तें मनवाई थीं, जो इससे पहले सुनी नहीं गई थीं.

एक दिन कपड़ा मिलों के हजारों मजदूर उनके घर गए और उनसे उनका नेतृत्व करने के लिए कहा. इसके साथ ही शहर के इतिहास और इसके कपड़ा उद्योग जगत में एक नए युग की शुरुआत हुई. हड़ताल के समाप्त होने तक- जो कि करीब दो सालों तक चली- हजारों मजदूर अपनी नौकरी गंवा चुके थे और कई मिलों पर ताला पड़ चुका था.

डच विद्वान हब वैन वर्श ने इस हड़ताल की कहानी पूरे तफ्सील के साथ लिखी, लेकिन कई वर्षों तक यह किताब उपलब्ध नहीं थी. ‘स्पीकिंग टाइगर’ प्रकाशन द्वारा इस किताब को फिर से प्रकाशित किया गया है. मुंबई के चेहरे को हमेशा-हमेशा के लिए बदल देने वाली एक महत्वपूर्ण घटना की कहानी सुनाने वाली यह किताब नई पीढ़ी के पाठकों से एक बार फिर रूबरू है.

‘द 1982-83 बॉम्बे टेक्सटाइल्स स्ट्राइक एंड द अनमेकिंग ऑफ अ लेबरर्स सिटी’ का यह अंश उन लम्हों की कहानी सुनाता है, जब मजदूरों ने सामंत को अपना नेता बनाने का फैसला किया.

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1981 के सितंबर में जब कपड़ा मिल के मजदूर एक दिन की हड़ताल पर गए, तब शायद ही किसी को इस बात का अंदाजा था कि यह घटना आने वाले समय में भारतीय उपमहाद्वीप में होने वाली सबसे बड़ी हड़ताल का रूप ले लेगी. ‘सबसे बड़ी हड़ताल’ का प्रयोग थोड़ा अस्पष्ट लग सकता है, क्योंकि इसमें आकार और समय के पैमानों को मिलाया जा रहा है.

हालांकि, आधिकारिक तौर पर कपड़ा मिलों की डेढ़ साल की स्वीकृत अवधि से ज्यादा लंबी चलने वाली या 2.5 लाख कपड़ा मिल मजदूरों से ज्यादा लोगों को शामिल करने वाली हड़तालों की मिसालें खोजना मुश्किल नहीं है, लेकिन किसी ऐसी हड़ताल का उदाहरण खोजना वाकई काफी कठिन है, जो इतनी लंबी चली हो और जिसमें इतने लोग भी शामिल हुए हों.

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हब वैन वर्श की किताब ‘द 1982-83 बॉम्बे टेक्सटाइल स्ट्राइक एंड द अनमेकिंग ऑफ अ लेबरर्स सिटी (प्रकाशन: स्पीकिंग टाइगर)

शायद विश्व इतिहास में भी इसका कोई जोड़ीदार नहीं है. दूसरे सालों की तरह ही शुरुआती धरना-प्रदर्शन बोनस के उचित निपटारे के सवाल को लेकर था और पहले की ही तरह आम उम्मीद यही थी कि यह उबाल थोड़े से सकारात्मक नतीजे के निकलने के बाद शांत पड़ जाएगा.

भुगतान किए जाने वाले बोनस की रकम में मिल-दर-मिल अंतर था और बीतते वर्षों के साथ इसमें बदलाव आया था और अन्य बातों के अलावा आवंटित किए जाने वाले अधिशेष यानी अतिरिक्त रकम के निर्धारण के लिए अपनाए जाने वाले सूत्र पर भी आधारित था.

बोनस की अवधारणा में भी काफी बदलाव आया, जो 1965 के बोनस एक्ट में किए गए कई सारे बदलावों से स्पष्ट है. 1980 के बोनस भुगतान अध्यादेश में न्यूनतम 8.33 प्रतिशत और अधिकतम 20 प्रतिशत बोनस देने का प्रावधान किया गया था और इसकी एक विशेष बात यह थी कि 1980 के बाद से बोनस को लाभ की जगह उत्पादकता से जोड़ा जा सकता था.

बोनस का भुगतान एक तरह से लाभ का आपसी बंटवारा है और मजदूरों के योगदान के बदले में उन्हें दिया जाने वाला इनाम है. लेकिन कुछ मजदूरों को इस भुगतान की प्रकृति समझ में नहीं आई थी.

