नॉर्थ ईस्ट

केंद्र ने तीन नगा उग्रवादी समूहों के साथ संघर्ष विराम समझौता एक साल के लिए बढ़ाया

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कहा है कि संघर्ष विराम समझौतों को एक साल के लिए और बढ़ाने का निर्णय लिया गया है, जो एनएससीएन/एनके और एनएससीएन/आरके साथ 28 अप्रैल 2021 से 27 अप्रैल 2022 तक तथा एनएससीएन/के-खांगो के साथ 18 अप्रैल 2021 से 17 अप्रैल 2022 तक प्रभावी रहेगा.

(फोटो: पीटीआई)

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: केंद्र ने नगालैंड के तीन उग्रवादी समूहों के साथ संघर्ष विराम समझौते को सोमवार को एक और साल के लिए बढ़ा दिया, जो अगले वर्ष अप्रैल तक प्रभावी रहेगा.

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि भारत सरकार और नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड/एनके (एनएससीएन/एनके), नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड/रिफॉर्मेशन (एनएससीएन/आर) तथा नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड/के-खांगो (एनएससीएन/के-खांगो) के बीच संघर्ष विराम समझौते जारी हैं.

बयान में कहा गया, ‘संघर्ष विराम समझौतों को एक साल के लिए और बढ़ाने का निर्णय किया गया है, जो एनएससीएन/एनके और एनएससीएन/आर के साथ 28 अप्रैल 2021 से 27 अप्रैल 2022 तक तथा एनएससीएन/के-खांगो के साथ 18 अप्रैल 2021 से 17 अप्रैल 2022 तक प्रभावी रहेगा.’

बहरहाल इन संगठनों के साथ संघर्ष विराम समझौतों पर सोमवार को हस्ताक्षर किए गए. ये तीनों संगठन एनएससीएन-आईएम और एनएससीएन-के से टूटकर बने थे.

एनएससीएन-के ने केंद्र के साथ 2001 में एक संघर्ष विराम समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन 2015 में इसने समझौते को एकतरफा रूप से तोड़ दिया था. उस समय समूह के तत्कालीन अध्यक्ष एसएस खापालांग जीवित थे.

इसके बाद पिछले साल दिसंबर में एनएससीएन-के ने खूंखार उग्रवादी निकी सुमी के नेतृत्व में संघर्ष विराम की घोषणा की थी और कहा था कि संगठन ने शांति वार्ता शुरू करने के लिए केंद्र से संपर्क किया है.

सुमी मणिपुर में 2015 में हुई 18 भारतीय सैनिकों की हत्या में प्रमुख आरोपी था और एनआईए ने उसके सिर पर 10 लाख रुपये का इनाम घोषित किया था.

सबसे बड़े नगा संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम-इसाक मुइवाह (एनएससीएन-आईएम) ने केंद्र सरकार के साथ 1997 में संघर्ष विराम समझौता किया था और वह तभी से शांति वार्ताओं में शामिल रहा है.

इस संगठन ने नगा मुद्दे के स्थायी समाधान के लिए तीन अगस्त 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ नामक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. यह समझौता 18 साल तक चली 80 से अधिक दौर की वार्ता के बाद हुआ था.

इस संबंध में पहली सफलता 1997 में मिली थी, जब नगालैंड में दशकों तक चले उग्रवाद के बाद संघर्ष विराम समझौता हुआ. राज्य में उग्रवाद की समस्या भारत को 1947 में स्वतंत्रता मिलने के कुछ दिन बाद ही शुरू हो गई थी.

हालांकि, वर्तमान में एनएससीएन-आईएम के साथ सरकार की बातचीत में गतिरोध कायम है, क्योंकि संगठन नगालैंड के लिए एक अलग ध्वज और संविधान की मांग कर रहा है, जिसे केंद्र ने खारिज कर दिया है.

गौरतलब है कि बीते साल अगस्त महीने में राज्यपाल आरएन रवि और एनएससीएन-आईएम के बीच खींचतान सामने आई थी, जब संगठन ने केंद्र के वार्ताकार रवि पर इस प्रक्रिया में बाधा डालने का आरोप लगाते हुए भारत सरकार के साथ हुए उनके फ्रेमवर्क एग्रीमेंट को सार्वजनिक कर दिया था.

इसी महीने एनएससीएन-आईएम ने आरएन रवि पर पर नगा राजनीतिक मुद्दों के अंतिम समाधान में बाधक बनने का आरोप लगाते हुए शांति वार्ता आगे बढ़ाने के लिए नए वार्ताकार को नियुक्त किए जाने की मांग की थी.

अक्टूबर 2020 में द वायर  के साथ बातचीत में केंद्र सरकार और नगा समूहों के बीच चल रही शांति वार्ता की प्रक्रिया में हाल ही में आए तनाव के बीच एनएससीएन-आईएम के प्रमुख टी. मुइवाह ने जोर देकर कहा था कि नगा कभी भारतीय संघ का हिस्सा नहीं बनेंगे और न ही वे भारतीय संविधान को स्वीकार करेंगे.

द वायर  को दिए साक्षात्कार में मुइवाह ने साफ किया था कि एनएससीएन-आईएम की अलग नगा झंडे और नगा संविधान की मांग पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा.

बीते मार्च महीने में एनएससीएन-आईएम ने आरएन रवि के द्वारा राजनीतिक वार्ता पूरी होने संबंधी बयान पर कहा था कि ‘बिना सोचे-विचारे यह बयान दिया था और इस समझौते पर बातचीत जारी है. उसने कहा था कि वह ऐसे किसी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करेगा, जिसमें वे मानक पूरे नहीं होते, जिन पर आपसी सहमति बनी है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)