भारत

देश में 2019 में पचास प्रतिशत से अधिक कृषक परिवार क़र्ज़ में दबे: सर्वे

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने जनवरी-दिसंबर 2019 के दौरान देश के ग्रामीण क्षेत्रों में परिवारिक भूमि और पशुधन के अलावा कृषि परिवारों की स्थिति का आकलन किया. इसके अनुसार 2019 में कृषक परिवारों पर प्रति परिवार औसतन 74,121 रुपये क़र्ज़ था. सर्वे के मुताबिक़, कुल क़र्ज़ में 57.5 % कृषि उद्देश्य से लिए गए.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: देश में खेती-बाड़ी करने वाले आधे से अधिक परिवार कर्ज के बोझ तले दबे हैं.

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के एक सर्वे के अनुसार 2019 में 50 प्रतिशत से अधिक कृषक परिवार कर्ज में थे और उन पर प्रति परिवार औसतन 74,121 रुपये कर्ज था.

सर्वे में कहा गया है कि उनके कुल बकाया कर्ज में से केवल 69.6 प्रतिशत बैंक, सहकरी समितियों और सरकारी एजेंसियों जैसे संस्थागत स्रोतों से लिए गए. जबकि 20.5 प्रतिशत कर्ज पेशेवर सूदखोरों से लिए गए.

इसके अनुसार कुल कर्ज में 57.5 प्रतिशत ऋण कृषि उद्देश्य से लिए गए.

सर्वे में कहा गया है, ‘कर्ज ले रखे कृषि परिवारों की संख्या 50.2 प्रतिशत है. वहीं प्रति कृषि परिवार बकाया ऋण की औसत राशि 74,121 रुपये है.’

एनएसओ ने जनवरी-दिसंबर 2019 के दौरान देश के ग्रामीण क्षेत्रों में परिवार की भूमि और पशुधन के अलावा कृषि परिवारों की स्थिति का आकलन किया.

सर्वे के अनुसार कृषि वर्ष 2018-19 (जुलाई-जून) के दौरान प्रति कृषि परिवार की औसत मासिक आय 10,218 रुपये थी. इसमें से मजदूरी से प्राप्त प्रति परिवार औसत आय 4,063 रुपये, फसल उत्पादन से 3,798 रुपये, पशुपालन से 1,582 रुपये, गैर-कृषि व्यवसाय 641 रुपये तथा भूमि पट्टे से 134 रुपये की आय थी.

इसमें कहा गया है कि देश में कृषि परिवार की संख्या 9.3 करोड़ अनुमानित है. इसमें अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) 45.8 प्रतिशत, अनुसूचित जाति 15.9 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति 14.2 प्रतिशत और अन्य 24.1 प्रतिशत हैं.

सर्वे के अनुसार गांवों में रहने वाले गैर-कृषि परिवार की संख्या 7.93 करोड़ अनुमानित है. इससे यह भी पता चला कि 83.5 प्रतिशत ग्रामीण परिवार के पास एक हेक्टेयर से कम जमीन है. जबकि केवल 0.2 प्रतिशत के पास 10 हेक्टेयर से अधिक जमीन थी.

इस बीच, एक अन्य रिपोर्ट में एनएसओ ने कहा कि 30 जून, 2018 की स्थिति के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में कर्ज लेने वाले परिवार का प्रतिशत 35 था (40.3 प्रतिशत कृषक परिवार, 28.2 प्रतिशत गैर-कृषि परिवार) जबकि शहरी क्षेत्र में यह 22.4 प्रतिशत (27.5 प्रतिशत स्व-रोजगार से जुड़े परिवार, 20.6 प्रतिशत अन्य परिवार) थे.

सर्वे में यह भी पाया गया कि ग्रामीण क्षेत्रों में कर्ज ले रखे परिवारों में से 17.8 प्रतिशत परिवार संस्थागत एजेंसियों से (जिनमें 21.2 प्रतिशत कृषक परिवार और 13.5 प्रतिशत गैर-कृषक परिवार) जबकि शहरी क्षेत्रों में 14.5 प्रतिशत परिवार संस्थागत कर्जदाताओं से (18 प्रतिशत स्व-रोजगार करने वाले तथा 13.3 प्रतिशत अन्य परिवार) कर्ज ले रखे थे.

इसके अलावा ग्रामीण भारत में करीब 10.2 प्रतिशत परिवारों ने गैर- संस्थागत एजेंसिंयों से कर्ज लिया जबकि शहरी भारत में यह संख्या 4.9 प्रतिशत परिवार थी. वहीं ग्रामीण भारत में सात प्रतिशत परिवार ऐसे थे, जिन्होंने संस्थागत कर्ज और गैर-संस्थागत दोनों तरह से कर्ज लिया था जबकि शहरी क्षेत्र में ऐसे परिवारों की संख्या तीन प्रतिशत थी.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, जुलाई-दिसंबर 2018 के दौरान राष्ट्रीय औसत बकाया ऋण 74,121 रुपये था, यह आंध्र प्रदेश में सबसे अधिक 2.45 लाख रुपये और नगालैंड में सबसे कम 1,750 रुपये था.

जिन 28 राज्यों का डेटा उपलब्ध है, उनमें से 11 राज्यों – आंध्र प्रदेश, केरल, पंजाब, हरियाणा, तेलंगाना, कर्नाटक, राजस्थान, तमिलनाडु, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश – 2018 में प्रति परिवार औसत बकाया ऋण राष्ट्रीय औसत से अधिक था.

तीन राज्यों- आंध्र प्रदेश (2.45 लाख रुपये), केरल (2.42 लाख रुपये) और पंजाब (2.02 लाख रुपये) में प्रति कृषक परिवार का औसत बकाया ऋण 2 लाख रुपये से अधिक था; पांच राज्यों – हरियाणा (1.82 लाख रुपये), तेलंगाना (1.52 लाख रुपये), कर्नाटक (1.26 लाख रुपये), राजस्थान (1.13 लाख रुपये) और तमिलनाडु (1.06 लाख रुपये) में यह एक लाख रुपये से अधिक था.

2013 और 2018 के बीच, 25 राज्यों में प्रति कृषक परिवार औसत बकाया ऋण 13.52 प्रतिशत से बढ़कर 709 प्रतिशत हो गया है, जबकि तीन राज्य – तमिलनाडु (-8 प्रतिशत), मणिपुर (-9 प्रतिशत) और अरुणाचल प्रदेश (34 प्रतिशत) – गिरावट दर्ज की गई.

16 राज्यों में राष्ट्रीय औसत 57.7 प्रतिशत से अधिक वृद्धि देखी गई, जिनमें से 10 में 100 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई- मिजोरम (709 प्रतिशत), असम (382 प्रतिशत), त्रिपुरा (378 प्रतिशत) प्रतिशत), सिक्किम (225 प्रतिशत), हिमाचल प्रदेश (206 प्रतिशत), नगालैंड (191 प्रतिशत), जम्मू और कश्मीर (149 प्रतिशत), मध्य प्रदेश (131 प्रतिशत), हरियाणा (131 प्रतिशत) और छत्तीसगढ़ (110.23 प्रतिशत).

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)