Urban Maoists

Mumbai: Dalit groups protesting at Thane railway station during the Maharashtra Bandh on Wednesday following clashes between two groups in Bhima Koregaon near Pune, in Mumbai. PTI Photo(PTI1_3_2018_000115B)

भीमा-कोरेगांव: एनसीपी नेताओं ने कार्यकर्ताओं के खिलाफ दर्ज मामले वापस लिए जाने की मांग की

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे लिखे पत्र में एनसीपी नेता और विधायक धनंजय मुंडे ने दावा किया कि राज्य की पिछली देवेंद्र फड़णवीस सरकार ने सामाजिक कार्यकर्ताओं समेत भीमा-कोरेगांव घटनाक्रम में शामिल लोगों के खिलाफ ‘झूठे’ मामले दर्ज किए थे.

माओवादियों से संबंध और प्रधानमंत्री की हत्या की साज़िश के आरोप में गिरफ्तार किए गए सामाजिक कार्यकर्ता सुधीर धावले, सुरेंद्र गाडलिंग, शोमा सेन महेश राउत और रोना विल्सन (बाएं से दाएं)

भीमा-कोरेगांव हिंसा: सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की चार्जशीट में देरी को स्वीकारा

बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र पुलिस को चार्जशीट दायर करने के लिए अतिरिक्त समय देने से इनकार किया था. शीर्ष अदालत ने उसे ख़ारिज कर दिया और कहा कि अब जब चार्जशीट दायर हो चुकी है, तो मामले में गिरफ़्तार पांच कार्यकर्ता नियमित ज़मानत की मांग कर सकते हैं.

सामाजिक कार्यकर्ता आनंद तेलतुम्बड़े. (फोटो साभार: ट्विटर)

भीमा-कोरेगांवः सामाजिक कार्यकर्ता आनंद तेलतुम्बड़े की गिरफ्तारी पर रोक 22 फरवरी तक बढ़ी

एल्गार परिषद/भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने तेलतुम्बड़े को 14 और 18 फरवरी को जांच अधिकारियों के सामने पेश होने का आदेश दिया.

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अपूर्वानंद की मास्टरक्लास: क्यों आनंद तेलतुम्बड़े की आज़ादी ज़रूरी है

आज की मास्टर क्लास में अपूर्वानंद सामाजिक कार्यकर्ता आनंद तेलतुम्बड़े की संभावित गिरफ़्तारी पर चर्चा कर रहे हैं.

सामाजिक कार्यकर्ता आनंद तेलतुम्बड़े. (फोटो साभार: ट्विटर)

भीमा-कोरेगांवः सामाजिक कार्यकर्ता आनंद तेलतुम्बड़े की गिरफ्तारी पर 12 फरवरी तक रोक

बॉम्बे उच्च न्यायालय ने आनंद तेलतुम्बड़े की अग्रिम ज़मानत संबंधी याचिका पर सुनवाई 11 फरवरी तक के लिए स्थगित कर दी.

सामाजिक कार्यकर्ता आनंद तेलतुम्बड़े. (फोटो साभार: ट्विटर)

अदालत ने आनंद तेलतुम्बड़े की गिरफ़्तारी को ग़ैरक़ानूनी कहा, रिहा करने का आदेश

पुणे पुलिस ने भीमा-कोरेगांव हिंसा और माओवादियों से कथित संबंधों के आरोप में सुप्रीम कोर्ट से मिली अंतरिम सुरक्षा के बावजूद शनिवार को आनंद तेलतुम्बड़े को गिरफ्तार कर लिया था.

आनंद तेलतुम्बड़े. (फोटो साभार: फेसबुक)

सुप्रीम कोर्ट द्वारा गिरफ़्तारी से सुरक्षा मिलने पर भी आनंद तेलतुम्बड़े गिरफ़्तार

भीमा-कोरेगांव हिंसा में कथित भूमिका और माओवादियों से कथित संबंधों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बीते 14 जनवरी को दलित शिक्षाविद् और सामाजिक कार्यकर्ता आनंद तेलतुम्बड़े की गिरफ़्तारी से अंतरिम सुरक्षा की अवधि चार सप्ताह और बढ़ा दी थी.

सामाजिक कार्यकर्ता आनंद तेलतुम्बड़े. (फोटो साभार: ट्विटर)

सामाजिक कार्यकर्ता आनंद तेलतुम्बड़े की अग्रिम ज़मानत याचिका पुणे की अदालत ने ख़ारिज की

सामाजिक कार्यकर्ता आनंद तेलतुम्बड़े को एल्गार परिषद/भीमा-कोरेगांव हिंसा में कथित भूमिका और माओवादियों से कथित संबंधों के मामले में आरोपी बनाया गया है.

सामाजिक कार्यकर्ता आनंद तेलतुम्बड़े. (फोटो साभार: ट्विटर)

आनंद तेलतुम्बड़े को गिरफ़्तार करने की कोशिश इस राजतंत्र के बढ़ते अहंकार का सबूत है

राजतंत्र हम सबको इतना मूर्ख समझ रहा है कि हम विश्वास कर लेंगे कि सामाजिक कार्यकर्ता इस देश में हिंसा की साज़िश कर रहे हैं. यह कहने वाले वे हैं जो दिन-रात मुसलमानों, ईसाईयों और सताए जा रहे लोगों के हक़ में काम करने वालों को शहरी माओवादी कहकर नफ़रत और हिंसा भड़काते रहते हैं.

(फोटो साभार: @akashbanerjee/Twitter)

क्या ‘मैं भी अर्बन नक्सल’ का नारा बुनियादी सवालों से दूर ले जा रहा है?

सामाजिक कार्यकर्ताओं पर हालिया कार्रवाई के ख़िलाफ़ जो जनाक्रोश उभरा है उसमें ‘नक्सल’ शब्द और इसके पीछे के ठोस ऐतिहासिक संदर्भों को बार-बार सामने रखना ज़रूरी है ताकि यह शब्द महज़ एक आपराधिक प्रवृत्ति के तौर पर ही न देखा जाए बल्कि इसके पीछे मौजूद सरकारों की मंशा भी उजागर होती रहे.

अरुं​धति रॉय. (फोटो: पीटीआई)

मैं भी ‘अर्बन नक्सल’ हूं!

दलितों और पिछड़ों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार कर, उन पर ‘माओवादी’ का लेबल लगाकर सरकार दलित महत्वकांक्षाओं का अपमान करती है, साथ ही दूसरी ओर दलित मुद्दों के प्रति संवेदनशील दिखने का स्वांग भी रचती है.

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अचानक इतने सारे ‘अर्बन नक्सल’ कहां से प्रकट हो रहे हैं?

पुलिस और कुछ टेलीविजन चैनलों के आपसी मिलीभगत से जिस तरह से वर्तमान समय में एक बड़े और लगातार विकसित हो रहे ‘अर्बन नक्सल’ (शहरी माओवादी) के नेटवर्क के प्रेत को खड़ा किया जा रहा है, उसे देखते हुए ऐसा लगता है कि हम फासीवाद की तरफ काफी तेजी से छलांग लगा रहे हैं.