भारत

इब्राहीम अश्क: न जाने कितनी ज़बानों से हम बयां होंगे…

स्मृति शेष: इब्राहीम अश्क फ़िल्मी गीतकारों से बहुत अलग थे और साहित्य की हर करवट पर नज़र रखते थे. फ़िल्मी और पेशेवर शायर कहकर उनके क़द को अक्सर ‘कमतर’ बताया गया. शायद इसलिए भी अश्क ने अपनी कई आलोचनात्मक तहरीरों में कथित साहित्यकारों की ख़ूब ख़बर ली.

इब्राहीम अश्क. (फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

 

‘इब्राहीम अश्क साहब नहीं रहे…’

शकील आज़मी का ट्वीट पढ़ते हुए जाने क्या कैफ़ियत थी कि ख़ुदा से शिकवा के अंदाज़ में मैंने कई दफा दोहराया;

‘मोहब्बत इनायत करम देखते हैं
कहां हम तुम्हारे सितम देखते हैं’

अश्क ने ये गीत फ़िल्म ‘बहार आने तक’ में ज़िंदगी और प्यार से भरपूर सिचुएशन के लिए लिखा, फिर मैं क्यों इसे ख़ुदा के सामने शिकवा की तरह पढ़ रहा था. शायद ज़िंदगी और मौत का संवाद एक जैसा होता है…

बहरहाल, उसी समय उनका ये कलाम भी याद आया;

तिरी ज़मीं से उठेंगे तो आसमां होंगे
हम ऐसे लोग ज़माने में फिर कहां होंगे

अब उनके जाने के बाद इसे सोच रहा हूं, उनकी ग़ज़लें देख रहा हूं, रुबाइयां, नज़्में, दोहे पलट रहा हूं तो महसूस होता है इनके अर्थ भी बदल चुके हैं. और अर्थों के इस विस्थापन में उलझे हुए पाठक को जाने कौन पुकार रहा है कि यादों के पन्ने खुल गए हैं, मानो कोई कह रहा है कि उनके इस एक गीत के ठहराव में रच बसकर हम बड़े हुए हैं….

मगर तब ख़बर कहां थी कि कोई इब्राहीम अश्क हैं जो ये सब क़लमबंद करते हैं.

फिर जाने कब उन्हें जानने-पहचानने का सिसिला शुरू हुआ, और वो मौक़ा भी आया कि जिन उर्दू पत्रिकाओं में अश्क आलोचना लिख रहे हैं या ग़ज़लें कह रहे हैं, हम उनमें एक पाठक के तौर पर अपना छपा हुआ ख़त देखकर निहाल हुए जा रहे हैं.

और ये तो शायद 12-13 साल पहले की ही बात होगी कि एक पत्रिका के फ़िल्म विशेषांक में हम साथ-साथ थे. उन्होंने गीत और मौसिक़ी पर लिखा था और मैंने सिनेमा के साहित्यक अर्थों पर.

और जब नंद किशोर विक्रम ने अपनी पत्रिका ‘आलमी उर्दू अदब’ का सिनेमा सदी नंबर निकाला तो एक बार फिर हम इकट्ठे थे. यूं कभी मिल नहीं पाए, मगर साथ रहे.

याद पड़ता है उनकी एक किताब पर तब्सिरा भी लिखा था, उनका एक आध प्यारा-सा ख़त भी था. जाने अब कहां है…

कहने की बात नहीं कि ये सब मुझ जैसे हेच के लिए कितना ‘ख़ुशगवार’ मगर टूटा हुआ एहसास है. इन दिनों बड़ी तमन्ना थी कि मौक़ा हाथ लगते ही उनके साथ बातचीत रिकॉर्ड करूंगा.

मगर अब मौत ने ज़िंदगी के ‘मानी’ बदल दिए हैं… हालांकि, जीते-जी भी उनको ये ‘मानी’ बहुत रास नहीं आया…

फ़िल्मी और पेशेवर शायर कहकर उनके क़द को अक्सर ‘कमतर’ बताया गया. शायद इसलिए भी अश्क ने अपनी कई आलोचनात्मक तहरीरों में कथित साहित्यकारों की ख़ूब ख़बर ली.

