दुनिया

तालिबान से मुलाकात करने के लिए भारतीय दल क़तर आया था: क़तर के सरकारी अधिकारी

आतंकवाद और संघर्ष समाधान की मध्यस्थता के लिए क़तर के विशेष दूत मुतलाक़ बिन माजिद अल क़हतानी की इस महत्वपूर्ण टिप्पणी के बाद भारत सरकार की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. आधिकारिक तौर पर अफ़गानिस्तान में भारत केवल अफ़गान सरकार को वैध हितधारक के रूप में मान्यता देता है.

तालिबान के वार्ताकार मुल्ला बिरादर. (फाइल फोटो: रॉयटर्स)

तालिबान के वार्ताकार मुल्ला बिरादर. (फाइल फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: कतर सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने सोमवार को कहा कि एक भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने तालिबान से मिलने के लिए खाड़ी देश कतर की एक गुपचुप यात्रा की थी.

एक वेबिनार के दौरान आतंकवाद और संघर्ष समाधान की मध्यस्थता के लिए कतर के विशेष दूत मुतलाक बिन माजिद अल कहतानी ने भारत और अफगान विद्रोही समूह, तालिबान के बीच संबंधों की पहली आधिकारिक स्वीकृति में इस जानकारी का खुलासा किया.

कतर के सरकारी अधिकारी की महत्वपूर्ण टिप्पणी के बाद भारत सरकार की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.

रुकी हुई अफगान शांति प्रक्रिया में भारत की भूमिका के बारे में द हिंदू के एक प्रश्न के उत्तर में, अल कहतानी ने कहा कि यह एक बहुत जटिल प्रश्न था.

उन्होंने कहा, ‘अफगानिस्तान की धरती किसी भी देश के लिए प्रतिनिधि (Proxy) नहीं बननी चाहिए. हां, अधिक स्थिर अफगानिस्तान होना पाकिस्तान के हित में है. अधिक स्थिर अफगानिस्तान होना भारत के हित में है. हम समझते हैं कि पाकिस्तान एक पड़ोसी देश है. भारत वह देश है, जिसने आर्थिक रूप से बहुत कुछ किया है और निश्चित रूप से वे चाहते हैं कि पाकिस्तान अधिक शांतिपूर्ण और स्थिर हो.’

कतर के अधिकारी ने तब कहा कि नई दिल्ली ने दोहा में तालिबान के राजनीतिक कार्यालय से भी संपर्क किया है.

उन्होंने कहा, ‘मैं समझता हूं कि तालिबान के साथ बात करने के लिए भारतीय अधिकारियों ने चुपचाप यात्रा की है. क्यों? क्योंकि हर कोई यह विश्वास नहीं कर रहा है कि तालिबान हावी होगा और उस पर अधिकार करेगा, बल्कि इसलिए कि तालिबान भविष्य के अफगानिस्तान का एक प्रमुख घटक है. इसलिए, मुझे संवाद या वार्ता करने और अफगानिस्तान में सभी पक्षों तक पहुंचने का कारण दिखाई देता है.’

उन्होंने आगाह किया कि चूंकि यह अफगान शांति प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण चरण था, यदि कोई बैठक हो रही है तो इसका मुख्य कारण पार्टियों को शांतिपूर्ण तरीकों से अपने मतभेदों को हल करने के लिए प्रोत्साहित करना होना चाहिए.

भारत की आधिकारिक नीति तालिबान को किसी भी तरह से मान्यता नहीं देने की रही है और युद्ध से तबाह देश में अफगान सरकार को एकमात्र वैध हितधारक के रूप में मान्यता प्राप्त है.

जब तालिबान को रूस में अफगान सरकार के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत के लिए आमंत्रित किया गया था, तो भारत ने प्रतिनिधिमंडल में अधिकारियों के बजाय सेवानिवृत्त राजनयिकों को पर्यवेक्षकों के रूप में भेजा था.

पिछले साल दोहा समझौते पर आधिकारिक हस्ताक्षर के दौरान कतर में भारत के राजदूत ने समारोह में भाग लिया था. सितंबर 2020 में जब इंट्रा-अफगान वार्ता शुरू हुई, तो भारत ने एक वरिष्ठ राजनयिक को दोहा भेजा, जबकि भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वीडियो लिंक के माध्यम से भाग लिया.

पिछले हफ्ते केन्या और कुवैत की अपनी यात्रा के दौरान जयशंकर कतर से दो बार गुजरे थे. भारत ने कहा था कि उसने कतर के नेतृत्व और अफगानिस्तान सुलह के लिए अमेरिका के विशेष प्रतिनिधि जलमय खलीलजाद से दोहा में मुलाकात की थी.

इस महीने की शुरुआत में हिंदुस्तान टाइम्स ने बताया था कि तालिबान के साथ संपर्क साधने के प्रयासों से भारत की नीति में भारी बदलाव आया था.

लेख के जवाब में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने उस विशेष रिपोर्ट पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया था, लेकिन कहा था कि भारत ने सभी शांति पहलों का समर्थन किया है और क्षेत्रीय देशों सहित कई हितधारकों के साथ जुड़ा हुआ है.

उन्होंने दोहराया, ‘जैसा कि मैंने कहा कि अफगानिस्तान के विकास और पुनर्निर्माण के प्रति हमारी दीर्घकालिक प्रतिबद्धताओं के अनुसरण में हम विभिन्न हितधारकों के साथ संपर्क में हैं.’

यह दूसरी बार है जब खाड़ी देश के किसी अधिकारी ने किसी भारतीय राजनयिक पहल का उल्लेख किया है जिसे नई दिल्ली द्वारा बड़े पैमाने पर छिपाकर रखा गया है.

अप्रैल में अमेरिका में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के राजदूत यूसेफ अल ओतैबा ने कहा था कि खाड़ी देश ने कश्मीर में तनाव कम करने और युद्धविराम करने में एक भूमिका निभाई, उम्मीद है कि अंतत: राजनयिकों को बहाल करने और रिश्ते को स्वस्थ स्तर पर वापस लाने की ओर अग्रसर होगा.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)