भारत

दिल्ली: मामूली अपराधों में किशोरों के ख़िलाफ़ लंबित मामले बंद न करने पर सरकार को फटकार

बीते एक अक्टूबर को दिल्ली हाईकोर्ट ने किशोरों के ख़िलाफ़ एक साल से अधिक समय से लंबित मामले तत्काल प्रभाव से ख़त्म करने का आदेश दिया था. इस पर कोई क़दम न उठाने जाने पर दिल्ली सरकार को फटकारते हुए कोर्ट ने कहा कि बच्चों व किशोरों को इंतज़ार नहीं कराया जा सकता.

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने किशोर न्याय बोर्ड (जेजेबी) के समक्ष लंबित नाबालिगों से जुड़े मामूली आरोपों वाले सभी मामलों को तत्काल प्रभाव से समाप्त करने के उसके आदेश के पालन के लिए कोई कदम नहीं उठाने पर दिल्ली सरकार को मंगलवार को फटकार लगाई.

उच्च न्यायालय ने कहा कि केंद्र शासित प्रदेश ने उस निर्देश का भी पालन नहीं किया है जिसमें उसे अदालत को ऐसे मामलों की संख्या बताने को कहा गया था जिनकी जांच किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष जांच छह माह से लेकर एक वर्ष की अवधि से लंबित हैं.

इसके अलावा जांच की तारीख और प्रत्येक मामले में पहली पेशी के बारे में जानकारी देने का भी निर्देश दिया गया था.

जब अदालत को यह बताया गया कि सरकार इंतजार कर रही है क्योंकि नियमों में कुछ संशोधन हो रहे हैं और किशोरों को बोर्ड के समक्ष पेश करने के लिए दस दिन का और वक्त चाहिए, तो इस पर न्यायाधीश सिद्धार्थ मृदुल और जस्टिस अनूप जयराम भंभानी की पीठ ने कहा, ‘बच्चे इंतजार नहीं कर सकते. किशोर इंतजार नहीं कर सकते. आपको जितना वक्त चाहिए आप ले सकते हैं, लेकिन बच्चों को इंतजार नहीं कराया जा सकता.’

सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार ने अदालत को एक चार्ट दिखाया जिनमें 409 किशोरों का अंतर था, इनमें जेजेबी के समक्ष पेश किशोर और रिहा किए गए किशोर शामिल हैं.

इस पर अदालत ने कहा, ‘ ये 409 किशोर कहां हैं? ये कहां गायब हो गए. ये 409 (नाबालिग) तंत्र में कहीं खो जाएंगे. क्या हो रहा है? इन 409 का क्या हुआ और ये कहा हैं?’

पीठ ने आगे कहा कि सरकार का आचरण संतोषजनक नहीं है और अदालत का 29 सितंबर का फैसला जिसमें कहा गया कि किसी भी बच्चे के जेजे अधिनियम के तहत किसी मामले में आने पर उसे 24 घंटे के अंदर जेजेबी के समक्ष पेश किया जाना, पूरी तरह से स्पष्ट है और इसमें कहीं कोई अस्पष्टता नहीं है.

पीठ ने सरकार को एक हलफनामा दाखिल करके यह बताने के लिए एक सप्ताह का वक्त दिया कि सरकार ने अदालत के आदेश का पालन करते हुए क्या कदम उठाए हैं.

अदालत ने प्रश्न किया कि कब तक सभी किशोरों को जेजेबी के समक्ष पेश किया जाएगा, इस पर सरकारी वकील ने कहा यह काम दस दिन में कर लिया जाएगा.

इस पर पीठ ने कहा, ‘आपको अभी तक ये सब कर लेना चाहिए था. हमें आश्चर्य है कि जेजेबी क्या कर रहे हैं. क्यों उन्हें हमारे आदेश की जानकारी नहीं है? उन्हें हमारे आदेश का पालन करना चाहिए. अब तक जेजेबी को पुलिस को सभी किशोरों को बोर्ड के समक्ष पेश करने के आदेश दे देने चाहिए.’

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, पीठ ने कहा, ‘हम समझ सकते हैं कि कार्यपालिका को हमारे आदेश का पालन करने में मुश्किल हो रही है, लेकिन हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि जेजेबी को हमारे आदेश का पालन करने में मुश्किल क्यों हो रही है. हम इससे आंखें नहीं मूंद सकते.’

जब सरकारी वकील ने कहा कि अदालत का 29 सितंबर का आदेश वरदान है, तो पीठ ने पलटवार करते हुए कहा कि अभी आदेश का पालन नहीं किया गया है और यह किसी के लिए वरदान कैसे हो सकता है.

अदालत ने कहा कि अधिकारी 24 घंटे के भीतर किशोरों को जेजेबी के समक्ष पेश नहीं करने के लिए कोविड​​​​-19 महामारी का आधार नहीं ले सकते हैं. साथ ही कहा कि जब पुलिस महामारी में नहीं रुकी, तो उसे सभी दस्तावेज संबंधी कार्य भी करने होंगे.

मामले में न्यायमित्र अधिवक्ता एचएस फुल्का ने कहा कि पीठ अदालत के रजिस्ट्रार को जेजेबी को आदेश के अनुपालन संबंधी आदेश भेजने के निर्देश दे सकती है.

गौरतलब है कि दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने अदालत को सूचित किया कि इस साल 30 जून तक किशोरों के छोटे-मोटे अपराधों से संबंधित 795 मामले यहां छह जेजेबी के समक्ष छह महीने से लेकर एक वर्ष से तथा 1,108 मामले एक वर्ष से अधिक समय से लंबित हैं.

बता दें कि बीते एक अक्टूबर को दिल्ली हाईकोर्ट ने किशोरों के ख़िलाफ़ एक साल से अधिक समय से लंबित मामले ख़त्म करने का आदेश दिया था.

अदालत अपने आदेश में कहा था, ‘बच्चों/किशोरों के खिलाफ छोटे-मोटे अपराधों का आरोप लगाने वाले ऐसे सभी मामलों में जांच को तत्काल समाप्त कर दिया जाए, जिनमें जांच लंबित है और एक वर्ष से अधिक समय तक कोई निर्णय नहीं लिया गया है. इसमें इस बात को नहीं देखा जाएगा कि बच्चे/किशोर को किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष पेश किया गया या नहीं.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)