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अयोध्या: क्या ज़मीन भ्रष्टाचार के आरोपों पर राम जन्मभूमि ट्रस्ट से ज़्यादा मीडिया रक्षात्मक है

राम मंदिर ट्रस्ट पर ज़मीन संबंधी भ्रष्टाचार के आरोपों के फौरन बाद इसके महासचिव चंपत राय ने कहा कि वे आरोपों का अध्ययन करेंगे. लोगों का कहना है कि जवाब के लिए उनका अध्ययन पूरा होने का इंतज़ार करना चाहिए, पर मीडिया का एक बड़ा हिस्सा ट्रस्ट की ओर से सफाई देते हुए उसे क्लीन चिट देने की उतावली में दिखता है.

चंपत राय. [बाएं से तीसरे] (फोटो साभार: फेसबुक पेज)

चंपत राय. [बाएं से तीसरे] (फोटो साभार: फेसबुक पेज)

बीती शताब्दी के आखिरी दशक की बात है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रायः सारे आनुषंगिक संगठन विश्व हिंदू परिषद व भारतीय जनता पार्टी को आगे कर अयोध्या में ‘वहीं’ यानी बाबरी मस्जिद की जगह राम मंदिर निर्माण को लेकर आसमान सिर पर उठाए घूम रहे थे तो ‘जनसत्ता’ के तत्कालीन संपादक प्रभाष जोशी ने अयोध्या आकर उनके रंग-ढंग देखने के बाद अपनी एक टिप्पणी में पूछा था: क्या झूठ और फरेब की नींव पर बनेगा भगवान श्री राम का मंदिर?

विडंबना देखिए: तब समूचे संघ परिवार को सांप सूंघ जाने के कारण उनका सवाल तीन दशकों तक अनुत्तरित रहने को अभिशप्त हो गया और अब, जब उसके वर्चस्व वाले श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने ढिठाईपूर्वक ‘जवाब’ देना शुरू किया है तो मुख्यधारा के ज्यादातर संपादकों व पत्रकारों की ऐसी असुविधाजनक पड़तालें करने या उनसे जुड़े सवाल पूछने की आदत ही जाती रही है.

ये आदत नहीं जाती रहती तो ट्रस्ट द्वारा भूमि खरीद का तीन महीने पुराना जो मामला इन दिनों चर्चा में है, उसकी बाबत जानने के लिए आप समाजवादी पार्टी के नेता व उत्तर प्रदेश के पूर्वमंत्री तेजनारायण पांडेय ‘पवन’ या आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह की प्रेस कॉन्फ्रेंसों के मोहताज न होते. कोई न कोई पत्रकार मार्च में ही इस रहस्योद्घाटन का कर्तव्य निभा चुका होता.

मुख्यधारा की पत्रकारिता की इस कर्तव्यहीनता को गवारा किया जा सकता था, बशर्ते वह अभी भी भूल सुधार के मूड में होती. लेकिन अभी भी उसकी हालत ‘हम तो डूबेंगे सनम’ वाली ही दिखती है.

चूंकि ट्रस्ट के पास अपनी सफाई में कहने के लिए कुछ खास नहीं है, पवन और संजय द्वारा दिखाए गए दस्तावेजों को झुठलाने की नाकाम कोशिश के बाद वह किसी भी तरह की जांच से बचने की कोशिश में ठिठक-सा गया है.

इस कारण और कि उसके द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को मामले की रिपोर्ट भेजे जाने के बावजूद ये पंक्तियां लिखने तक उनकी ओर से उसका पक्षपोषण करने वाला कोई बयान नहीं आया है.

डैमेज कंट्रोल में लगे उसके शुभचिंतक व समर्थक यह जरूर कह रहे हैं कि वे जनता की अदालत में जाकर अपनी सफाई देंगे, लेकिन उनके पास इस साधारण से सवाल का जवाब भी नहीं है कि जो सफाई वे जनता के बीच जाकर देंगे, उसे अभी दे देने में उन्हें क्या परेशानी है.