दत्ता सामंत. (फोटो साभार: विकिपीडिया कॉमन्स)

दत्ता सामंत. (फोटो साभार: विकिपीडिया कॉमन्स)

हालांकि, ट्रेड यूनियन जॉइंट एक्शन कमेटी (टीयूजेएसी), जो विपक्ष से वास्ता रखने वाले संघों का एक मंच था, ने उनकी मांगें न माने जाने की स्थिति में बेमियादी हड़ताल की चेतावनी दी थी, लेकिन किसी ने भी इसे गंभीरता के साथ नहीं लिया. फिर भी सितंबर में एक दिन की हड़ताल काफी सफल रही और इसका एक उल्लेखनीय पहलू इसमें गिरनी कामगार सेना से ताल्लुक रखने वाले मजदूरों की भागीदारी थी, जबकि इसने नेताओं का निर्देश इसके उलट था.

कुछ सप्ताह के बाद राष्ट्रीय मिल मजदूर संघ (आरएमएमएस) और एमओए को यह लगा कि उन्होंने समस्या का समाधान कर लिया है और 22 अक्टूबर को उन्होंने एक समझौते का खाका पेश किया, जिससे निजी मिलों पर 20.6 करोड़ रुपये का बोझ पड़ता. नेशनल टेक्सटाइल कॉरपोरेशन के तहत 13 मिलों ने बोनस के तौर पर 2.4 करोड़ रुपये का भुगतान करने की घोषणा की.

ऐसा करते हुए विभिन्न मिलों की भुगतान कर सकने की अलग-अलग क्षमता का ध्यान रखा गया था, जिसके कारण बोनस की रकम 8.33 प्रतिशत (कानूनी तौर पर न्यूनतम बोनस) से 17.33 प्रतिशत के बीच थी. नौ मिलों को (जिसमें स्टैंडर्ड मिल्स भी शामिल थी) को सबसे ज्यादा रकम का भुगतान करना था, जबकि 34 मिलों को 12.5 प्रतिशत से कम का भुगतान करना था.

लेकिन पिछले सालों के उलट यह मामला यहीं ठंडा नहीं पड़ा. अगले दिन 15 मिलों के मजदूर ने बातचीत के नतीजे के विरोध में धरना दिया. मजदूरों के मिजाज को भांपते हुए मुंबई गिरनी कामगार संघ ने अनिश्चितकालीन हड़ताल की चेतावनी दी.

अगला दिन, यानी 23 अक्टूबर भविष्य के घटनाक्रम के हिसाब से काफी निर्णायक साबित हुआ. उस दिन हड़ताल कर रहे मजदूरों ने कपड़ा उद्योग के स्थापित मजदूर संघ नेताओं को पूरी तरह से नजरअंदाज करते हुए एक बाहरी व्यक्ति की मदद लेने का फैसला किया, जिसने उनकी उम्मीदों को जगा दिया था और पिछले कुछ वर्षों में जिसका कद उस पर मजदूर समस्याओं के समाधान के उसके तौर-तरीकों पर अनगिनत हमलों के बावजूद बढ़ता गया था.

लोअर परेल की मधुसूदन मिल्स में बंद पड़ी मशीनें (फोटो साभार: विकीमीडिया कॉमन्स)

लोअर परेल की मधुसूदन मिल्स में बंद पड़ी मशीनें (फोटो साभार: विकीमीडिया कॉमन्स)

हकीकत में, जिन तरीकों को दुस्साहसी या गैर-जिम्मेदार करार देकर नियोक्ताओं और मजदूर संघ के नेताओं द्वारा एक समान तरीके से उनका मजाक बनाया जाता है या उनसे घृणा की जाती थी, ऐसा लगता है कि ठीक उसी चीज ने मजदूरों को उनकी ओर आकर्षित किया.

उस दिन सबसे ज्यादा बोनस का भुगतान करने के लिए तैयार मिलों में से एक स्टैंडर्ड मिल्स के सैकड़ों कर्मचारी मिल के फाटक से दत्ता सामंत, जो विख्यात और कुख्यात दोनों थे (यह विशेषण सामान्य तौर पर राजनीतिक रुझान और अपने-अपने आर्थिक हितों पर निर्भर करता था) के घाटकोपर स्थित निवास तक गए और उनसे हड़ताल की रहनुमाई करने की मांग की.

अगर उन्हें यह उम्मीद रही होगी कि उनका बांहें खोलकर स्वागत किया जाएगा, तो उन्हें एक अपमानजनक धक्का लगने वाला था. डॉ. सामंत ने यह सम्मान लेने से इनकार कर दिया.

उन्होंने बताया कि वे उनका नेतृत्व नहीं करना चाहते क्योंकि उनका उद्योग बीआईआर अधिनियम के अंतर्गत आता है. इस तथ्य के कारण यह काफी कठिन होगा. इसके अलावा उनमें अपने कंधे पर पहले से उठायी जा रही जिम्मेदारियों के बोझ के अलावा और कोई बोझ डालने की इच्छा नहीं थी.

