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जम्मू कश्मीर प्रशासन ने कश्मीर प्रेस क्लब को अपने नियंत्रण में लिया

रविवार सुबह पत्रकारों के एक समूह ने सशस्त्र-बलों की मौजूदगी में कश्मीर प्रेस क्लब पहुंचकर यहां क़ब्ज़ा कर लिया था. यह नाटकीय परिवर्तन नए प्रबंधन निकाय के चुनाव के लिए प्रक्रिया शुरू होने के बाद हुआ था. अब प्रशासन ने कहा कि पत्रकारों के कई समूहों के बीच असहमति के चलते उसने इसे अपने नियंत्रण में ले लिया है.

17 जनवरी को कश्मीर प्रेस क्लब के बाहर जुटे मीडियाकर्मी. (फोटोः पीटीआई)

श्रीनगरः जम्मू एवं कश्मीर प्रशासन ने कश्मीर प्रेस क्लब (केपीसी) को अपने नियंत्रण में ले लिया है. प्रशासन ने कहा कि पत्रकारों के विभिन्न समूहों के बीच असहमति और अप्रिय घटनाओं के बीच यह फैसला लिया गया है.

दरअसल 15 जनवरी को स्वतंत्र पत्रकारों और अखबार मालिकों के एक समूह ने कश्मीर प्रेस क्लब परिसर में घुसकर क्लब का नया प्रबंधन होने का दावा किया था.

उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के नेतृत्व में सोमवार को जम्मू एवं कश्मीर प्रशासन ने कहा कि कश्मीर प्रेस क्लब का पंजीकरण सोसायटी अधिनियम के तहत दोबारा पंजीकरण कराने में असफल रहने पर कोई वजूद नहीं रह गया है.

प्रशासन ने जारी बयान में कहा, ‘प्रेस क्लब के मौजूदा प्रबंधन निकाय का कानूनी रूप से 14 जुलाई 2021 को अंत हो चुका है. इसी तारीख को कार्यकाल भी समाप्त हो गया था.’

यह नया घटनाक्रम बीबीसी, एसोसिएटेड प्रेस सहित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समाचार संगठनों से जुड़े स्वतंत्र पत्रकारों के एक समूह द्वारा कश्मीर प्रेस क्लब के नए प्रबंधन निकाय के लिए चुनाव आयोजित कराने हेतु एक समिति नामित करने के ऐलान के कुछ घंटों बाद हुआ है.

इन 13 पत्रकारों की समिति में बीबीसी के रियाज मंसरूर शीर्ष पर रहे. इसके बाद एसोसिएटेड प्रेस के मेहराजुद्दीन थे.

इस समिति ने 16 जनवरी को कहा था कि वह क्लब की वैधता और इसके दोबारा पंजीकरण की प्रक्रिया को पूरा करने की दिशा में काम कर रहे हैं.

इससे एक दिन पहले एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने प्रेस क्लब पर कब्जे को ‘सशस्त्र तख्तापलट’ करार दिया था.

दरअसल टाइम्स ऑफ इंडिया से जुड़े सलीम पंडित की अगुवाई में कम से कम 10 और पत्रकारों एवं अखबार मालिकों के साथ पत्रकारों की एक समिति ने केपीसी के कार्यालय पर कब्जा कर लिया था और सलीम को अपना अंतरिम अध्यक्ष नामित किया था.

बता दें कि इनमें से कुछ पत्रकारों और अखबार मालिकों को सरकार समर्थक माना जाता है.

क्लब की अंतरिम समिति के जल्दबाजी में चुनाव और शनिवार को प्रेस क्लब में स्वचालित हथियारों से लैस सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी ने देश के प्रमुख पत्रकार निकायों और अभिव्यक्ति की आजादी के लिए मुखर कार्यकर्ताओं में रोष पैदा किया, जिन्होंने इस तरह से क्लब पर अवैध कब्जा जमाने के लिए जम्मू कश्मीर प्रशासन की भागीदारी की आलोचना की.

कश्मीर प्रेस क्लब के अपदस्थ प्रबंधन निकाय ने सोमवार को कहा था कि अंतरिम समिति का गठन इस क्लब को बंद करने के मकसद के साथ किया गया.

अपदस्थ कश्मीर प्रेस क्लब के महासचिव इशफाक तांत्रे ने बयान में कहा, ‘इस मकसद के लिए उन्होंने (प्रशासन) पत्रकारों के एक समूह को खड़ा किया. ऐसा करके वे पत्रकारों की आवाज को दबाना चाहते हैं जो कश्मीर प्रेस क्लब के इस फोरम के जरिये सुनाई देती है. यह घाटी में एकमात्र लोकतांत्रिक और स्वतंत्र पत्रकार निकाय है.’

बयान में कहा गया, ‘लेकिन यह हमारा दृढ़ विश्वास है कि हमारे पत्रकार इस लौ को जलाए रखने और इन चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हैं. मैं यह दोहराना चाहता हूं कि कश्मीर में पत्रकारिता फली-फूली है और यह भविष्य में भी इसी तरह बनी रहेगी.’

यह मुद्दा प्रशासन के लिए शर्मिंदगी लेकर आया, जिसके चलते प्रशासन अब डैमेज कंट्रोल में जुट गया है. इसी वजह से प्रशासन ने अंतरिम समिति द्वारा केपीसी पर कब्जा करने को दो प्रतिद्वंद्वी समूहों के बीच अप्रिय घटना बताया है.