एक लेख में तो समकालीन उर्दू ग़ज़ल पर बात करते हुए निदा फ़ाज़ली, बशीर बद्र और शहरयार जैसे शायरों के बारे में ये सवाल भी पूछ लिया कि इन्होंने ग़ज़ल में कौन-सा बड़ा कारनामा अंजाम दिया है.

हां, इस सवाल में साहित्यक सरोकार हैं. लेकिन उनके यहां ख़ुद को मनवाने की ज़िद ज़्यादा थी, यूं वो अपनी पीढ़ी के ग़ज़ल लिखने वालों की पहचान के लिए इस लहजे में भी आलोचना लिख रहे थे.

दरअसल वो फ़िल्मी गीतकारों से बहुत अलग थे और साहित्य की हर करवट पर नज़र रखते थे. ये तब का क़िस्सा है जब अभी-अभी सरहद पार के तमाम बड़े ग़ज़ल गुलूकार हिंदुस्तान में अपना जादू जगा चुके थे.

हर तरफ़ ग़ज़ल की दीवानगी थी, तब ये अश्क थे जिनकी बेशुमार ग़ज़लें अपने समय के दिग्गज गुलूकारों की आवाज़ में कानों में रस घोलने लगी थीं. और ये कोई क़िस्सा नहीं कि उस समय महीने में अश्क की 40-40 ग़ज़लें रिकॉर्ड हो रही थीं और 15-15 एल्बम रिलीज़ हो रहे थे.

अश्क कभी इस स्टूडियो में तो कभी उस स्टूडियो में अपने हुनर की बदौलत आवाज़ में ढल रहे थे. जगजीत, चित्रा, तलत अज़ीज़, चंदन दास, वाणी जयराम, पीनाज़ मसानी, आरती मुकर्जी, कृष्णा कल्ले, हरिहरन, अनुराधा पौडवाल, पंकज उधास और जाने कौन-कौन इनके लफ़्ज़ों को चूम रहे थे.

और तो और जब तलत महमूद अपने जीवन का आख़िरी एल्बम ‘ग़ज़ल के साज़ उठाओ’ एचएमवी के लिए रिकॉर्ड कर रहे थे तो इस ‘मेलोडी-किंग’ की लर्ज़ां आवाज़ में अश्क की ग़ज़लें भी क्लासिक के दर्जे को पहुंच रही थीं.

यूं कहें कि फ़िल्मों में गीत लिखने से पहले ही इनकी ग़ज़लों का शोहरा था. इसके बावजूद अश्क मानते रहे कि साहित्य कुछ और है, ये नहीं. इसलिए उन्होंने अपनी शायरी और इस तरह के कलाम को एक साथ नहीं रखा.

दरअसल एक सधे हुए आलोचक के तौर पर उनका मानना था कि हर ग़ज़ल का रिश्ता मौसिक़ी से नहीं जोड़ा जा सकता.

अश्क ने ग़ालिब और मीर जैसे शायरों की मिसाल देकर ये बात कही कि ज़्यादा से ज़्यादा इनकी बीस-पच्चीस ग़ज़लें ही गाई जा सकती हैं, और ये ग़ज़लें मीर-ओ-ग़ालिब की बड़ी ग़ज़लें नहीं हैं.

उनकी ये बात जी को लगती भी है कि क़ुली क़ुतुब शाह जैसे शायर का भी ‘पिया बाज प्याला पिया जाए ना…’ के अलावा कोई और कलाम शायद ही गाया गया हो. हालांकि अश्क ने ग़ज़ल के रंग-ओ-रूप कि ख़ूब पहचान की और बताया कि कैसे ग़ज़ल जब दरबार से निकलकर कोठे पर पहुंची तो मुजरा बन गई, ख़ानक़ाहों में क़व्वाली और रेडियो-टीवी पर कुछ और.

मौसिक़ी और संगीत की दुनिया में रमे रहे, शायद इसलिए बड़ी बेबाकी से कह दिया कि संगीत में ढलने वाली शायरी साहित्य की कसौटी पर खरी नहीं उतरती.

