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ग़रीब देशों की महिलाओं को यौन संबंधों से इनकार करने का भी अधिकार नहीं: संयुक्त राष्ट्र

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की रिपोर्ट के मुताबिक, महिलाओं के लिए अपने शरीर पर अधिकारहीनता की स्थिति कोरोना वायरस महामारी के कारण और भी ज़्यादा बदतर हुई है.  संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने एक रिपोर्ट जारी कर कहा है कि महामारी के कारण पिछले वर्ष लिंग आधारित हिंसा में बढ़ोतरी देखी गई और कई देशों में यौन हिंसा को युद्ध की क्रूर युक्ति एवं राजनीतिक दमन के तौर पर इस्तेमाल किया गया.

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

संयुक्त राष्ट्र: संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में बुधवार को कहा गया कि 57 विकासशील देशों में आधे से कम महिलाओं को अपने साथियों के साथ यौन सबंध बनाने के लिए नहीं कहने के अधिकार से वंचित रखा गया है. उन्हें गर्भ निरोधक का इस्तेमाल करने अथवा चिकित्सीय सलाह लेने के बारे में भी फैसला करने का अधिकार नहीं है.

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की इस रिपोर्ट में कहा गया कि यह आंकड़े दुनिया के केवल एक चौथाई देशों के हैं, केवल आधे से अधिक अफ्रीका के हैं.

लेकिन ये परिणाम लाखों महिलाओं और लड़कियों की शारीरिक स्वायत्तता की स्थिति की चिंताजनक तस्वीर सामने रखती है. जिन्हें बिना डर या हिंसा के अपनी देह और अपने भविष्य के बारे में चुनाव करने की शक्ति नहीं है.

रिपोर्ट में कहा गया कि 57 देशों में महज 55 प्रतिशत महिलाएं एवं लड़कियां यह तय कर पाती हैं कि उन्हें यौन संबंध बनाना है या नहीं, गर्भनिरोध का इस्तेमाल करना है या नहीं और यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं संबंधी चिकित्सीय सलाह कब लेनी है.

रिपोर्ट कहती में कहा गया है कि लगभग 20 देशों या क्षेत्रों में ऐसे कानून हैं, जिनके तहत तथाकथित अपने बलात्कारी से विवाह की इजाजत देने वाले कानून प्रचलन में हैं, जहां ऐसा पुरुष आपराधिक मुकदमे का सामना करने से बच जाता है जो उस महिला या लड़की से विवाह कर ले, जिसका उसने बलात्कार किया हो.

43 देशों में ऐसा कोई कानून ही नहीं जिसके तहत, विवाहित जीवन में बलात्कार के मुद्दे पर गौर किया जाए.

रिपोर्ट में कहा गया है कि महिलाओं के लिए अपने शरीर पर अधिकारहीनता की स्थिति कोरोना वायरस महामारी के कारण और भी ज्यादा बदतर हुई है.

इस स्थिति के कारण रिकॉर्ड संख्या में महिलाएं और लड़कियां, लैंगिक हिंसा और हानिकारक परंपराओं व गतिविधियों के जोखिम के दायरे में पहुंच गई हैं, जिनमें कम उम्र में विवाह होना भी शामिल है.

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की कार्यकारी निदेशक, डॉ. नतालिया कानेम ने कहा, ‘शारीरिक स्वायत्तता न देना महिलाओं एवं लड़कियों के मौलिक मानवीय अधिकारों का उल्लंघन है जो असामनता को बढ़ावा देने के साथ ही लैंगिक भेदभाव के कारण होने वाली हिंसा को जारी रखता है.’

उन्होंने कहा, ‘हमारे शरीर पर अपना ही हक न होने के इस तथ्य से हम सभी को गुस्सा आना चाहिए.’

रिपोर्ट में ऐसे विभिन्न तरीकों का जिक्र किया गया है जिनके जरिये न केवल महिलाओं व लड़कियों को उनकी शारीरिक स्वायत्तता से वंचित किया जाता है, बल्कि पुरुषों और लड़कों को भी ऐसे ही हालात का सामना करना पड़ता है.

रिपोर्ट में उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा गया है कि विकलांगता वाली लड़कियों और लड़कों के यौन हिंसा का शिकार होने की तीन गुना ज्यादा संभावना है, उनमें भी लड़कियों को अधिक जोखिम होता है.

संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने कहा, कोविड-19 महामारी के दौरान यौन हिंसा में बढ़ोतरी हुई

कोविड-19 महामारी के कारण पिछले वर्ष लिंग आधारित हिंसा में बढ़ोतरी देखी गई और कई देशों में यौन हिंसा को युद्ध की क्रूर युक्ति एवं राजनीतिक दमन के तौर पर इस्तेमाल किया गया. यह बात सोमवार को संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने एक रिपोर्ट जारी कर कही.

रिपोर्ट में 18 देशों का जिक्र है, जहां के बारे में संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि उसे सत्यापित सूचना प्राप्त हुई. इसमें 52 पक्षों का जिक्र है जिन पर हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में बलात्कार या यौन हिंसा के अन्य प्रारूप का इस्तेमाल करने का ठोस संदेह है. इसमें कहा गया है कि 70 फीसदी से अधिक सूचीबद्ध पक्ष सतत षड्यंत्रकारी हैं.

संयुक्त राष्ट्र की काली सूची में शामिल अधिकतर पक्ष राज्येतर तत्व हैं, जिनमें इस्लामिक स्टेट या अल-कायदा आतंकवादी संगठनों से जुड़े चरमपंथी समूह, बागी या विपक्षी शामिल हैं.

इस सूची में शामिल राष्ट्रीय सेना या पुलिस बलों को तब तक संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में शामिल होने से रोक दिया गया है, जब तक कि वे हिंसा खत्म करने के लिए समयबद्ध प्रतिबद्धताएं नहीं अपनाते हैं. इसमें म्यांमार की सेना और सीमावर्ती गार्ड शामिल हैं.

काली सूची में कांगो और दक्षिण सूडान की सरकार एवं पुलिस बल; सीरिया में सरकारी बल और खुफिया सेवाएं; सूडान में सशस्त्र बल एवं त्वरित समर्थन बल, सोमाली में सेना और पुलिस और पुंटलैंड क्षेत्र के सुरक्षा बल शामिल हैं.

राज्येतर तत्वों वाले देशों में कांगो के 20 समूह; सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक के छह समूह; माली के पांच समूह; दक्षिण सूडान और सीरिया के चार-चार समूह; सूडान के दो समूह; इराक और सोमालिया तथा उसके एक-एक समूह शामिल हैं.

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने कहा, ‘यौन हिंसा को युद्ध की युक्ति के तौर पर इस्तेमाल किया गया, उत्पीड़न एवं आतंकवाद के माध्यम से मानवाधिकारों एवं सुरक्षा को खतरा पैदा किया गया तथा सैन्यीकरण एवं हथियारों का अंधाधुंध इस्तेमाल हुआ.’

गुतारेस ने कहा कि इथियोपिया के टीगरे क्षेत्र में नवंबर में सरकार और टीगरे पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट के बीच संघर्ष छिड़ गया जिसमें 100 से अधिक बलात्कार के मामलों के आरोप हैं.

गुतारेस ने कहा कि म्यांमार के सशस्त्र जातीय संघर्ष में भी यौन हिंसा की खबरें हैं. उन्होंने रखाइन, चिन और शान राज्यों में तातामडाव सुरक्षा बलों ओर जातीय बागी समूहों के यौन हिंसा में लिप्त होने की बात कही.

रिपोर्ट में 2020 की घटनाएं शामिल हैं जो दो फरवरी को म्यांमार की सरकार पर सेना के काबिज होने से पहले की हैं.

महासचिव ने कहा कि कोविड-19 महामारी से जुड़ी आवाजाही की पाबंदियों एवं सीमित आर्थिक अवसर के कारण भी महिलाओं की तस्करी एवं यौन हिंसा का खतरा बढ़ा. उन्होंने कहा कि महामारी के कारण इराक, सीरिया और यमन में बाल विवाह की घटनाएं बढ़ीं.

गुतारेस ने कहा कि पश्चिमी अफ्रीकी देश कैमरून में फरवरी 2020 में अलगाववादियों के खिलाफ सेना के अभियान के दौरान 24 महिलाओं से बलात्कार हुआ और इस घटना का जुलाई तक खुलासा नहीं हुआ था.

उन्होंने कहा, ‘बुरूंडी में विपक्षी दलों की महिलाओं को चुनाव के दौरान धमकाया गया और मनमाने तरीके से हिरासत में रखा गया.’

महासचिव ने कहा कि इसी तरह सूडान में किसानों और गड़ेरियों के बीच संघर्ष के दौरान बलात्कार और सामूहिक बलात्कार की घटनाएं हुईं.

गुतारेस ने संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों से आग्रह किया कि सुनिश्चित करें कि यौन हिंसा पीड़ितों का सहयोग एवं पुनर्वास किया जा सके.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)