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योजनाएं सिर्फ़ काग़ज़ पर, महाराष्ट्र सरकार ने कुपोषण से मौत रोकने के लिए क्या क़दम उठाए: कोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट 2007 में दाख़िल एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें अमरावती ज़िले के मेलघाट क्षेत्र में कुपोषण की वजह से बच्चों, गर्भवती महिलाओं तथा स्तनपान कराने वाली महिलाओं की बड़ी संख्या में मृत्यु के मामलों को रेखांकित किया गया था. याचिका के अनुसार, इलाके में इस साल अगस्त से सितंबर के बीच कुपोषण तथा डॉक्टरों की कमी की वजह से 40 बच्चों की मौत हुई और 24 बच्चे मृत जन्मे.

बॉम्बे हाईकोर्ट (फोटो: पीटीआई)

मुंबई: बॉम्बे उच्च न्यायालय ने सोमवार को कहा कि आदिवासी समुदायों के लिए कल्याणकारी योजनाएं केवल कागज पर हैं. अदालत ने पूछा कि महाराष्ट्र के आदिवासी क्षेत्रों में कुपोषण से बच्चों की मृत्यु रोकने के लिए राज्य सरकार क्या कदम उठा रही है.

मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और जस्टिस जीएस कुलकर्णी की खंडपीठ ने कहा कि अगर राज्य के मेलघाट इलाके (अमरावती जिला) में बच्चे अब भी कुपोषण से मर रहे हैं तो कल्याणकारी योजनाओं का कोई लाभ नहीं है.

इस क्षेत्र के कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय याचिकाकर्ताओं ने अदालत को सूचित किया कि इस साल अगस्त से सितंबर के बीच कुपोषण तथा इलाके में डॉक्टरों की कमी की वजह से 40 बच्चों की मृत्यु हो गई और 24 बच्चे मृत जन्मे.

अदालत ने कहा, ‘अगर इतनी बड़ी संख्या में बच्चों की मृत्यु हुई है, तो इन सभी योजनाओं का क्या फायदा? ये योजनाएं केवल कागज पर हैं. हम जानना चाहते हैं कि बच्चों की मृत्यु क्यों हो रही है और राज्य सरकार क्या कदम उठा रही है.’

उच्च न्यायालय 2007 में दाखिल एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें मेलघाट क्षेत्र में कुपोषण की वजह से बच्चों, गर्भवती महिलाओं तथा स्तनपान कराने वाली महिलाओं की बड़ी संख्या में मृत्यु के मामलों को रेखांकित किया गया था.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, याचिका में क्षेत्र के सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में स्त्री रोग विशेषज्ञों, बाल रोग विशेषज्ञों और रेडियोलॉजिस्ट की कमी पर भी चिंता जताई गई है.

महाराष्ट्र के महाधिवक्ता आशुतोष कुंभकोनी ने अदालत को बताया कि इन केंद्रों पर चिकित्सा अधिकारियों की नियुक्ति कर दी गई है.

हालांकि, महाराष्ट्र सरकार द्वारा दायर हलफनामों पर गौर करते हुए अदालत ने कहा कि राज्य में गढ़चिरोली और गोंदिया जैसे क्षेत्रों में अभी भी सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में चिकित्सा अधिकारियों के पद खाली हैं.

अदालत ने कहा, ‘पुणे और नागपुर जैसे शहरी इलाकों में सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में 100 प्रतिशत चिकित्सक हैं, लेकिन गोंदिया और गढ़चिरोली जैसे क्षेत्रों में 50 प्रतिशत से अधिक पद खाली पड़े हैं.’

इस पर कुंभकोनी ने कहा कि डॉक्टर नियुक्त हैं, लेकिन वे ड्यूटी पर रिपोर्ट नहीं करते हैं, क्योंकि वे इन क्षेत्रों में काम नहीं करना चाहते हैं.

अदालत ने कहा कि इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता और ऐसे डॉक्टरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए.

अदालत ने कहा, ‘हम मानते हैं कि ये परेशानी वाले क्षेत्र हैं. हो सकता है कि राज्य कुछ प्रोत्साहन दे सकता है. यह राज्य सरकार को सुनिश्चित करना है कि राज्य के आदिवासी क्षेत्र में चिकित्सा अधिकारी हों.’

हाईकोर्ट ने ऐसे क्षेत्रों में आहार विशेषज्ञ नियुक्त करने का भी सुझाव दिया.

पीठ ने मामले की आगे की सुनवाई के लिए 20 सितंबर की तारीख तय की और कहा कि राज्य को इस मुद्दे के समाधान के लिए कुछ तत्काल कदम उठाने चाहिए.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)