राजनीति

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस नेता जितिन प्रसाद भाजपा में शामिल

जितिन प्रसाद उन 23 नेताओं में शामिल थे, जिन्होंने पिछले साल कांग्रेस में सक्रिय नेतृत्व और संगठनात्मक चुनाव की मांग को लेकर पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखी थी. तब उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी ज़िले की कांग्रेस कमेटी ने प्रस्ताव पारित कर उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग की थी, जिसे लेकर विवाद भी हुआ था. उनका भाजपा में शामिल होना उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है.

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल और भाजपा सांसद अनिल बलूनी की मौजूदगी में जितिन प्रसाद ने दिल्ली स्थित पार्टी मुख्यालय में सदस्यता ग्रहण की. (फोटो साभार: एएनआई)

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल की मौजूदगी में जितिन प्रसाद ने दिल्ली स्थित पार्टी मुख्यालय में सदस्यता ग्रहण की. (फोटो साभार: एएनआई)

नई दिल्ली: पूर्व केंद्रीय मंत्री और युवा कांग्रेस नेता जितिन प्रसाद ने बुधवार को भाजपा का दामन थाम लिया. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के लिए इसे एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है.

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल और भाजपा सांसद अनिल बलूनी की मौजूदगी में प्रसाद ने दिल्ली स्थित पार्टी मुख्यालय में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान भाजपा की सदस्यता ग्रहण की.

बलूनी ने इस अवसर पर कहा, ‘भाजपा की नीति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व से प्रभावित होकर जितिन प्रसाद भाजपा परिवार में शामिल हुए हैं. हम उनका स्वागत करते हैं.’

भाजपा में शामिल होने से पहले प्रसाद ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की थी.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ट्वीट कर कहा है, ‘कांग्रेस छोड़कर भाजपा के वृहद परिवार में शामिल होने पर जितिन प्रसाद जी का स्वागत है. जितिन प्रसाद जी के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने से उत्तर प्रदेश में पार्टी को अवश्य मजबूती मिलेगी.’

मालूम हो कि जितिन प्रसाद उन 23 नेताओं में शामिल थे, जिन्होंने पिछले साल कांग्रेस में सक्रिय नेतृत्व और संगठनात्मक चुनाव की मांग को लेकर पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखी थी.

पत्र से जुड़े विवाद को लेकर उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले की कांग्रेस कमेटी ने प्रस्ताव पारित कर उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी, जिसे लेकर विवाद भी हुआ था.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, प्रसाद पूरे उत्तर प्रदेश के नेता नहीं हैं, न ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनका महत्वपूर्ण प्रभाव है, जहां से वे आते हैं. प्रसाद खुद पिछले दो लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव हार चुके थे. इसलिए चुनावी दृष्टि से कांग्रेस को यह झटका न्यूनतम है. हालांकि उनके बाहर निकलने का संकेत है कि पार्टी राजनीतिक और सांगठनिक तौर पर बदलाव की अनिच्छा को लेकर नेताओं में निराशा है.

एक साल पहले मध्य प्रदेश से आने वाले युवा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था.

रिपोर्ट के अनुसार, पत्रकार से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि उन्होंने कांग्रेस के साथ अपने तीन पीढ़ी के संबंध को देखते हुए बहुत विचार-विमर्श के बाद भगवा पार्टी में शामिल होने का निर्णय लिया. उन्होंने भाजपा को ‘सच्ची राष्ट्रीय’ पार्टी बताया और कहा कि वह देश के हितों के लिए खड़ी है.

कांग्रेस छोड़ने पर प्रसाद ने कहा, ‘मुझे एहसास हुआ कि मैं लोगों की मदद नहीं कर सकता और न ही उनके हितों की रक्षा कर सकता हूं.’

उन्होंने कहा कि आज अगर कोई राष्ट्रीय दल है तो वह भाजपा है. अन्य दल या तो कुछ लोगों या क्षेत्रों तक ही सीमित हैं.

जितिन प्रसाद ने कहा, ‘मैं कांग्रेस के उन लोगों का शुक्रिया अदा करता हूं, जिन्होंने इतने साल मुझे आशीर्वाद दिया, लेकिन अब मैं एक समर्पित भाजपा कार्यकर्ता के रूप में काम करूंगा.’

जितिन प्रसाद उत्तर प्रदेश के एक ब्राह्मण परिवार से आते हैं और भाजपा में शामिल होने से पहले तक वह पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की ओर से इंचार्ज थे. जितिन प्रसाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे जितेंद्र प्रसाद के पुत्र हैं, जिन्होंने पार्टी में कई अहम पदों पर अपनी सेवाएं दी थीं.

जितिन ने 2004 में शाहजहांपुर से पहली बार लोकसभा का चुनाव जीता था और उन्हें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार में इस्पात राज्यमंत्री बनाया गया था.

इसके बाद उन्होंने 2009 में धौरहरा सीट से जीत दर्ज की. इसके बाद उन्होंने संप्रग सरकार में पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस, सड़क परिवहन और राजमार्ग और मानव, संसाधन विकास राज्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाली थी.

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के बड़े ब्राह्मण चेहरे के रूप में अपनी पहचान स्थापित करने वाले जितिन प्रसाद को 2014 के लोकसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा. इसके बाद उन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव में तिलहर सीट से हाथ आजमाया लेकिन इसमें भी उन्हें निराशा ही मिली.

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भी धौरहरा से उन्हें हार का सामना करना पड़ा था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)