मजे की बात यह कि उनमें से कई सवाल पूछने वालों को अपात्र करार देकर सवाल पूछने की पात्रता निर्धारित करने में लग गए हैं. पूछ रहे हैं कि जिन्होंने कभी भगवान राम को मिथक बताया, ‘वहीं’ राम मंदिर निर्माण के लिए देश के संवैधानिक ढांचे तक को मुंह चिढ़ाने वाली उनकी विध्वंसक कवायदों के विरुद्ध मुंह खोला या मंदिर निर्माण के लिए चंदा नहीं दिया, ट्रस्ट उन्हें कोई जवाब क्यों दें?

निस्संदेह, यह उनके द्वारा ट्रस्ट की उत्तरदायित्वहीनता के पक्ष में ली जा रही एक आड़ भर है, लेकिन एक पल को इसे मान भी लिया जाए, तो वे उन्हें भी जवाब नहीं दे पा रहे, जिन्होंने राम मंदिर हेतु बड़ी-बड़ी रकमें चंदे में दीं.

उन्नाव में भारतीय जनता पार्टी के सांसद साक्षी महाराज यह तक कहने पर उतर आए हैं कि जो लोग राम मंदिर निर्माण में भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे हैं, उन्होंने ट्रस्ट को जो भी चंदा दिया है, रसीदें दिखाकर वापस ले जा सकते हैं.

शिवसेना ने राम मंदिर के लिए एक करोड़ रुपये दिए हैं. लेकिन भूमि खरीद में भ्रष्टाचार के मामले में उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दखल की मांग कर डाली, तो मुंबई से भारतीय जनता पार्टी के विधायक अतुल भाटखलकर ने उसे भी साक्षी महाराज जैसा ही जवाब दिया.

हां, चूंकि ट्रस्ट पर आरोपों फौरन बाद चंपत राय ने कहा था कि वे आरोपों का अध्ययन करेंगे, कई लोग कह रहे हैं कि जवाब के लिए उनका अध्ययन पूरा होने का इंतजार करना चाहिए लेकिन पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा ट्रस्ट की ओर से सफाई और उसे क्लीन चिट देने की उतावली में दिखता है.

वैसे ही जैसे, कभी जमीनदारों के पक्ष में जमीनदारों से ज्यादा उनके कारिंदे व लठैत मुखर रहते थे. यह हिस्सा कह रहा है कि क्या हुआ जो ट्रस्ट ने गत 18 मार्च को दो अलग-अलग भूमि सौदों में लगभग एक जैसे दो भूखंड क्रमशः साढ़े अठारह करोड़ और आठ करोड़ में खरीदे. एक प्रॉपर्टी डीलरों की मार्फत और दूसरी सीधे भूस्वामियों से.

क्या हुआ जो उनमें से साढे़ अठारह करोड़ वाली भूमि प्रॉपर्टी डीलरों ने कुछ ही मिनट पहले दो करोड़ रुपयों में खरीदी थी. यह हिस्सा इतने भर से संतुष्ट होने को तैयार है कि ट्रस्ट के साढ़े अठारह करोड़ देने पर भी उक्त भूमि कथित तौर पर बाजार दर से सस्ती है.

महाराष्ट्र स्थित नागपुर से प्रकाशित दैनिक ‘लोकमत समाचार’ के अयोध्या संवाददाता त्रियुग नारायण तिवारी, जो जनसत्ता के भी संवाददाता हैं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखर समर्थन के लिए जाने जाते हैं, ‘लोकमत समाचार’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट में लिखा है कि ट्रस्ट ने दो भूमि सौदों में कुल छब्बीस करोड़ पचास लाख रुपयों से, जो एक सौ अस्सी बिस्वा भूमि खरीदी है, वह अभी ही साठ करोड़ रुपयों की है और राम मंदिर निर्माण व अयोध्या रेलवे स्टेशन के विकास के बाद एक अरब रुपयों की हो जाएगी.

इसी रिपोर्ट में ट्रस्ट की ओर से सफाई-सी देते हुए उन्होंने लिखा है कि जिस भूमि के साढ़े अठारह करोड़ रुपयों में खरीदे जाने को लेकर विवाद हो रहा है, उसे दो करोड़ रुपयों में बेचने का एग्रीमेंट 2011 से चला आ रहा था, लेकिन बैनामा नहीं हो पा रहा था.

