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मणिपुर: कंटेंट की निगरानी के लिए सभी ज़िलों को सोशल मीडिया सेल स्थापित करने का निर्देश

मणिपुर के सभी ज़िला पुलिस अधीक्षकों को 15 जुलाई को जारी विभागीय संदेश में मणिपुर के अतिरिक्त डीजीपी (खुफिया) ने राज्य की सभी बोलियों में लिखे गए सभी पोस्ट्स/अपलोड्स/टिप्पणियों की लगातार निगरानी करने और निष्कर्षों पर 15 दिन में एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा गया है.

एन. बीरेन सिंह. (फोटो: पीटीआई)

इम्फाल: विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कानून और व्यवस्था पर हानिकारक प्रभाव डालने वाले पोस्ट की निगरानी को लेकर मणिपुर पुलिस ने सभी जिलों को एक सोशल मीडिया सेल स्थापित करने का निर्देश दिया है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, सभी जिला पुलिस अधीक्षकों (एसपी) को 15 जुलाई को जारी विभागीय संदेश में मणिपुर के अतिरिक्त डीजीपी (खुफिया) ने सदस्यों से मणिपुर की सभी बोलियों में लिखे गए सभी पोस्ट्स/अपलोड्स/टिप्पणियों की लगातार निगरानी करने और निष्कर्षों पर एक पाक्षिक (15 दिन में) रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा.

सदस्यों को विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सर्कुलेट की जा रहीं गैरकानूनी सामग्रियों, सांप्रदायिक पोस्टों आदि को अतिरिक्त डीजीपी के संज्ञान में लाएंगे.

ऐसा पता चला है कि मणिपुर पुलिस ने साल 2020 में मणिपुर के पुलिस महानिदेशक के एक आदेश के बाद अपना सोशल मीडिया सेल स्थापित किया था.

आदेश के अनुसार, मणिपुर के अतिरिक्त डीजीपी (खुफिया) सेल की अध्यक्षता करेंगे, जिसके सदस्य एसपी सीआईडी समेत सभी जिले के एसपी होंगे.

अखबार ने अतिरिक्त डीजीपी (खुफिया) (एडीजीपी) की टिप्पणी के लिए कई प्रयास किए, लेकिन संपर्क नहीं हो सका.

15 जुलाई को जारी सर्कुलर के अनुसार, एडीजीपी ने सभी जिला एसपी को निर्देश दिया कि वे अपनी-अपनी इकाइयों में तुरंत सोशल मीडिया मॉनिटरिंग सेल स्थापित करें, यदि उन्होंने पहले नहीं किया था और जब भी आवश्यक हो, त्वरित कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए.

सर्कुलर में अधिकारियों को जरूरत पड़ने पर साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन से तकनीकी मदद लेने को भी कहा गया है.

जुलाई के दूसरे पखवाड़े से हर महीने की 3 और 18 तारीख को एसपी को निष्कर्षों और की गई कार्रवाई पर एक पाक्षिक रिपोर्ट एडीजीपी को सौंपने के लिए कहा गया है.

इम्फाल स्थित एक अधिकार कार्यकर्ता और ह्यूमन राइट्स अलर्ट (एचआरए) के कार्यकारी निदेशक बब्लू लोइटोंगबाम ने इस कदम को बहुत अधिक दखलअंदाजी वाला करार दिया.

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जेल से रिहा किए गए राजनीतिक कार्यकर्ता एरेन्द्रो लीचोम्बाम का उल्लेख करते हुए लोइटोंगबाम ने कहा कि अपने आप को एक अजीबो-गरीब स्थिति में डालने से बचने के लिए पुलिस को अपने इस फैसले की समीक्षा करनी चाहिए.

बता दें कि एरेन्द्रो को मणिपुर भाजपा अध्यक्ष एस. टिकेंद्र सिंह की कोरोना की वजह से हुई मौत के बाद एक फेसबुक पोस्ट करने के आरोप में 13 मई को गिरफ्तार किया गया था.

एरेन्द्रो ने फेसबुक पोस्ट में कहा था, ‘कोरोना का इलाज गोबर और गोमूत्र नहीं है. इलाज विज्ञान और सामान्य ज्ञान है. प्रोफेसर जी आपकी आत्मा को शांति मिले.’

हालांकि, एक स्थानीय अदालत ने उन्हें जमानत दे दी थी, लेकिन 17 मई को इम्फाल पश्चिम के जिला मजिस्ट्रेट किरण कुमार ने एरेन्द्रो के खिलाफ एनएसए की धारा लगा दी थी.

सोमवार को जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने कहा कि उनको हिरासत में रखने से संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उनके जीवन की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा.

इससे पहले, मणिपुर में भाजपा नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार के तीखे आलोचक एरेन्द्रो को मई 2018 में फेसबुक पेज पर एक वीडियो पोस्ट करने के कारण गिरफ्तार किया गया था.

पुलिस ने दावा किया था कि वीडियो विभिन्न समूहों बीच दुश्मनी और आपराधिक धमकी को बढ़ावा देने वाला है. इसके बाद जून 2018 के पहले सप्ताह में उन्हें एक स्थानीय अदालत से जमानत मिल गई थी.

सोशल मीडिया पर एन. बीरेन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार की आलोचना करने के लिए मणिपुर में कई लोग इस कानून से परेशान हैं.

मई में एरेन्द्रो के साथ ही पत्रकार किशोरचंद्र वांगखेम को भी गिरफ्तार किया गया था, जिन्होंने भाजपा नेता की मृत्यु के बाद कोविड के इलाज पर इसी तरह की पोस्ट की थी. वह फिलहाल जेल में हैं.

यह तीसरा मौका है जब वांगखेम को गिरफ्तार किया गया है. इससे पहले उन्हें दो बार जेल हो चुकी है. उन पर राजद्रोह और एसएसए कानून के तहत भी धाराएं लगाई गई हैं.

किशोरचंद्र को नवंबर 2018 में एक यूट्यूब वीडियो के लिए गिरफ्तार किया गया था, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस की आलोचना की थी. मणिपुर हाईकोर्ट ने उन्हें अप्रैल 2019 के पहले सप्ताह में रिहा कर दिया था.

फिर दिसंबर 2020 में उन्हें एक सोशल मीडिया पोस्ट में राजद्रोह और विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने के आरोप में दो महीने जेल में रखने के बाद एक बार फिर जेल से रिहा कर दिया गया था.

वहीं, अप्रैल 2020 में सरकार द्वारा कोविड से निपटने की सार्वजनिक आलोचना के कारण उनके फेसबुक पोस्ट के लिए कम से कम दो लोगों से पूछताछ की गई. बाद में दोनों ने माफी मांगी और अपने पोस्ट डिलीट कर दिए.

एक अन्य मामले में एक निजी स्कूल के एक 27 वर्षीय शिक्षक जोतिन मैतेई वाकंबम और पांच अन्य को गिरफ्तार कर लिया गया था और राजद्रोह के साथ अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था.

वाकंबम ने एक फेसबुक पोस्ट में कहा था कि वह अपने स्थानीय विधायक का नाम याद नहीं कर पा रहे हैं. दो दिन बाद उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया था.