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अफ़ग़ानिस्तान: काबुल में तालिबान का प्रवेश, कहा- राजधानी को जबरन क़ब्ज़े में लेने की योजना नहीं

अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में प्रवेश के साथ ही तालिबान के प्रवक्ता ने कहा कि वो शांतिपूर्ण हस्तांतरण का इंतज़ार कर रहे हैं. अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा कि अगर अफ़ग़ानिस्तान की सेना अपने देश पर नियंत्रण बनाए नहीं रख सकती या नहीं रखती है, तो भले ही एक और साल हो या पांच और साल, अमेरिकी सेना की उपस्थिति से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता.

(फोटो: रॉयटर्स)

काबुल/वाशिंगटन: तालिबान आतंकियों ने राजधानी काबुल के बाहरी इलाकों में रविवार को प्रवेश कर लिया. चरमपंथियों की देश पर मजबूत होती पकड़ के बीच घबराए सरकारी कर्मचारी दफ्तरों को छोड़कर भाग निकले. इसी दौरान अमेरिका ने दूतावास से अपने राजनयिकों की वापसी शुरू कर दी है.

अफगानिस्तान के एक अधिकारी ने बताया कि तालिबान के वार्ताकार सत्ता के ‘हस्तांतरण’ की तैयारी के लिए राष्ट्रपति के आवास जा रहे हैं. अधिकारी ने गोपनीयता की शर्त पर रविवार को बताया कि इस मुलाकात का उद्देश्य तालिबान को शांतिपूर्ण तरीके से सत्ता सौंपना है.

अफगानिस्तान के तीन अधिकारियों ने समाचार एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस (एपी) को बताया कि तालिबान ने राजधानी काबुल के बाहरी इलाकों में रविवार को प्रवेश कर लिया है.

अधिकारियों ने बताया कि तालिबान आतंकी कलाकान, काराबाग और पघमान जिलों में मौजूद हैं. चरमपंथियों ने इससे पहले जलालाबाद पर कब्जा किया था.

काबुल में गोलीबारी की रुक-रुककर आ रही आवाज के बीच तालिबान ने काबुल को ‘जबरदस्ती’ अपने कब्जे में नहीं लेने का संकल्प लिया. तालिबान के प्रवक्ता ने कहा कि वो शांतिपूर्ण हस्तांतरण का इंतजार कर रहे हैं.

तालिबान ने कहा, ‘किसी की भी जान, संपत्ति, सम्मान को नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा और काबुल के नागरिकों की जिंदगी पर खतरा नहीं होगा.’

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, एक हफ्ते पहले एक अमेरिकी खुफिया अनुमान में कहा गया था कि काबुल को कम से कम तीन महीने तक सुरक्षित रखा जा सकेगा.

राजधानी काबुल के बाहरी इलाकों में प्रवेश से पूर्व रविवार सुबह चरमपंथी संगठन ने जलालाबाद पर कब्जा कर लिया था. इसके कुछ घंटे बाद रविवार को अमेरिका के बोइंग सीएच-47 हेलीकॉप्टर यहां अमेरिकी दूतावास पर उतरे.

काबुल के अलावा जलालाबाद ही ऐसा इकलौता प्रमुख शहर था, जो तालिबान के कब्जे से बचा हुआ था. यह पाकिस्तान से लगती एक प्रमुख सीमा के निकट स्थित है. अब अफगानिस्तान की केंद्रीय सरकार के अधिकार में देश की 34 प्रांतीय राजधानियों में से काबुल के अलावा छह अन्य प्रांतीय राजधानी ही बची हैं.

अमेरिकी दूतावास के निकट राजनयिकों के बख्तरबंद एसयूवी वाहन निकलते दिखे और इनके साथ ही विमानों की लगातार आवाजाही भी देखी गई.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि किलेबंदी वाले वजीर अकबर खान जिले में दूतावास से राजनयिकों को हवाई अड्डे के लिए रवाना किया जा रहा था.

दूतावास की छत के निकट धुआं उठता देखा गया जिसकी वजह अमेरिका के दो सैन्य अधिकारियों के मुताबिक राजनयिकों द्वारा संवेदनशील दस्तावेजों को जलाना है.

अमेरिकी दूतावास के निकट सिकोरस्की यूएस-60 ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर भी उतरे. इन हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल आमतौर पर सशस्त्र सैनिकों को लाने-ले जाने के लिए किया जाता है.

एक अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि अमेरिका की मुख्य टीम के सदस्य काबुल हवाईअड्डे से काम कर रहे हैं. वहीं, नाटो अधिकारियों ने कहा कि यूरोपीय संघ (ईयू) के कई कर्मचाकरी राजधानी में सुरक्षित और गोपनीय ठिकानों पर चले गए हैं.

