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नगा शांति वार्ता जारी, विधानसभा में राज्यपाल ने बिना सोचे-विचारे बयान दिया: एनएससीएन (आईएम)

नगालैंड के राज्यपाल और नगा शांति वार्ता के मध्यस्थ आरएन रवि ने फरवरी में विधानसभा में कहा कि नगा राजनीतिक मुद्दे पर बातचीत ख़त्म हो चुकी है और अब अंतिम समाधान की ओर बढ़ने की ज़रूरत है. नगा समूह ने वार्ता पूरी होने से इनकार करते हुए कहा है कि मध्यस्थ के रूप में रवि की भूमिका निराशाजनक है.

टी. मुइवाह और आरएन रवि. (फाइल फोटो: पीटीआई)

एनएससीएन-आईएम के प्रमुख टी. मुइवाह और आरएन रवि. (फाइल फोटो: पीटीआई)

कोहिमा: केंद्र सरकार एवं नगा समूहों के बीच शांति वार्ता पूरी होने को लेकर नगालैंड के राज्यपाल एवं वार्ता के मध्यस्थ आरएन रवि द्वारा दिए गए बयान के तीन सप्ताह बाद नगा बागी संगठनों के अगुआ नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड-इसाक मुईवाह (एनएससीएन-आईएम) ने कहा कि रवि ने ‘बिना सोचे-विचारे यह बयान दिया था और इस समझौते पर बातचीत जारी है.

नगा समूह ने बुधवार रात को जारी बयान में कहा कि वह ऐसे किसी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करेगा, जिसमें वे मानक पूरे नहीं होते, जिन पर आपसी सहमति बनी है.

बयान में कहा गया, ‘हाल में नगालैंड के राज्यपाल आरएन रवि ने राज्य विधानसभा में बिना सोचे समझे यह बयान देकर अनावश्यक भ्रांति पैदा की कि नगा राजनीतिक वार्ता पूरी हो गई है.’

बयान में कहा गया, ‘यह खेद की बात है कि मध्यस्थ के रूप में रवि की भूमिका निराशाजनक है.’

एनएससीएन (आईएम) ने कहा कि रवि को इस मामले पर हर शब्द बोलने से पहले सावधानी बरतनी चाहिए. उसने कहा कि ऐसे समाधान पर पहुंचने के लिए वार्ता जारी हैं, जो केंद्र एवं नगा लोगों के लिए स्वीकार्य एवं सम्मानजनक हो.

रवि ने विधानसभा में पिछले महीने कहा था कि नगा राजनीतिक मुद्दे पर केंद्र सरकार और नगा समूहों के बीच बातचीत का दौर समाप्त हो चुका है तथा अब अंतिम समाधान की दिशा में बढ़ने की जरूरत है.

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, एनएससीएन (आईएम) ने कहा, ‘इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह भारत-नगा राजनीतिक चर्चा की जमीनी सच्चाई है और एनएससीएन ने नगा लोगों की राजनीतिक पहचान की रक्षा करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है. आरएन रवि पहले भी ऐसे भ्रामक बयान दे चुके हैं.’

एनएससीएन (आईएम) ने आगे कहा कि इस तरह की संवेदनशील राजनीतिक वार्ताओं के मामले में 136 करोड़ भारतीयों और विश्व समुदाय के अलावा भारत और भारतीय संसद ने भी भारत सरकार और भारतीय संसद का विरोध किया है.

गौरतलब है कि बीते साल अगस्त महीने में राज्यपाल आरएन रवि और एनएससीएन (आईएम) के बीच खींचतान सामने आई थी, जब संगठन ने केंद्र के वार्ताकार रवि पर इस प्रक्रिया में बाधा डालने का आरोप लगाते हुए भारत सरकार के साथ हुए उनके फ्रेमवर्क एग्रीमेंट को सार्वजनिक कर दिया था.

इसी महीने एनएससीएन-आईएम ने आरएन रवि पर पर नगा राजनीतिक मुद्दों के अंतिम समाधान में बाधक बनने का आरोप लगाते हुए शांति वार्ता आगे बढ़ाने के लिए नए वार्ताकार को नियुक्त किए जाने की मांग की थी.