यही वजह है कि उन्होंने अपनी शायरी के पहले संग्रह ‘इल्हाम’ में एक भी ऐसी ग़ज़ल शामिल नहीं की जो गाई गई थीं. जबकि उस समय तक उनकी पांच सौ से ज़्यादा ग़ज़लें रिकॉर्ड हो चुकी थीं.

और एक बड़े साहित्यकार के ये कहने पर कि तुमने अपनी लोकप्रिय ग़ज़लों को इसमें शामिल क्यों नहीं किया तो उनका जवाब था मुझे ग़ज़ल और गाई जाने वाली ग़ज़लों में तमीज़ करना आता है.

ये वही किताब थी जिसके बारे में उन्वान चिश्ती ने कहा, ‘ये एक ख़स्ता इंसान का बरजस्ता इज़हार है,’ और इसी बात को निदा फ़ाज़ली ने यूं लिखा कि, ‘इनकी ग़ज़लों की फ़िज़ा में एक क़िस्म का खुलापन है.’

दरअसल साहित्यिक मूल्यों को लेकर उनका अपना समृद्ध विचार था, लेकिन इसी धुन में जब वो ये कह जाते हैं कि एमएफ़ हुसैन का ग़ालिब के किसी शेर को तस्वीर में ढाल देना या बिरजू महाराज का उस पर कथक पेश कर देना कोई इंक़लाब नहीं है तो ग़ज़ल को इन माध्यमों से जो एक नए अर्थ की प्राप्ति होती है वो उसको नज़रअंदाज़ कर देते हैं.

हां, साहित्य के लिए उनके दिल में एक ख़ास जगह थी, यूं एक बार जब उनसे साहिर, कैफ़ी, मजरूह और शकील बदायुंनी के सिलसिले में पूछा गया तो उन्होंने बड़ी बेबाकी से कह दिया कि इन्होंने सिनेमा में आने से पहले जो ‘साहित्य’ लिखा उसमें कोई इज़ाफ़ा नहीं कर पाए.

ये बातें नागवार लग सकती हैं, लेकिन इससे तथ्यों पर हर्फ़ कहां आता है.

इसी तरह अश्क ने जब ग़ालिब की व्याख्या लिखी तो कई बड़े आलोचकों के कहे पर उंगली रख दी, यहां भी बात वही है कि वो किसी एहसास कमतरी में नहीं रहे और जी भर साहित्य लिखते-पढ़ते रहे.

लेकिन विडंबना कहिए कि वो जहां साहित्य की तोड़-जोड़ का शिकार थे वहीं फ़िल्म इंडस्ट्री से कह रहे थे;

हम लाल-ओ-जवाहर वालों को
ये अंधे क्या पहचानेगें…

ये उर्दू के उस साहित्यकार का क़िस्सा है जो हिंदी साहित्य के छात्र रहे, और स्कूल के दिनों में ही अपना लिखा हिंदी गीत बालसभा में पढ़ने लगे थे. फिर किसी ने इन्हें अरबी, फ़ारसी, गुजराती, हिंदी और उर्दू के जानकार हकीम ‘ग़ुलाम अब्बास असद बड़नगरी’ से मिलवा दिया, जहां इनकी सर्जनशीलता को पर लग गए.

यूं अश्क अपने उस्ताद के हवाले से अपनी शायरी का रिश्ता मोहम्मद रफ़ी सौदा और ख्वाजा मीर दर्द जैसे शायरों से भी जोड़ने लगे. उस्ताद भी ऐसे कि अश्क को ‘गौहर-ए-कमयाब’ कहकर दाद दी.

मध्य प्रदेश के उज्जैन ज़िले के बड़नगर में 20 जुलाई 1951 को जन्मे अश्क की शिक्षा-दीक्षा भी यहीं हुई. उनके पूर्वज राजस्थान के किशनगढ़ से बेहतर ज़िंदगी का सपना लिए बड़नगर आए थे.

