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मन्नू भंडारी, जिन्होंने आम ज़िंदगी को उसके अंतर्द्वंद्वों के साथ अपनी लेखनी में समेटा…

स्मृति शेष: मन्नू भंडारी को पढ़ते वक़्त ज़िंदगी अपने सबसे साधारण, निजी से भी निजी और सबसे विशुद्ध रूप में सामने आती है- और हम तुरंत ही उससे कुछ अपना जोड़ लेते हैं. मन्नू भंडारी की रचनाएं किसी समाज को बदलकर रख देने का वादा नहीं करती और न स्वयं लेखक ही पाठक को इस मुगालते में रखती हैं.

मन्नू भंडारी. (जन्म: 3 अप्रैल1931-अवसान: 15 नवंबर 2021) [फोटो साभार: राजकमल प्रकाशन समूह]

हिंदी जगत की लोकप्रिय लेखिका मन्नू भंडारी का शुमार संभवतः उन रचनाकारों में किया जा सकता है जिन्होंने कम लिखा पर गुणवत्ता की मयार पर ये चंद रचनाएं ही उनकी पहचान बन गईं.

मन्नू भंडारी’- यह वह नाम है जिनकी महानता के कसीदे नहीं पढ़े गए या जिसके लेखन को किसी विचारधारा या किसी वाद से नहीं जोड़ा गया, पर फिर भी एक बड़े जन-समुदाय ने इन्हें स्वीकार किया. हालांकि लिखना भी उन्होंने एक लंबे अरसे से छोड़ दिया था, और जो लिखा था वह भी एक अलग समय में, एक अलग संदर्भ में रचा था, पर वाकई आश्चर्य होता है कि उनके लिखे से तादात्म्य कर पाना हर किसी के लिए क्यों सहज था?

आज भी जब निर्देशक बासु चटर्जी की रजनीगंधा (1974) फिल्म देखते हैं, जो मन्नू भंडारी की बहुचर्चित कहानी ‘यही सच है’ (1966) पर आधारित थी, तो नायिका दीपा की मनःस्थिति और प्रेम को लेकर उसकी दुविधा कितनी वास्तविक और प्रासंगिक लगती है. कहानी में दीपा के मन में चलने वाले अंतर्द्वंद्व को जिस बारीक मनोवैज्ञानिकता से मन्नू जी दिखलाती हैं, वह सही मायने में स्त्री को, उसकी इच्छाओं को हाशिये से केंद्र में लाने की कवायद लगती है.

मन्नू भंडारी का लेखन कई दशकों में समाहित रहा है, पर उनकी रचनात्मकता का उफान हमें 1960-1980 के बीच में दिखता है जब न केवल नई कहानी आंदोलन हिंदी-साहित्य को आप्लावित कर रहा था, बल्कि उनका समकालीन महिला लेखन भी अपने चरम पर था.

मसलन एक तरफ चित्रा मुद्गल आंवा में ट्रेड यूनियन के आंदोलनों पर लिख रही थीं, तो वहीं कृष्णा सोबती (1925-2019) पंजाब के जीवन से अपनी ऊर्जा ग्रहण कर रही थीं और विशेषकर 1947 के विभाजन की स्मृतियों से संचालित थीं. इसी प्रकार, मृदुला गर्ग, जो चित्तकोबरा में पितृसत्तात्मकता को चुनौती दे रही थीं, तो वहीं उषा प्रियंवदा स्त्री-मुक्ति और उन्हें एजेंसी देने की कोशिश करते हुए प्रवासी स्त्रियों की चर्चा कर रही थीं.

इस पूरी पृष्ठभूमि में इन सब लेखिकाओं के बरअक्स मन्नू भंडारी का लेखन मुख्यतः आधुनिक संदर्भों में मध्यवर्गीय स्त्रियों को, विशेषकर शिक्षित और कामकाजी स्त्रियों को केंद्र में ला रहा था. जहां तक विचारधारा की बात है मन्नू भंडारी किसी ‘कल्ट’ का हिस्सा नहीं रहीं.

अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था, ‘मैं किसी विचारधारा से प्रभावित होकर नहीं लिखती. मेरा जुड़ाव न किसी विचारधारा, न व्यक्ति, बल्कि, ज़िंदगी के साथ है. मैंने ज़िंदगी को नंगी आंखों से देखा और जैसा देखा, जैसा महसूस किया ज़िंदगी से जुड़कर, उसको ही अपनी कहानियों में अभिव्यक्ति दी.’ और ज़िंदगी से जुड़ने के लिए, साधारण लोगों के रोजमर्रा के वो घटनाहीन अनुभव दर्ज करने के लिए, किसी बड़े बुद्धिजीवी की ज़िंदगी उन्होंने नहीं जी.