लेकिन, वे मजदूर इतनी आसानी से उनका पीछा छोड़ने वाले नहीं थे. वे उनके घर के सामने ही धरने पर बैठ गए, पूरी रात वहीं जमे रहे ताकि वे उन्हें अपना नेता बनना स्वीकार करने के लिए मजबूर कर सकें.

जब सामंत ने देखा कि ये मजदूर आगे आने वाली समस्याओं का सीधा सामना करने के लिए प्रतिबद्ध हैं और एक संघर्ष के रास्ते में मुसीबतों की लंबी मियाद उनको तोड़ नहीं पाएगी, तब उन्होंने मजदूरों के आग्रह को स्वीकार कर लिया.

यह खबर जंगल की आग की तरह फैल गई और जब दत्ता सामंत ने 26 अक्टूबर की सुबह स्टैंडर्ड मिल्स के फाटक के सामने एक सभा को संबोधित किया, तब मिल के हजारों हड़ताली मजदूर वहां जमा हो गए और उस सभा को एक बड़ी रैली का रूप दे दिया.

समर्थन के उत्साह भरे शोर के बीच सामंत ने घोषणा की कि यह लड़ाई सिर्फ ज्यादा बोनस के लिए नहीं लड़ी जाएगी, बल्कि यह वेतन को बढ़ाने और बदलियों के स्थायीकरण के लिए भी होगी.

यह आने वाले दिनों में होने वाली उन बैठकों और रैलियों की कड़ी में पहली रैली थी, जिनमें जमा होने वाली भीड़ लगातार बड़ी होती गई और जो कभी-कभी एक लाख से ज्यादा होती थी.

आने वाले दिनों में सामंत का दफ्तर उन मिलों के मजदूरों से भरा होता था, जहां हड़ताल नहीं थी और जो स्टैंडर्ड मिल्स के मजदूरों की तरह ही ‘डॉक्टर’ से उनके संघर्ष का नेतृत्व करने की गुहार के साथ आते थे.

दत्ता सामंत को इस बात का यकीन हो गया कि स्टैंडर्ड मिल्स के मजदूरों द्वारा किया गया आग्रह कोई संयोग न होकर सभी मजदूरों द्वारा साझा किए गए गहरे गुस्से की अभिव्यक्ति था.

सामंत को मिले मजदूरों के जबरदस्त समर्थन से कपड़ा उद्योग में सक्रिय दूसरे संघ हैरान थे और उन्हें यह समझ नहीं आ रहा था कि वे इसे लेकर कैसी प्रतिक्रिया दें.

वहां सिर्फ एक लाल झंडे वाला संघ था, जिसने समर्थन देने में कोई समय नहीं गंवाया. यह था कम्युनिस्ट रुझान वाला सर्व श्रमिक संघ (एसएसएस) जिसका नेतृत्व स्वतंत्र लाल निशान पार्टी कर रही थी, जिसका कपड़ा उद्योग में कपड़ा कामगार संगठन नाम से एक संघ था.

श्रमिकों के मुद्दों पर उनका समर्थन तत्काल और बिना किसी शर्त के था. हड़ताल की एक शाम पहले एसएसएस ने दत्ता सामंत के साथ मंच साझा किया था.

शक्ति मिल्स के अवशेष (फोटो साभार: विकीमीडिया कॉमन्स)

शक्ति मिल्स के अवशेष (फोटो साभार: विकीमीडिया कॉमन्स)

कुछ साल पहले अपनी गंवाई गई जमीन को फिर से हासिल करने की उम्मीद में शिवसेना से संबद्ध गिरनी कामगार सेना ने भी तेजी से कदम बढ़ाया. सेना नेता बाल ठाकरे ने एक मांग-पत्र सामने रखते हुए एक नवंबर को एक दिन की हड़ताल का आह्वान किया. इस मांग-पत्र में प्रति महीने वेतन में कम से कम 200 रुपये की बढ़ोतरी की मांग की गई थी.

इसमें यह भी जोड़ा गया था कि अगर मध्य नवंबर तक इस मांग को नहीं माना गया, वे अनिश्चितकालीन हड़ताल करेंगे. व्यवहार में सभी मजदूरों ने हड़ताल में हिस्सा लिया लेकिन ठाकरे की चेतावनी का खोखलापन तब उजागर हो गया, जब यह उग्र कार्रवाई यहीं समाप्त हो गई.

एक दिन की हड़ताल को मिला अच्छा-खासा समर्थन मजदूरों की मंशा और लड़ाई के लिए उनकी तैयारी का स्पष्ट संकेत था. लेकिन इसने यह भी दिखाया कि इस बिंदु पर मजदूरों में दत्ता सामंत के प्रति पक्की निष्ठा पैदा नहीं हुई थी. आने वाले समय में यह बदलने वाला था.