ज़िंदगी फिर भी रास नहीं आ रही थी, मां हसीना इब्राहीम बेटे को मौलाना आज़ाद और नेहरू जैसा बनाना चाहती थीं… मगर होना कुछ और था.

यूं तमाम तरह की दिक्क़तों के बीच इंदौर रेडियो स्टेशन पर जब युवा इब्राहीम का गीत; ‘घन गरजत हैं मन सावन के, बरसत नीरा पार’ रिकॉर्डिंग के लिए चुना गया तो म्यूजिक डायरेक्टर भाईलाल को ये बोल इतने पसंद आए कि उन्होंने शायर से मिलने की इच्छा जता दी.

और अपने सामने एक मासूम से लड़के को देखकर पहले हैरान हुए फिर समझाने लगे कि किसी का गीत चुरा लिया है तो बता दो, जेल जाने की बात भी कही गई. लेकिन ये उनका हुनर ही था जो सर चढ़ कर बोल रहा था.

फिर बड़े-बड़े शायरों की मौजूदगी में इंदौर रेडियो पर ही उनका गीत ‘मोरी पकड़ो न बैय्यां हो श्याम, मैं तो लाजे मरुं…’ ‘इस मास का गीत’ भी घोषित हुआ और उनके सृजनशीलता की नदी बहने लगी.

लगभग डेढ़ सौ गीतों की रिकॉर्डिंग बाद महसूस हुआ कि इस सरकारी दाम पर ज़िंदगी राज़ी नहीं होने वाली, फिर उनके संगीतकार भाईलाल का भी मशविरा था कि तुम्हारी क़द्र फ़िल्मों में है.

इस दौरान ‘इंदौर समाचार’ में वो उर्दू साहित्य को देवनागरी में पेश करने लगे थे. मगर ज़िंदगी आसान नहीं हो रही थी, इसलिए दिल्ली का रुख़ करने को मजबूर हुए.

यहां अपने समय के बड़े शायर शहाब जाफ़री ने हर तरह से रहनुमाई की और उनकी मदद से प्रसिद्ध प्रगतिशील आलोचक मोहम्मद हसन की पत्रिका ‘असरी अदब’ से जुड़े कुछ ही दिन हुए थे कि उर्दू की सबसे लोकप्रिय पत्रिका शमा और हिंदी पत्रिका सुषमा में इन्हें काम मिल गया.

बाद में दिल्ली प्रेस समूह की पत्रिका सरिता में भी सहायक संपादक रहे. इस तरह लगभग बारह साल तक पत्रकारिता करने के बाद उन्होंने फ़िल्म नगरी जाने का फ़ैसला किया तो उनके संपादक और प्रकाशक परेश नाथ ने कई लोगों की नाकामी का हवाला देकर समझाने की कोशिश की.

और जब अश्क नहीं माने तो परेश नाथ ने मुंबई के नरीमन पॉइंट वाले अपने दफ़्तर में काम ऑफर कर दिया, इस पर भी राज़ी नहीं हुए तो उन्होंने ने कहा कि हमारे लिए लिखते रहना और वहां से फ़िल्मी सितारों के इंटरव्यू भेजना.

दिल्ली प्रेस समूह उन्हें छोड़ना नहीं चाहता था और ये उनके संपादक की हमदर्दी थी जो वो इस माया नगरी में संघर्ष करते हुए भी सर्वाइव कर पाए.

इस तरह ग़ज़लों की दुनिया में जहां उन्होंने राज किया वहीं बतौर गीतकार उनकी पहली फ़िल्म ‘गीत मेरे प्यार’ का रिलीज़ ही नहीं हुई. और 1990 में दूसरी फ़िल्म ‘बहार आने तक’ आई तो उनका नग़्मा हमें साहित्य की चाशनी दे गया.

बाद में कहो न प्यार है, कोई मिल गया, जांनशीं, और वेलकम जैसी कई फ़िल्मों के लिए लफ़्ज़ों के जादू जगाए और कॉमर्शियली हिट गाने लिखे.