जैसा कि खुद राजेंद्र यादव कहा करते थे ‘मन्नू खांटी घरेलू औरत है’, वह अपनी साधारणता में भी विचारों को तराशती रहीं, उसके लिए कोई छद्म बौद्धिकता अपने ऊपर नहीं ओढ़ी. वह एक ही समय में घरेलू स्त्री रहकर भी, कामकाजी-आत्मनिर्भर हो सकती थीं और इन्हीं सब के बीच अपने आस-पास के जीवन के यथार्थ से जुड़कर गहरी वैचारिकता से आकंठ रचनाएं लिख सकती थीं. यही वजह है कि मन्नू जो थीं, वही उनकी रचनाओं में दिखता था- वही उनकी कहानियों का कथ्य बनता था.

और संभवतः यही कारण है कि जब मन्नू भंडारी को हम पढ़ते हैं तो ज़िंदगी अपने सबसे साधारण, निजी से भी निजी और सबसे गैर-ज़रूरी, सबसे विशुद्ध रूप में आती है- और हम तुरंत ही उससे कुछ अपना जोड़ लेते हैं. इसलिए किसी समाज को बदलकर रख देने का वादा मन्नू भंडारी की रचनाएं नहीं करती और न स्वयं लेखक ही पाठक को इस मुगालते में रखती हैं.

यह रचनाएं तो बस अपने समय की -उसकी कुछ अजीब, अनाम-सी समस्याओं का- संकेत भर दे कर चुप हो जाती हैं. वरना जिन दिनों में मन्नू ने अपनी सबसे लोकप्रिय रचना ‘आपका बंटी‘ (1971) लिखी थी, उससे पहले तक इस ओर संभवतः किसी की दृष्टि ही नहीं गई कि माता-पिता के बिखरते रिश्तों में बच्चों से भी बड़ा क्या कोई भुक्तभोगी हो सकता है?

या त्रिशंकु कहानी (1978) में आधुनिकता और परंपरा के दो विपरीत ध्रुवों में त्रिशंकु की तरह झूलते रहने की नियति अगर युवा वर्ग की है तो पिछली पीढ़ी की भी, जो कभी एक सम पर नहीं आ पाते.

हालांकि समय के साथ मन्नू भंडारी की रचनाशीलता भी अपने समय की ज्वलंत समस्याओं से अछूती नहीं रह सकी और इसलिए महाभोज (1979) आते-आते उनकी दृष्टि विस्तृत होकर एक ऐसे फ़लक तक पहुंचती है जहां वह स्वयं से ही प्रश्न करती हैं: ‘अपने व्यक्तिगत दुख-दर्द, अंतर्द्वंद्व या आंतरिक ‘नाटक’ को देखना बहुत महत्वपूर्ण, सुखद और आश्वस्तिदायक तो मुझे भी लगता है, मगर जब घर में आग लगी हो तो सिर्फ अपने अंतर्जगत में बने रहना या उसी का प्रकाशन करना, क्या खुद ही अप्रासंगिक, हास्यास्पद और किसी हद तक अश्लील नहीं लगने लगता? संभवतः इस उपन्यास की रचना के पीछे यही प्रश्न रहा हो.’

यह वह दौर था, जब 1977 के कुख्यात बेलछी नरसंहार (बिहार) में गांव के सवर्णों द्वारा ग्यारह दलितों को जिंदा जला दिया गया था. महाभोज में इसी अग्निकांड की पृष्ठभूमि में मन्नू भंडारी यह दिखलाती हैं कि जिस प्रकार शवों पर गिद्धों का महाभोज चलता है, उसी प्रकार स्वार्थ से भरी सत्ता, पूंजीपति और आपराधिक तत्वों से सांठ-गांठ कर जनतंत्र का महाभोज करती है.

मन्नू भंडारी, जिन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस में सेवानिवृत्ति तक पढ़ाया, अपनी इतनी व्यस्तता के बावजूद भी अपने अंदर के लेखक को सहेजकर रखा, वरना एक प्रोफेशनल करिअर की आवश्यकताएं बहुतों की रचनात्मकता को कुंद कर देती हैं. और मन्नू जी के लिए लेखन, जीवन से भी अधिक आवश्यक था.

अपनी मित्र और लेखक सुधा अरोड़ा को उन्होंने एक बार कहा था कि ‘जब लेखक लिखना बंद कर दे तो उसे जीना भी बंद कर देना चाहिए.’ उनका ऐसा सोचना यह दर्शाता है कि जीवन की ढलती संध्या में अपनी गिरती हुई सेहत और खत्म होती याददाश्त के कारण जब वह रचनात्मक लेखन नहीं कर पा रहीं थीं, तो किस क़दर खुद से नाराज़ थीं.