क्यों? कारण बताते हुए वे लिखते हैं कि न्यायालय में उससे जुड़ा एक विवाद लंबित था. ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने सत्ता और प्रशासन में अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके उसे खत्म करा दिया, तब गत 18 मार्च को पहले स्वामियों द्वारा उसे दो करोड़ में पहले प्रॉपर्टी डालरों को बैनामा किया गया, फिर प्रॉपर्टी डीलरों द्वारा साढ़े अठारह करोड़ में ट्रस्ट को बेचने का करार हुआ.

इस क्रम में तिवारी क्या पता जानबूझकर या अनजाने में यह बताना भूल जाते हैं कि 2011 से चले आ रहे जिस एग्रीमेंट का वे हवाला दे रहे हैं, 18 मार्च को भूस्वामियों द्वारा प्रॉपर्टी डीलरों को बैनामे से पहले उसे रद्द करा दिया गया था, ताकि बैनामे में एक अन्य प्रॉपर्टी डीलर का नाम शामिल कर सकें.

लेकिन तिवारी की रिपोर्ट में दी गई यह जानकारी कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है कि ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने इससे पहले न्यायालय में चल रहा उक्त भूमि से जुड़ा विवाद निपटाने के लिए सत्तातंत्र में अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया. यह जानकारी सही है तो ट्रस्ट के भ्रष्टाचार या उसे चंदा देने वालों के प्रति उसकी जवाबदेही का ही नहीं, उसके द्वारा सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का भी मामला है- प्रशासनिक मशीनरी के इस विवाद में लिप्त होने का संकेत भी.

सूत्रों का दावा है कि जिस विवाद का उक्त रिपोर्ट में जिक्र है, उसका एक सिरा सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड तक भी जाता है और अनेक लोगों ने उक्त भूखंड पर वक्फ बोर्ड की ओर से लगाई गई यह सूचना भी देखी है कि वह वक्फ की संपत्ति है और किसी भी द्वारा उसका कोई बैनामा किया जाए तो उसे शून्य समझा जाए.

(फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

(फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

अगर ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने वक्फ की इस दावेदारी को खत्म करने में सत्ता पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया, तो किस हद तक किया, यह भी अभी तक रहस्य ही है.

तिवारी की रिपोर्ट पर एतबार करें, तो प्रॉपर्टी डीलर सुल्तान ने उन्हें बताया कि अयोध्या के जिलाधिकारी अनुज कुमार झा इस सौदे के सिलसिले में उसके घर आकर तीन-चार बार उससे मिले थे.

प्रसंगवश, इन दिनों संघ समर्थक ज्यादातर पत्रकार अपनी यह खुशी छिपाए नहीं छिपा पा रहे कि अयोध्या में सिर्फ ट्रस्ट की भूमि खरीद से ही नहीं, सरकारी विकास कार्यों के लिए किए जा रहे भूमि अधिग्रहण से भी भूमि की कीमतें आसमान पर जा पहुंची हैं. लेकिन वे देखना नहीं गवारा नहीं करते कि इससे गरीबों के तीर्थस्थल के तौर पर अयोध्या की पारंपरिक पहचान पीछे छूटी जा रही है, जिससे मंदिरों की इस नगरी के छोटे और संसाधनविहीन मंदिरों के संत-महंत तक चिंता में हैं.

अब तक आसपास के जिलों में सबसे कम आय में गुजर-बसर मुमकिन देख अनेक विपन्न व गरीब अयोध्या की ओर मुंह कर लिया करते थे. लेकिन अब उनका जीवन लगातार दूभर होता जा रहा है. विकास के नाम पर अंधाधुंध भू-अधिग्रहण और सड़कों को चौड़ा करने के नाम पर संभावित तोड़-फोड़ से अनेक अयोध्यावासियों के सामने विस्थापन की त्रासदी मुंह बाए खड़ी होने का अंदेशा है, सो अलग.

मगर राम मंदिर आंदोलन के दौर से ही संघ परिवार की हमदर्द रही पत्रकारिता उनके दुख से दुखी होने को तैयार नहीं दिखती.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)