चेक गणराज्य ने भी अपने दूतावास से अफगान कर्मचारियों को निकालने की योजना को मंजूरी दे दी है. इससे पहले उसने अपने राजनयिकों को काबुल अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डा पहुंचा दिया.

अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने शनिवार को कहा था कि वह 20 वर्षों की उपलब्धियों को बेकार नहीं जाने देंगे. उन्होंने कहा कि तालिबान के हमले के बीच ‘विचार-विमर्श’ जारी है. उन्होंने शनिवार को टेलीविजन के माध्यम से राष्ट्र को संबोधित किया.

हाल के दिनों में तालिबान द्वारा प्रमुख क्षेत्रों पर कब्जा जमाए जाने के बाद से यह उनकी पहली सार्वजनिक टिप्पणी है.

हालांकि, ताजा हालातों पर अभी तक राष्ट्रपति अशरफ गनी का फिलहाल कोई बयान नहीं आया है.

एक ओर अमेरिका अपने दूतावासकर्मियों को निकालने के प्रयासों को तेज कर रहा है वहीं दूसरी ओर हजारों आम लोग काबुल में उद्यानों और खुले स्थानों में शरण लिए हुए हैं.

काबुल में रविवार को शांति रही लेकिन कई एटीएम से नगदी निकासी बंद हो गई, निजी बैंकों के बाहर सैकड़ों की तादाद में जमा लोग अपनी जीवनभर की पूंजी को निकालने की आस लगाए एकत्रित हुए.

तालिबान ने रविवार सुबह कुछ तस्वीरें ऑनलाइन जारी कीं, जिनमें उसके लोगों को नांगरहार प्रांत की राजधानी जलालाबाद में गवर्नर के दफ्तर में देखा जा सकता है. प्रांत के सांसद अबरारुल्ला मुराद ने एसोसिएटिड प्रेस को बताया कि चरमपंथियों ने जलालाबाद पर कब्जा कर लिया है.

तालिबान ने पिछले सप्ताह में अफगानिस्तान के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था, जिसके बाद अफगानिस्तान की केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ गया है. उधर, अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा ने वहां मौजूद अपने राजनयिक स्टाफ की मदद के लिए सैनिकों को भेजा है.

अफगानिस्तान के एक सांसद और तालिबान ने कहा कि चरमपंथियों ने काबुल से महज कुछ दूर पश्चिम में स्थित एक प्रांतीय राजधानी पर कब्जा कर लिया है.

अफगानिस्तान के चौथे सबसे बड़े शहर मजार-ए-शरीफ पर शनिवार को चौतरफा हमलों के बाद तालिबान का कब्जा हो गया था और इसके साथ ही पूरे उत्तरी अफगानिस्तान पर चरमपंथियों का कब्जा हो गया.

दो क्षेत्रीय सैन्य प्रमुख अत्ता मोहम्मद नूर और अब्दुल राशिद दोस्तम शनिवार को उज्बेकिस्तान भाग गए. नूर ने ट्विटर पर लिखा कि उत्तरी क्षेत्र का तालिबान पर कब्जा होना एक साजिश है.

देश की चुनिंदा महिला डिस्ट्रिक्ट गवर्नर में से एक सलीमा माजरी ने मजार-ए-शरीफ पर तालिबान का कब्जा होने से पहले वहां से शनिवार को कहा था, ‘महिलाओं के लिए कोई जगह नहीं बचेगी. प्रांतों पर तालिबान का कब्जा होने से वहां, शहरों में कोई महिला नहीं बचेगी. उनको उनके घरों के भीतर कैद कर दिया जाएगा.’

इस बीच, अफगान अधिकारियों ने कहा कि सैनिकों ने बगराम वायुसेना अड्डे को तालिबान के हवाले किया, यहां 5000 कैदी कैद हैं.

भारत ने राजनयिकों की जल्द वापसी के प्रयास शुरू किए

काबुल के बाहरी इलाकों में तालिबान के प्रवेश करने और सत्ता उसके हाथ में जाने की संभावनाओं के बीच भारत ने अपने राजनयिकों की जल्द निकासी के प्रयास शुरू कर दिए हैं.

रिपोर्ट के अनुसार, फिलहाल वापसी के लिए अभी आदेश नहीं दिए गए हैं, लेकिन भारत कई चरणों में दूतावास कर्मचारियों को निकालने की योजना तैयार कर चुका है.

यह पता चला है कि भारत अपने दूतावास को तब तक बंद रखेगा जब तक कि स्थिति में सुधार नहीं हो जाता. बंद करने की कोई तारीख नहीं है, लेकिन जल्द ऐसा होने की संभावना है.

