यूपी: ट्वीट के लिए गिरफ़्तार पत्रकार प्रशांत कनौजिया को दो महीने बाद मिली हाईकोर्ट से ज़मानत

लखनऊ की सत्र अदालत द्वारा ज़मानत याचिका खारिज़ किए जाने के बाद प्रशांत कनौजिया ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया था. प्रशांत को उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा एक कथित आपत्तिजनक ट्वीट के लिए 18 अगस्त को दिल्ली में उनके घर से गिरफ़्तार किया गया था.

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प्रशांत कनौजिया. (फोटो साभार: फेसबुक)

लखनऊ की सत्र अदालत द्वारा ज़मानत याचिका खारिज़ किए जाने के बाद प्रशांत कनौजिया ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया था. प्रशांत को उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा एक कथित आपत्तिजनक ट्वीट के लिए 18 अगस्त को दिल्ली में उनके घर से गिरफ़्तार किया गया था.

प्रशांत कनौजिया. (फोटो साभार: फेसबुक)
प्रशांत कनौजिया. (फोटो साभार: फेसबुक)

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा अगस्त महीने में गिरफ्तार किए गए पत्रकार प्रशांत कनौजिया को मंगलवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट से जमानत मिल गई है.

पिछले महीने यूपी सरकार ने हाईकोर्ट में दायर उनकी ज़मानत याचिका पर जवाब देने के लिए चार सप्ताह का समय मांगा था, जिसके चलते प्रशांत को एक और महीना जेल में रहना पड़ा.

लखनऊ के सत्र न्यायलय द्वारा जमानत याचिका खारिज किए जाने के बाद 8 सितंबर को प्रशांत ने हाईकोर्ट का रुख किया था.

प्रशांत को उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा एक कथित आपत्तिजनक ट्वीट के लिए 18 अगस्त को दिल्ली में उनके घर से गिरफ़्तार किया गया था.

हाई कोर्ट के फैसले के बाद प्रशांत की पत्नी जगीशा अरोड़ा  मीडिया पर इसकी जानकारी दी और उनका साथ देने वालों के प्रति आभार व्यक्त किया।

पुलिस द्वारा प्रशांत के खिलाफ 17 अगस्त को हजरतगंज थाने के एक पुलिसकर्मी द्वारा दर्ज करवाई गई एफआईआर में कहा गया था, ‘प्रशांत कनौजिया द्वारा छेड़छाड़ की गई तस्वीर से सुशील तिवारी को बदनाम करने की कोशिश की गई है. प्रशांत ने लिखा था कि यह तिवारी का निर्देश है कि अयोध्या के राम मंदिर में शूद्र, ओबीसी, अनुसूचित जाति और जनजाति का प्रवेश निषेध होना चाहिए और सभी लोग इसके लिए आवाज उठाएं.’

आगे कहा गया था, ‘इसे सुशील तिवारी की पोस्ट के स्क्रीनशॉट के बतौर शेयर किया जा रहा था… सोशल मीडिया पर साझा हुई पोस्ट्स का स्क्रीनशॉट संलग्न है. इस प्रकार की आपत्तिजनक पोस्ट विभिन्न समुदायों में वैमनस्य फैलाने वाली, सामाजिक सौहार्द पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली और धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाली है जिससे लोक प्रशांति भंग हो सकती है.’

इसमें आईपीसी की नौ धाराओं का जिक्र किया गया है, जिनमें 153 ए/बी (धर्म, भाषा, नस्ल वगैरह के आधार पर समूहों में नफरत फैलाने की कोशिश), 420 (धोखाधड़ी), 465 (धोखाधड़ी की सजा), 468 (बेईमानी के इरादे से धोखाधड़ी), 469 (प्रतिष्ठा धूमिल करने के उद्देश्य से धोखाधड़ी) 500 (मानहानि का दंड) 500 (1) (बी) 505(2) शामिल हैं.

इसके अलावा कंप्यूटर संबंधी मामलों के लिए उन पर आईटी एक्ट की धारा 66 के तहत भी मामला दर्ज किया गया था.

इससे पहले साल 2019 में भी प्रशांत कनौजिया को यूपी पुलिस द्वारा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर की एक सोशल मीडिया पोस्ट के लिए गिरफ्तार किया गया था.

तब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद प्रशांत को रिहा किया गया था. उस समय भी उनके खिलाफ हजरतगंज थाने में मामला दर्ज हुआ था. पुलिस का आरोप था कि प्रशांत ने मुख्यमंत्री पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए उनकी छवि ख़राब करने की कोशिश की थी.

प्रशांत कनौजिया साल 2016 से 2018 तक रिपोर्टर के बतौर द वायर हिंदी की टीम का हिस्सा रहे हैं.

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