सूचना एवं जनसंपर्क निदेशालय (डीआईपीआर) ने सोमवार को बयान जारी कर कहा, ‘विवाद के इस पहलू को ध्यान में रखते हुए और सोशल मीडिया और अन्य स्रोतों से प्राप्त रिपोर्टों के मद्देनजर कानून एवं व्यवस्था की संभावित स्थिति का पता चलता है, जिसमें हस्तक्षेप की आवश्यक्ता जरूर बन पड़ी है.’

बता दें कि कश्मीर प्रेस क्लब श्रीनगर में पोलो व्यू रोड पर एक पुरानी इमारत में है. 2017 से पहले इस इमारत पर जम्मू एवं कश्मीर रोजगार विभाग का कब्जा था.

मुफ्ती मोहम्मद सैयद के निधन के बाद महबूबा मुफ्ती की अगुवाई में जम्मू कश्मीर सरकार आंशिक रूप से इस इमारत का रेनोवेशन कराया और इसे कश्मीर प्रेस क्लब को आवंटित कर दिया.

जम्मू एवं कश्मीर के वित्त मंत्री हसीब द्राबू ने अपने तीसरे बजट भाषण में यह ऐलान किया था और इसे कश्मीर में स्थानीय मीडिया बिरादरी के लिए बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा गया था, जो क्षेत्र के अस्थिर हालातों को रिपोर्ट करने के लिए मुश्किल परिस्थितियों में काम कर रहे हैं.

पीडीपी-भाजपा सरकार ने कश्मीर प्रेस क्लब के लिए पचास लाख रुपये के वार्षिक बजट का भी वादा किया था.

हालांकि, इस नए विवाद के मद्देनजर प्रशासन ऐवा-ए-सहाफत (केपीसी कार्यालय) को आवंटित परिसर रद्द कर दिया है. यह क्लब जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने और कोविड-19 के प्रसार सहित इतिहास की कुछ बड़ी घटनाओं के दौरान भी खुला रहा.

जम्मू एवं कश्मीर प्रशासन ने कहा कि वह स्वतंत्र और निष्पक्ष प्रेस को लेकर प्रतिबद्ध है और पत्रकारों को पेशवेर, शैक्षणिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, मनोरंजक और कल्याणकारी गतिविधियों सहित सभी सुविधाओं के योग्य हैं.

बहाना

जम्मू स्थित अंग्रेजी दैनिक अखबार कश्मीर टाइम्स की संपादक अनुराधा भसीन का कहना है कि प्रबंधन निकाय के लिए चुनाव कराने में केपीसी की अक्षमता और दोबारा पंजीकरण कराने की प्रक्रिया में अंतहीन देरी असल में लोकतांत्रिक संस्थान को बंद कराने का बहाना है.

उन्होंने द वायर  को बताया, ‘यह स्पष्ट है कि केपीसी के दोबारा पंजीकरण की प्रक्रिया को रद्द कराने का कदम पूर्वनियोजित था और इसका उद्देश्य एक ऐसे लोकतांत्रिक संस्थान की हत्या करना है, जहां पत्रकार स्वतंत्र विचार और स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अनुसरण करते हैं.’

केपीसी ने पिछले साल मई महीने में दोबारा पंजीकरण के लिए आवेदन किया था और क्लब द्वारा 14 फरवरी को नए प्रबंधन निकाय के चुनाव के लिए तारीखों का ऐलान करने के बाद इसे पिछले साल 29 दिसंबर को रजिस्ट्रार ऑफ सोसायटीज ने मंजूरी भी दी थी.

हालांकि, प्रशासन ने सीआईडी की एक रिपोर्ट का हवाला देकर दोबारा पंजीकरण पर विराम लगा दिया. हालांकि, अभी तक इस रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया है.

भसीन ने कहा कि केपीसी के मुद्दों को कश्मीर की मीडिया बिरादरी द्वारा सुलझाया जाना चाहिए. लोकतंत्र को बढ़ावा देने के बजाय सरकार अपनी इच्छा थोप रही है और एक संस्थान को अलोकतांत्रिक तरीके से ध्वस्त कर रही है.

उन्होंने कहा, ‘इसने एक गलत मिसाल पेश की है. अगर यह कश्मीर में हो सकता है तो यह कहीं भी हो सकता है.’

इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन ने सोमवार को जारी बयान में कहा कि केपीसी मीडिया से जुड़े मामलों, घाटी में पत्रकारों के उत्पीड़न और उन्हें धमकी दिए जाने से जुड़े मामलों को लेकर मुखर रही है लेकिन इन हालिया घटनाओं से राजनीतिक प्रतिशोध और असहमति की आवाजों को चुप कराने के प्रयासों का पता चलता है.

यूनियन ने 12 जनवरी को अरुणाचल प्रदेश के ईटानगर में राष्ट्रीय कार्य़कारी समिति की बैठक में एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें कश्मीरी पत्रकारों के प्रति एकजुटता व्यक्त की गई और बीते तीन दिनों में प्रेस क्लब में हुई घटनाओं की जांच की मांग की गई.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)