पर जैसा कि सुधा अरोड़ा ने तब समझाया था कि ‘कोई बात नहीं, जितना लिख लिया, वह अनूठा है, नायाब है . रचना की गुणवत्ता देखें, तौल के हिसाब से तो बहुत लोग लिखते हैं , वैसे लेखन का होना, न होना बराबर है’ – वस्तुतः ही तो उनकी रचनाएं संख्या में भले ही कम हों पर अनुभव की प्रामाणिकता और लिखने की सरल शैली उन्हें अपने समकालीनों से लोकप्रियता में कहीं आगे ले जाती हैं.

पति राजेंद्र यादव (1929-2013) जो स्वयं हिंदी के बड़े साहित्यकार और हंस जैसी पत्रिका के संपादक थे, के बरअक्स एक स्वतंत्र और विशिष्ट पहचान बनाना मन्नू भंडारी के लिए चुनौती नहीं थी, क्योंकि उनका लेखन उनकी पहचान का अपना हिस्सा था और वह पति की छाया में नहीं उगा था, इसलिए असल चुनौती निश्चित ही मन्नू जी के लिए अपनी रचनात्मकता को अलग बनाए रखने की थी.

और देखा जाए तो जिस राजेंद्र यादव को मोहन राकेश (1925-1972) और कमलेश्वर (1932-2007) के साथ नई कहानी आंदोलन की शुरुआत करने के लिए याद किया जाता है, उन्हीं के समानांतर मन्नू भंडारी घोषित रूप से ‘नया कहानीकार’ न होकर भी अपनी कहानियों में वाकई कुछ नया लिख रही थीं और यह नवीनता हर स्तर पर थी.

कथावस्तु में 1960 के दशक के शहरी मध्य वर्ग को तो और भी बहुत सारे लेखक ला रहे थे, पर मन्नू ने एक विशिष्ट तबके को कहानियों का केंद्र बनाया, जो था- उन कामकाजी मध्यवर्गीय महिलाओं का- जो स्वाधीनता के आदर्शों के मोहभंग या नेहरू युग के आदर्शवाद के प्रति विखंडन का ‘बाह्य अनुभव’ न जी कर अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में अपनी भीतरी और बाहरी ज़िंदगी का संतुलन साध रहीं थीं.

संतुलन की इस लड़ाई में अगर कभी बाह्य को पूरी तरह से समाप्त करना होता, जैसा कि कहानी ‘नई नौकरी’ में- जहां रमा को अपनी 10 सालों की नौकरी और मित्रों को छोड़कर अपने पति की महत्वाकांक्षाओं में खुद को विलीन कर लेना पड़ता है- या नहीं तो कभी अपने संरक्षित घर को तिलांजलि देते हुए अपने अस्तित्व को बचाना ज्यादा अहम लगता है, जैसा कि ‘दरार भरने की दरार’ में श्रुति कह उठती है ‘बहुत दिनों के संघर्ष और द्वंद्व के बाद मैंने अंतिम रूप से यह निर्णय ले लिया है कि मैं अब अलग ही रहूंगी और सच कहती हूं निर्णय लेने के बाद से ही जैसे मैं हल्की हो गई हूं, एक तनाव से मुक्त हो गई हूं.’ हालांकि पति विभु फिर अपनी चालाकी भरी दलीलों से श्रुति को मना लेता है, पर ऐसा लगता है जो अपनी कहानी में श्रुति नहीं कर पाती है, वह मन्नू भंडारी अपने जीवन में पा लेती हैं.

वरना शादी के 30 वर्ष गुज़रने के बाद उम्र के ढलते पड़ाव पर पति राजेंद्र यादव से अलग हो जाना अंततः उनकी ईमानदारी की ही मिसाल है कि एक त्रासद वैवाहिक संबंध को ढोते रहने के आडंबर से उन्होंने खुद को मुक्त कर लिया. अपनी आत्मकथा एक कहानी यह भी (2007), में उनकी यह स्वीकारोक्ति उनकी भावनात्मक ऊर्जा की ही थाह देता है जब वह कहती हैं:

‘आज जब मैं बिल्कुल अकेली हो गई हूं, पर राजेंद्र के साथ रहते हुए भी तो मैं बिल्कुल अकेली ही थी. पर कितना भिन्न था वह अकेलापन, जो रात-दिन मुझे त्रस्त रखता था. साथ रह कर भी, अलगाव की, उपेक्षा और संवादहीनता की यातनाओं से इस तरह घिरी रहती थी सारे समय, कि कभी साथ रहने का अवसर ही नहीं मिलता था. आज सारे तनावों से मुक्त होने के बाद अकेले रहकर भी अकेलापन महसूस नहीं होता. कम से कम अपने साथ तो हूं.’