भारत ने पिछले हफ्ते ही भारतीय नागरिकों को देश छोड़ने की एडवाइजरी जारी कर दी थी.

पिछले साल तक अफगानिस्तान में भारत के चार वाणिज्य दूतावास भी थे, जिसमें दो जलालाबाद और दो हेरात शहर में थे. उन्हें 2020 में बंद कर दिया गया. इसके साथ ही कंधार और मजार-ए-शरीफ से पिछले एक महीने के दौरान राजनयिक चौकियों से भी भारतीय कर्मचारियों को हटा लिया गया.

इससे पहले भारत जनवरी 1994 और सितंबर 1996 में भी सुरक्षा कारणों से अपने दूतावासों को बंद कर चुका है. नवंबर 2001 में अपना राजनयिक मिशन खोलने वाला भारत पहला देश था, जिसमें विवेक काटजू राजदूत थे.

पाकिस्तान ने तालिबान के कब्जे वाले सीमा नाके को किया बंद

अफगानिस्तान के साथ लगती तोरखम सीमा पर तालिबान का कब्जा हो जाने के बाद पाकिस्तान ने इस सीमा नाके को बंद कर दिया है.

पाकिस्तान ने गृह मंत्री शेख राशिद अहमद ने रविवार को बताया कि तोरखम सीमा को बंद करने का निर्णय सीमा पार एक असाधारण स्थिति के कारण लिया गया. अहमद ने स्थानीय ‘जियो टेलीविजन’ को बताया कि अफगान पुलिस ने तालिबान के सामने आत्मसमर्पण कर दिया, जिसके बाद सीमा को बंद कर दिया गया.

अहमद ने बताया कि अफगानिस्तान के साथ लगती चमन सीमा खुली है. पाकिस्तान पहले ही कह चुका है कि वह युद्धग्रस्त देश में संकट के मद्देनजर नए अफगान शरणार्थियों का बोझ नहीं सह सकता. पाकिस्तान सीमा पर बाड़ लगाने का काम पूरा करने वाला है. उसने कहा है कि सीमा पार आतंकवादियों का आवागमन रोकने के लिए यह कदम उठाया गया है.

अमेरिकी राष्ट्रपति ने 1,000 अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती को मंजूरी दी

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने अफगानिस्तान से अमेरिकी और सहयोगी बलों की व्यवस्थित एवं सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करने के लिए युद्धग्रस्त देश में 1,000 और सैनिकों को भेजा है.

अमेरिका ने यह मंजूरी ऐसे समय में दी है जब तालिबान अफगानिस्तान का नियंत्रण पूरी तरह से अपने हाथ में फिर से लेने की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है.

अमेरिका के एक रक्षा अधिकारी ने बताया कि बाइडन ने शनिवार को अपने बयान में कुल 5,000 जवानों की तैनाती को मंजूरी दी, जिसमें वे 1,000 सैनिक भी शामिल हैं, जो पहले से अफगानिस्तान में मौजूद हैं. अमेरिकी 82वीं एयरबोर्न डिवीजन से 1,000 सैनिकों की एक बटालियन को कुवैत में उनकी मूल तैनाती के बजाय काबुल भेज दिया गया था.

रक्षा अधिकारी ने बताया कि पेंटागन ने पहले घोषणा की थी कि 3,000 अतिरिक्त सैनिकों को भेजा जा रहा है.

बाइडन और अमेरिकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने राष्ट्रीय सुरक्षा दल के साथ शनिवार को वीडियो कांफ्रेंस की थी, जिसके बाद राष्ट्रपति ने और बलों की तैनाती की घोषणा की. इस वीडियो कांफ्रेंस में अफगानिस्तान में मौजूद अमेरिकी नागरिकों की वापसी, एसआईवी (विशेष आव्रजक वीजा) आवेदकों को वहां से निकालने और बदल रही सुरक्षा स्थिति की निगरानी के लिए चल रहे प्रयासों पर चर्चा की गई.

बाइडन ने एक बयान में कहा, ‘हमारे राजनयिक, सैन्य और खुफिया दलों की सिफारिशों के आधार पर मैंने लगभग 5,000 अमेरिकी सैनिकों की तैनाती को मंजूरी दी है, ताकि हम अफगानिस्तान से अमेरिकी और अन्य संबद्ध कर्मचारियों की व्यवस्थित और सुरक्षित तरीके से वापसी सुनिश्चित कर सकें. साथ ही हम अपने अभियान के दौरान अपने बलों की मदद करने वाले अफगान नागरिकों और तालिबान के आगे बढ़ने के कारण जिन लोगों को विशेष रूप से खतरा है, उनकी व्यवस्थित एवं सुरक्षित निकासी सुनिश्चित कर सकें.’

