कोविड-19

कवि कुंवर बेचैन का कोरोना संक्रमण से निधन

कवि डॉ. कुंवर बेचैन ग़ाज़ियाबाद के नेहरू नगर में रहते थे. बीते 12 अप्रैल को वह और उनकी पत्नी के कोविड-19 से संक्रमित होने का पता चला था. उनकी पत्नी का इलाज सूर्या अस्पताल में चल रहा है.

कुंवर बेचैन. (फोटो साभार: ट्विटर)

कुंवर बेचैन. (फोटो साभार: ट्विटर)

नोएडा: साहित्य जगत के सशक्त हस्ताक्षर एवं देश दुनिया में उत्तर प्रदेश को पहचान दिलाने वाले लेखक और कवि डॉ. कुंवर बेचैन की बृहस्पतिवार को नोएडा के कैलाश अस्पताल में कोविड-19 के संक्रमण की वजह से उपचार के दौरान मृत्यु हो गई. उनके निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई है.

करीब दो सप्ताह पहले कोरोना संक्रमित होने के बाद कुंवर बेचैन को नोएडा के कैलाश अस्पताल में भर्ती कराया गया था. उनकी हालत धीरे-धीरे सुधर रही थी, लेकिन बुधवार रात को उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई. उन्हें वेंटिलेटर पर शिफ्ट किया गया. बृहस्पतिवार दोपहर को उनका निधन हो गया.

कवि कुमार विश्वास ने डॉ. बेचैन के निधन की जानकारी ट्वीट करके दी. उन्होंने ट्वीट कर कहा, ‘कोरोना से चल रहे युद्धक्षेत्र में भीषण दुःखद समाचार मिला है. मेरे कक्षागुरु, मेरे शोधआचार्य, मेरे चाचा जी, हिंदी गीत के राजकुमार और अनगिनत शिष्यों के जीवन में प्रकाश भरने वाले डॉ. कुंवर बेचैन ने ईश्वर के सुरलोक की ओर प्रस्थान किया. कोरोना ने मेरे मन का एक कोना मार दिया.’

डॉ. बेचैन कोविड-19 से संक्रमित हो गए थे. उन्हें नोएडा और गाजियाबाद में कहीं पर अस्पताल में बेड नहीं मिल रहा था. तब कुमार विश्वास ने ट्वीट करके लोगों से मदद मांगी थी.

गौतम बुद्ध नगर के सांसद डॉ. महेश शर्मा ने उनके ट्वीट का संज्ञान लिया, उन्हें सेक्टर 27 स्थित अपने अस्पताल में भर्ती करवाया.

डॉ. कुंवर बेचैन गाजियाबाद के नेहरू नगर में रहते थे. उनकी पत्नी भी कोविड-19 से संक्रमित हैं, उनका उपचार सूर्या अस्पताल में चल रहा है. बीते 12 अप्रैल को दोनों के संक्रमित होने का पता चला था.

कुंवर बेचैन गीत, दोहा, गजल आदि के लिए प्रसिद्ध थे. उनका जन्म मुरादाबाद जिले के उमरी गांव में एक जुलाई 1942 को हुआ था.

1960 के दशक से लेकर 21वीं सदी के पहले दशक तक वह सक्रिय कवि थे. इस दौरान उन्होंने दर्जनों कविता संग्रह प्रकाशित करने के अलावा भारत और विदेशों में अनगिनत संगोष्ठियों में भाग लिया.

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, उनका असली नाम डॉ. कुंवर बहादुर सक्सेना था. चंदौसी और मुरादाबाद से उनकी शिक्षा पूरी हुई. उन्होंने एमकॉम, एमए व पीएचडी किया था. फिर वह अध्यापन में आ गए.

1995 से 2001 तक उन्होंने एमएमएच पोस्टग्रेजुएट कॉलेज गाजियाबाद में हिंदी विभाग में अध्यापन किया और हिंदी विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त हुए. अंत तक वे काव्य मंचों पर सक्रिय रहे. मंचों पर गेय काव्य और अच्छी कविता वाले स्वरूप को बनाए रखने वालों में वह प्रमुख कवि थे.

वह सब टीबी पर प्रसारित हुए कविता के कार्यक्रम वाह! वाह! क्या बात है! के तमाम एपिसोड में नजर आए थे.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)