फिल्म रजनीगंधा के निर्देशक बासु चटर्जी (बीच में) और कलाकारों के साथ मन्नू भंडारी. (एकदम बाएं) (फोटो साभार: रचना यादव/फेसबुक)

मन्नू जी स्वभाव से ही गंभीर और विद्रोही थीं. दुबली-पतली काया में बस एक ही चीज भरी थी और वह था- आत्मविश्वास. 1931 में भानपुरा, मध्य प्रदेश में जन्मी मन्नू भंडारी पिता की सबसे छोटी संतान थीं. सात्विक जैन परिवेश में परवरिश उदारवादी हुई थी और इसलिए स्वतंत्रता आंदोलन के उस दौर में कालेज के युवा वर्ग की नेता बनीं कभी विरोध प्रदर्शन कर रही होतीं, तो कभी ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ बुलंद आवाज़ में भाषण दे रहीं होतीं.

कम उम्र ही में आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होकर कलकत्ते में बालीगंज शिक्षा सदन में पढ़ाने लगीं, जहां उनकी एक छात्रा और मशहूर लेखक प्रभा खेतान (1942-2008) भी थीं. अपनी आत्मकथा अन्या से अनन्या (2007) में खेतान एक संस्मरण के द्वारा यह ज़िक्र करती हैं कि ‘कैसे मन्नू जी ने एक दिन राजेंद्र यादव की बेवफ़ाई का उद्घाटन इनके सामने किया था और ऊपर से इतनी सशक्त दिखने वाली मन्नू जी कितना रोईं थीं.’ पर संभवतः यह रोना अपने चुनाव का गलत हो जाने की वजह से था, क्योंकि राजेंद्र यादव जिनके पास उन दिनों एक सुदृढ़ आर्थिक आधार नहीं था और शारीरिक रूप से भी जिनके पैरों में विकार था, वैसे दूल्हे का चयन मन्नू जी ने प्रेम के नाम पर ही किया था और इसके लिए अपने पिता सुखसंपतराय भंडारी से काफी विरोध भी झेला था.

ऐसे में जिस सुखद वैवाहिक जीवन की कल्पना उन्होंने की थी, उसके दिन-ब-दिन टूटने की प्रक्रिया ने उनके भीतर के रचनाकार को तो शायद वह आक्रोश दिया जो उनकी रचनाओं में दिखता है पर उनके अंदर की वह स्त्री जो एक गृहस्थी बसाना चाहती थी, उसे तोड़ दिया था.

पर दो रचनात्मक मानस के साथ ने अपने जर्जर होते वैवाहिक संबंधों को अपनी-अपनी रचनात्मकता को प्रभावित होने नहीं दिया. खुद मन्नू भंडारी अपनी आत्मकथा में स्वीकार करती हैं कि राजेंद्र यादव से विवाह ने उनके रचनात्मक-साहित्यिक जीवन के मार्ग में उत्प्रेरक का ही काम किया और एक इंच मुस्कान (1962) जैसे प्रयोगात्मक उपन्यास की योजना इसकी गवाही है, जहां दोनों (मन्नू भंडारी और राजेंद्र यादव) ने मिलकर क्रमशः स्त्री और पुरुष पात्र के संवाद लिखे हैं.

इतना ही नहीं, जब मन्नू जी आपका बंटी उपन्यास लिखने के लिए घर से दूर छात्रावास में जाकर रह रहीं थीं, तो घर पर पीछे छोड़ गई अपनी बेटी की याद उनका संकल्प कभी-कभी डिगाने लगती और वह वापस घर आना चाहतीं, ऐसे में राजेंद्र यादव ही मन्नू भंडारी के भीतर के लेखक को स्थिर करते और किताब पूरी करके ही घर लौटने को कहते.

बहरहाल, आज जब, मन्नू भंडारी नहीं रहीं तो वस्तुतः यह विचारणीय लगता है कि 90 सालों की भरपूर ज़िंदगी जिसने जीवन के हर बसंत, हर पतझड़ को जिया था, उसकी रचनात्मकता, उसकी कल्पनाशीलता कहीं तो अपने आप को दर्ज कर सकी- और वह इनके द्वारा रचित साहित्य है, जो उनकी विरासत और पाठकों की धरोहर है.

मन्नू भंडारी का लिखा हुआ साहित्य आखिरकार है तो उनकी ही ज़िंदगी की इबारत. उनकी रचनाओं की हर वो स्त्री, चाहे वह शकुन (आपका बंटी) हो या दीपा (यही सच है) या रंजना और नीलिमा (एक इंच मुस्कान) या मंजरी (बंद दराज़ों का साथ) या त्रिशंकु की मम्मी, कहीं न कहीं इन सबमें मन्नू जी ही तो थीं और वह भी इस दूरी के साथ कि पाठक समझकर भी समझ नहीं पाते और खुद को ही इनमें ढूंढने लगते हैं.

(अदिति भारद्वाज दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं.)