बता दें कि बाइडन ने जुलाई में औपचारिक घोषणा की थी कि अमेरिकी सैनिक 31 अगस्त तक अफगानिस्तान से वापस आ जाएंगे. वह बलों की वापसी संबंधी अपने फैसले पर दृढ़ हैं.

उन्होंने इस सप्ताह की शुरुआत में संवाददाताओं से कहा कि उन्हें इस पर खेद नहीं है और अब समय आ गया है कि अफगानिस्तान के लोग ‘अपने लिए लड़ें’.

राष्ट्रपति ने 11 सितंबर से पहले अफगानिस्तान से अपने सभी बलों की वापसी संबंधी अपनी योजनाओं में किसी भी बदलाव से इनकार किया. उन्होंने कहा, ‘मैं अफगानिस्तान में अमेरिकी बलों की मौजूदगी का नेतृत्व करने वाला चौथा राष्ट्रपति हूं.’ उन्होंने कहा कि वह नहीं चाहते कि उनके बाद पांचवें राष्ट्रपति को भी युद्ध की कमान संभालनी पड़े.

उन्होंने अफगानिस्तान से अमेरिकी बलों की वापसी की प्रक्रिया तेज करने के अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि वह ‘दूसरे देश के असैन्य संघर्ष के बीच अमेरिका की कभी समाप्त न होने वाली उपस्थिति’ को उचित नहीं ठहरा सकते.

बाइडन ने कहा, ‘अफगानिस्तान में हमारे देश के 20 वर्षों के युद्ध में, अमेरिका ने अपने बेहतरीन युवा पुरुषों और महिलाओं को वहां भेजा है, लगभग एक हजार अरब डॉलर का निवेश किया है, 3,00,000 से अधिक अफगान सैनिकों और पुलिसकर्मियों को प्रशिक्षित किया है, उन्हें अत्याधुनिक सैन्य उपकरणों से लैस किया है और अमेरिकी इतिहास के सबसे लंबे युद्ध के तहत उनकी वायु सेना का रखरखाव किया है.’

बाइडन ने अपने बयान में कहा, ‘यदि अफगान सेना अपने देश पर नियंत्रण बनाए नहीं रख सकती या नहीं रखती है, तो भले ही एक और साल हो या पांच और साल, अमेरिकी सेना की उपस्थिति से कोई फर्क नहीं पड़ता.’

बाइडन ने कहा कि उन्होंने सशस्त्र बलों और खुफिया समुदाय को यह सुनिश्चित करने का आदेश दिया है कि अमेरिका अफगानिस्तान से भविष्य में होने वाले आतंकवादी खतरों से निपटने की क्षमता और सतर्कता बनाए रखे.

उन्होंने अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन को अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी और अन्य अफगान नेताओं की मदद करने का भी निर्देश दिया है, जो और रक्तपात को रोकने और राजनीतिक समझौता करने का प्रयास कर रहे हैं. इसके कुछ ही देर बाद ब्लिंकन ने गनी से बातचीत की.

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता नेड प्राइस ने कहा, ‘उन्होंने (ब्लिंकन और गनी ने) हिंसा को कम करने के लिए चल रहे राजनयिक और राजनीतिक प्रयासों की तात्कालिकता पर चर्चा की.’

प्राइस ने कहा कि ब्लिंकन ने अफगानिस्तान सरकार के साथ मजबूत राजनयिक और सुरक्षा संबंधों को लेकर अमेरिका की प्रतिबद्धता और अफगानिस्तान के लोगों के प्रति अमेरिका के निरंतर समर्थन पर भी जोर दिया.

बाइडन ने कहा कि ब्लिंकन प्रमुख क्षेत्रीय हितधारकों के साथ भी वार्ता करेंगे. उन्होंने कहा, ‘हमने अपने कमांडर के माध्यम से दोहा में तालिबान के प्रतिनिधियों को अवगत करा दिया है कि अफगानिस्तान में यदि उसकी कोई कार्रवाई अमेरिकी कर्मचारियों या हमारे अभियान को खतरे में डालती है, तो अमेरिकी सेना इसके जवाब में त्वरित एवं प्रभावी कार्रवाई करेगी.’

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने उत्तराधिकारी बाइडन की आलोचना की और उन पर असंगत फैसलों से अफगान नीति पर पूरी तरह से विफल होने का आरोप लगाया.

उन्होंने कहा, ‘तालिबान अब अमेरिका या अमेरिका की शक्ति से नहीं डरता है या उसका सम्मान नहीं करता. कितनी शर्म की बात होगी, जब तालिबान काबुल में अमेरिकी दूतावास पर झंडा फहराएगा. यह कमजोरी, अक्षमता और रणनीतिक रूप से असंगत फैसलों के कारण मिली एक पूर्ण विफलता है.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)