उल्लेखनीय है कि उत्तर पूर्व के सभी उग्रवादी संगठनों का अगुवा माने जाने वाला एनएससीएन-आईएम अनाधिकारिक तौर पर सरकार से साल 1994 से शांति प्रक्रिया को लेकर बात कर रहा है.

सरकार और संगठन के बीच औपचारिक वार्ता साल 1997 से शुरू हुई. नई दिल्ली और नगालैंड में बातचीत शुरू होने से पहले दुनिया के अलग-अलग देशों में दोनों के बीच बैठकें हुई थीं.

18 साल चली 80 दौर की बातचीत के बाद अगस्त 2015 में भारत सरकार ने एनएससीएन-आईएम के साथ अंतिम समाधान की तलाश के लिए रूपरेखा समझौते (फ्रेमवर्क एग्रीमेंट) पर हस्ताक्षर किए गए.

एनएससीएन-आईएम के महासचिव थुलिंगलेंग मुइवाह और वार्ताकार आरएन रवि ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में तीन अगस्त, 2015 को इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.

चार साल पहले केंद्र ने एक समझौते (डीड ऑफ कमिटमेंट) पर हस्ताक्षर कर आधिकारिक रूप से छह नगा राष्ट्रीय राजनीतिक समूहों (एनएनपीजी) के साथ बातचीत का दायरा बढ़ाया था.

अक्टूबर 2019 में आधिकारिक तौर पर इन समूहों के साथ हो रही शांति वार्ता खत्म हो चुकी है, लेकिन नगालैंड के दशकों पुराने सियासी संकट के लिए हुए अंतिम समझौते का आना अभी बाकी है.

मुईवाह ने अगस्त 2020 में कहा था, ‘दशकों पुराने आंदोलन के समाधान के लिए 2015 में सह-अस्तित्व और साझा-संप्रभुता के सिद्धांत के आधार पर भारत सरकार के साथ फ्रेमवर्क एग्रीमेंट पर सहमति बनी थी.’

उन्होंने दावा किया था कि इस एग्रीमेंट में भारत सरकार ने नगाओं की संप्रभुता को मान्यता दी थी. समझौते में संप्रभु सत्ता साझा करने वाली दो संस्थाओं के समावेशी शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का उल्लेख किया गया था.

मुईवाह का यह भी दावा था कि नगालैंड के राज्यपाल और बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाले आरएन रवि ने 31 अक्टूबर 2019 को कहा था, ‘हम आपके झंडे और संविधान का सम्मान करते हैं. हम यह नहीं कहते कि भारत सरकार उन्हें खारिज करती है, लेकिन हमें इन पर जल्दी फैसला लेना होगा.’

2015 में केंद्र सरकार के साथ हुए समझौता मसौदे के बाद तब यह पहली बार हुआ था जब मुईवाह ने यह कहा कि अलग झंडे और संविधान को लेकर वे कोई समझौता नहीं करेंगे. उन्होंने यह भी कहा कि एग्रीमेंट में सभी नगा इलाकों को एक साथ लाकर ‘ग्रेटर नगालिम’ बनाने की बात भी हुई है.

बता दें कि ग्रेटर नगालिम में असम, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर के भी क्षेत्र आते हैं. इन राज्यों में इस प्रस्ताव का भारी विरोध होता रहा है.

इस बीच सितंबर 2020 में राज्यपाल रवि के साथ हुई एक बैठक के बाद नगा राष्ट्रीय राजनीतिक समूहों की ओर से जारी एक वक्तव्य में कहा गया था कि राजनीतिक समाधान का समय नज़दीक है.

एनएनपीजी के मीडिया प्रकोष्ठ की ओर से जारी एक वक्तव्य में कहा गया था कि इंतज़ार की घड़ियां समाप्त हुईं, नगा शांति समझौते के लिए केंद्र ऐसा समाधान निकालने के लिए आवश्यक क़दम उठा रहा है, जो सभी को स्वीकार्य हो.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)