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दानिश सिद्दीक़ी के शव को क्षत-विक्षत किया गया था, कई गोलियों और टायर के निशान थेः रिपोर्ट

न्यूयॉर्क टाइम्स ने कई भारतीय एवं अफ़ग़ान अधिकारियों के हवाले लिखा है कि पुलित्ज़र पुरस्कार विजेता फोटो पत्रकार दानिश सिद्दीक़ी का शव जब प्राप्त हुआ था तो वह पहचाने जाने लायक नहीं रह गया था. बीते 16 जुलाई को दानिश की मौत अफ़ग़ानिस्तान के कंधार शहर स्पिन बोल्डक में अफ़ग़ान सैनिकों और तालिबान के बीच संघर्ष को कवर करते समय हुई थी.

(फाइल फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: अफगानिस्तान में युद्ध कवरेज के दौरान बीते 16 जुलाई को तालिबान द्वारा हत्या किए गए पुलित्जर पुरस्कार विजेता भारतीय फोटो पत्रकार दानिश सिद्दीकी के शव को क्षत-विक्षत किया गया था, उन पर कई गोलियों के घाव और टायर के निशान थे.

न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट से ये जानकारी सामने आई है.

सिद्दीकी (38) अफगानिस्तान में एक असाइनमेंट पर थे, जब वे मारे गए. पुलित्जर विजेता पत्रकार की कंधार शहर के स्पिन बोल्डक जिले में अफगान सैनिकों और तालिबान के बीच संघर्ष को कवर करते समय मौत हुई थी.

दो भारतीय अधिकारियों और दो अफगान स्वास्थ्य अधिकारियों ने बताया है कि उस दिन शाम तक जब पत्रकार के शव को रेड क्रॉस को सौंपा गया और दक्षिणी शहर कंधार के एक अस्पताल में स्थानांतरित किया गया, तो वह बुरी तरह से क्षत-विक्षत हो चुका था.

न्यूयॉर्क टाइम्स ने इस संबंध में कई तस्वीरों को देखा है, जिनमें से कुछ भारतीय अधिकारियों द्वारा प्रदान की गई थीं और अन्य अस्पताल में अफगान स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा ली गई थीं, जिसमें ये देखा जा सकता है कि सिद्दीकी का शरीर क्षत-विक्षत हो गया था.

एक भारतीय अधिकारी ने कहा कि शरीर पर लगभग एक दर्जन गोलियों के घाव थे और सिद्दीकी के चेहरे और छाती पर टायर के निशान थे.

कंधार के स्वास्थ्य अधिकारियों में से एक ने कहा कि सिद्दीकी का शव शहर के मुख्य अस्पताल में रात 8 बजे के आस-पास पहुंचा था, उनका चेहरा पहचाने जाने जैसा नहीं रह गया था. अधिकारी ने कहा वो ये नहीं पता लगा पाए कि आखिर उनके शरीर के साथ क्या किया गया था.

16 जुलाई को जो हुआ उसे लेकर अलग-अलग दावे करतीं कई सारी रिपोर्ट्स आई हैं.

स्थानीय अधिकारियों के साथ-साथ तालिबान के सदस्यों के बयानों से पता चलता है कि सिद्दीकी और अफगान यूनिट के कमांडर एक गोलीबारी में मारे गए थे, जब उनके काफिले पर कई दिशाओं से घात लगाकर हमला किया गया था.

वहीं कुछ समाचार आउटलेट्स ने बताया है कि सिद्दीकी को तालिबान ने जिंदा पकड़ कर उनकी हत्या की थी. इन रिपोर्टों की पुष्टि नहीं की जा सकी है. हालांकि एक भारतीय अधिकारी ने कहा कि सिद्दीकी के कुछ घाव नजदीक से गोली लगने जैसा प्रतीत होते हैं.

तालिबान के एक प्रवक्ता जबीहुल्ला मुजाहिद ने उनकी ओर से कोई भी गलत काम करने से इनकार करते हुए कहा कि उन्होंने शव का सम्मान करने और उसे रेड क्रॉस को सौंपने के आदेश दिए थे.

हालांकि उस समय क्षेत्र पर तालिबान का नियंत्रण था और कुछ तस्वीरों से पता चलता है कि सिद्दीकी के शरीर के चारों ओर संगठन के लड़ाके खड़े थे.

यह खुलासा इस चिंता के बीच हुआ है कि अफगानिस्तान में लड़ाई तेजी से क्रूर हो गई है, क्योंकि शांति वार्ता ठप हो गई है.

इससे पहले ‘वाशिंगटन एक्जामिनर’ ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि हमले के दौरान सिद्दीकी को छर्रे लगे थे और इसलिए वह तथा उनकी टीम एक स्थानीय मस्जिद में गए, जहां उन्हें प्राथमिक उपचार मिला.

हालांकि, जैसे ही यह खबर फैली कि एक पत्रकार मस्जिद में हैं, तालिबान ने हमला कर दिया. स्थानीय जांच से पता चला है कि तालिबान ने सिद्दीकी की मौजूदगी के कारण ही मस्जिद पर हमला किया था.

रिपोर्ट में कहा गया, ‘सिद्दीकी उस वक्त जिंदा थे, जब तालिबान ने उन्हें पकड़ा. तालिबान ने सिद्दीकी की पहचान की पुष्टि की और फिर उन्हें और उनके साथ के लोगों को भी मार डाला. कमांडर और उनकी टीम के बाकी सदस्यों की मौत हो गई, क्योंकि उन्होंने सिद्दीकी को बचाने की कोशिश की थी.’

अमेरिकन इंटरप्राइज इंस्टिट्यूट में सीनियर फेलो माइकल रूबीन ने लिखा है, ‘व्यापक रूप से प्रसारित एक तस्वीर में सिद्दीकी के चेहरे को पहचानने योग्य दिखाया गया है, हालांकि मैंने भारत सरकार के एक सूत्र द्वारा मुझे प्रदान की गई अन्य तस्वीरों और सिद्दीकी के शव के वीडियो की समीक्षा की, जिसमें दिखा कि तालिबान ने सिद्दीकी के सिर पर हमला किया और फिर उन्हें गोलियों से छलनी कर दिया.’

सिद्दीकी का शव 18 जुलाई की शाम दिल्ली लाया गया और जामिया मिलिया इस्लामिया के कब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्दे खाक किया गया था.

सिद्दीकी मुंबई के रहने वाले थे. उन्होंने दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया से अर्थशास्त्र में स्नातक किया था और 2007 में जामिया के एजेके मास कम्युनिकेशन रिसर्च सेंटर से मास कम्युनिकेशन का अध्ययन किया था. वह 2010 में रॉयटर्स से जुड़े थे.

सिद्दीकी ने अपनी टीम के अन्य लोगों के साथ रोहिंग्या शरणार्थी संकट पर अपने काम के लिए 2018 में पुलित्जर पुरस्कार जीता था.

रॉयटर्स से पहले सिद्दीकी के काम को द गार्जियन, न्यूयॉर्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट, अल जजीरा और अनगिनत अन्य सहित कई भारतीय और अंतरराष्ट्रीय प्रकाशनों द्वारा प्रकाशित किया गया था.

साल 2010 के बाद से रॉयटर्स फोटो पत्रकार के तौर सिद्दीकी ने अफगानिस्तान और इराक में युद्ध, रोहिंग्या शरणार्थियों के संकट, हांगकांग में लोकतंत्र समर्थकों का विरोध और नेपाल भूकंप को कवर किया था.