करीब एक साल बाद शिवेसना की उग्र कार्रवाई एक बार फिर दिखाई दी, लेकिन इसका प्रभाव न के बराबर रहा क्योंकि तब तक पार्टी और इससे संबद्ध संघ की कपड़ा मजदूरों के बीच विश्वसनीयता बिल्कुल समाप्त हो गई थी.

हड़ताल में शामिल और न शामिल, दोनों ही तरह की मिलों के कपड़ा मजदूरों के दबाव में सामंत ने 30 अक्टूबर की एक बड़ी सभा के दौरान एक नए कपड़ा संघ- महाराष्ट्र गिरनी कामगार संघ की स्थापना की घोषणा की.

उन्होंने भी उनके द्वारा रखी गईं मांगों को नहीं मानने की स्थिति में मध्य नवंबर से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने की चेतावनी दी. इन मांगों में कभी न सुने गए अनुपात में वेतन बढ़ाना- काम के स्वरूप के आधार पर 200 रुपये से 400 रुपये तक प्रति महीने- बदली मजदूरों के स्थायीकरण और छुट्टी की सुविधाओं में विस्तार की मांग शामिल थी.

हालांकि इनमें से पहली मांग ही है, जो लोगों द्वारा सबसे ज्यादा याद की जाती है. इस मांग के पीछे का दुस्साहस शहर के नियोक्ताओं को डर से भर देने के लिए काफी था और और इसी मांग को आधार बनाकर उन्होंने सामंत पर उनके गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार के लिए हमला बोला और उनका मजाक बनाया.

लेकिन फिर भी मजदूरों के पास इस बात यकीन करने के पर्याप्त कारण थे कि वे अपनी मांगें मनवा सकते हैं. क्या सामंत ने एम्पायर डाइंग के प्रबंधन को कुछ ही महीने पहले 150 रुपये से 200 रुपये तक वेतन बढ़ाने पर मजबूर नहीं किया था? इस मिल में भी दूसरी कई मिलों की तरह जिसमें सामंत कोई पक्षकार नहीं थे, लेकिन उन्होंने मजदूरों की अगुवाई की थी, जबकि उनका संघ प्रातिनिधिक भी नहीं था.

एम्पायर डाइंग में मजदूरों की अगुवाई करने का कानूनी हक एमएमएस के पास था. एम्पायर डाइंग के मामले को रहने भी दें, तो कोई भी इस तथ्य से इनकार नहीं कर सकता है कि सामंत का उग्रपंथी तौर-तरीका बॉम्बे-ठाणे पट्टी में मजदूरों के वेतन को इस स्तर तक बढ़ाने में कामयाब रहा था, जो उनके उभार से पहले कभी सुना नहीं गया था. इन उपलब्धियों का काफी प्रचार हुआ था और वे चर्चा का विषय थे.

इन वर्षों के दौरान केमिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे नए उद्योगों के मजदूरों ने वेतन के मामले में कपड़ा उद्योग के मजदूरों की तुलना में एक बढ़त कायम कर ली थी. आरएमएमएस को इस तथ्य की जानकारी थी कि कपड़ा उद्योग के मजदूर अपनी आय की तुलना पूंजी गहन उद्योगों के मजदूरों की आय से करते हैं, लेकिन इसने इसके समाधान की दिशा में कोई काम नहीं किया.

जो बात वेतन के लिए सही थी, वही बात बोनस के लिए भी सही थी और नए उद्योगों में 25 से 30 प्रतिशत तक के बोनस की बात कोरी कल्पना नहीं थी. मिल मजदूरों को लगा कि यह एक साथ उनकी पुरानी मांगों को भी मनवा लेने का अच्छा मौका है और उन्होंने ज्यादा बोनस की मांग के साथ वेतन बढ़ाने की मांग को भी जोड़ दिया.

तनाव दिन-ब-दिन बढ़ता गया और बिना कोई समय गंवाए तत्काल अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू करने की मांग के पक्ष में आवाज तेज होती गई.

निर्विवाद रूप से उस समय (1982 तक) की सबसे बड़ी कपड़ा मिल हड़ताल के प्रमुख नेताओं में से एक कॉमरेड डांगे ने मजदूरों से एक लंबे संघर्ष के लिए तैयार रहने के लिए कहा. लड़ाई के मैदान की ओर बढ़ने के संकेत देने के साथ ही बंबई के आसमान पर बादल मंडराने लगे और इसकी गवाही तब के अखबार के लेख भी देते हैं.

(हब वैन वर्श नीदरलैंड्स की एम्सटर्डम यूनिवर्सिटी में सामाजिक मानवविज्ञानी हैं. 1982-83 के बंबई कपड़ा मिल हड़ताल पर उनके अध्ययन की व्यापक सराहना हुई थी. वे एक उपन्यासकार भी हैं.)

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