ग़ज़ल और गानों की सफलता एक तरफ़ उन्होंने भजन में भी अपना कमाल दिखाया. शुरू में मैंने अश्क के जिस गीत और मौसिक़ी वाले लेख का ज़िक्र किया था, उसमें उन्होंने राग मालकोंस में लिखे भजनों का उल्लेख करते हुए फ़िल्म ‘शिव महिमा’ के अपने भजन के बारे में भी एक दिलचस्प क़िस्सा सुनाया है.

दरअसल फ़िल्म ‘जीना मरना तेरे संग’ के लिए अश्क ने गीत लिखा था, दिल एक मंदिर प्यार है पूजा… बाद में गुलशन कुमार ने इसी धुन पे इनसे भजन लिखवाया; मन मेरा मंदिर शिव मेरी पूजा

इस भजन को इतनी शोहरत मिली कि आज भी अनुराधा पौडवाल अपना प्रोग्राम इसी से शुरू करती हैं.

इस बारे में एक सवाल के जवाब में अश्क ने कहा था; अगर इंसान अपनी इंसानियत बरक़रार रखे तो मज़हब उसके लिए मानी नहीं रखता.

अश्क सचमुच कमाल थे, और शायद पहले ऐसे नॉन-एक्टर भी थे जिन्होंने ‘ग़ालिब की हवेली’ जैसे घंटे भर के नाटक में पूरे मजमे के सामने दर्जन भर से ज़्यादा शो में स्टेज पर एक नए अंदाज़ के ग़ालिब की भूमिका निभाई.

ग़ालिब की भूमिका में इब्राहीम. (फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

अश्क ने कहनियां भी लिखीं, असल में ‘शाहबानो’ के बारे में ज़ाहिदा हिना की कथित झूठी कहानी पढ़कर इन्हें तकलीफ़ हुई थी. और उस समय वो शाहबानो और उनके पति का इंटरव्यू कर चुके थे. इसलिए उन्होंने ज़ाहिदा हिना के कथित झूठ को बेनक़ाब करने के लिए अपनी पहली कहानी ‘शाह बेगम’ लिखी.

यहां बस याद दिला दें कि शाहबानो प्रकरण में देश की न्यायपालिका, मुस्लिम पर्सनल लॉ और संसद की भूमिका को लेकर कई तरह के सवाल हैं और आज भी जब मुस्लिम महिलाओं के तलाक़ की बात आती है तो इस प्रकरण को याद कर ही लिया जाता है.

बहरहाल, ज़ाहिदा हिना ने उस समय ‘ज़मीं आग की, आसमां आग का’ के शीर्षक से शाहबानो पर कहानी लिखी थी, जिसमें शाहबानो को एक मज़लूम और शिक्षित किरदार के तौर पर चित्रित किया गया है;

‘शहंशाह बानो सर झुकाए अपने मेंहदी रचे हाथों और उंगलियों को देखती रहीं. कोई लाजिम तो नहीं कि हाथ किसी तलवार, किसी ख़ंजर से ही क़लम हों. मजाज़ी ख़ुदा का हुक्म भी तो हाथ काट देता है, उंगलियां कतर देता है…’

अश्क ने बड़ी बेबाकी से कहा कि ज़ाहिदा हिना ने ‘सस्ती शोहरत’ के लिए ये झूठी कहानी लिखी. अपने इंटरव्यू का हवाला देते हुए अश्क का मानना था कि मज़लूम शाहबानो नहीं उनके पति थे और वो एक अनपढ़ महिला थीं.

यूं अश्क ने प्रतिक्रियास्वरूप पहली कहानी लिखी, जिसमें एक अनपढ़ औरत की ज़िद और उसके पछतावे को पेश किया. बाद में अपनी कहानियों का संग्रह ‘रामजी का दुख’ भी प्रकशित किया. हालांकि इनकी कहानियां औसत दर्जे की हैं मगर उनके लफ़्ज़ों में सच्ची हैं.

और अंत में बस ये कि अश्क जैसे गौहर-ए-कमयाब पर अभी बात होनी, उन्हीं के लफ़्ज़ों में;

चले गए तो पुकारेगी हर सदा हमको
न जाने कितनी ज़बानों से हम बयां होंगे