भारत

छात्र आंदोलन की कल्पना के पहले समझिए कि सड़क पर जो हैं उन्हें छात्र रहने नहीं दिया गया

भारत में, विशेषकर उत्तर भारत में छात्रों की जगह टेस्टार्थियों ने ले ली है. टेस्टों की राह इतनी जटिल बना दी गई है कि इनमें शामिल होने वालों की सारी ऊर्जा इसी भूलभुलैया में बाहर का रास्ता खोजते हुए चुक जाती है. आज छात्र नहीं टेस्टार्थियों की भीड़ खड़ी है. भीड़ का ग़ुस्सा ज़रूर फूट सकता है, पर वह आंदोलन नहीं कर सकती.

25 जनवरी 2022 को पटना में प्रदर्शन करते अभ्यर्थी. (फोटो: पीटीआई)

‘बिहार से  एक बार फिर छात्र आंदोलन की शुरुआत हो गई है’, एक नेता ने उत्साह से घोषणा की. एक नौजवान ने माइक में चीखते हुए कहा, ‘क्रांति की चिंगारी दिल्ली तक पहुंचेगी.’  इन दोनों में ही जो जनतांत्रिक आशा है, उसका तिरस्कार नहीं किया जाना चाहिए लेकिन दोनों बस आशा की ही अभिव्यक्ति हैं और अतिशयोक्ति हैं. इस पर हम आगे बात करेंगे.

बिहार और उत्तर प्रदेश में रेलवे लाइनों पर और सड़कों पर नौजवानों के क्षोभ का विस्फोट हुआ. क्षोभ से भी ज़्यादा इसे हताशा कहा जाना चाहिए. रेलगाड़ियों में आग लगा दी गई, पटरियों को भी नुकसान पहुंचाने की कोशिश हुई.

‘सार्वजनिक संपत्ति’ का नुकसान हुआ, यह कहकर कई लोग नौजवानों को हिंसा से बचकर शांतिपूर्ण तरीके से अपना आंदोलन चलाने को कह रहे हैं. वे किसान आंदोलन का उदाहरण दे रहे हैं. देखिए, उन्होंने कितने अहिंसापूर्ण तरीके से और धीरज से अपना आंदोलन चलाया और सरकार को झुका दिया.

जो यह सुझाव देते हैं वे नहीं बतलाते कि उस आंदोलन को शांतिपूर्ण होने के बाद भी हिंदी जनसंचार माध्यम का समर्थन तो नहीं ही मिला था, उसने यह प्रचार भी किया था कि किसान शांति का ढोंग कर रहे हैं, वे मूलतः हिंसक हैं.  उनके भीतर खालिस्तानी, माओवादी और जिहादी छिपकर बैठे हैं और वे हिंसक ही नहीं राष्ट्रद्रोही भी हैं.

उस आंदोलन ने इन सारे आरोपों को झेलते हुए अपना रास्ता तय किया. आंदोलन शांतिपूर्ण हो तो सरकार सुन लेती है, यह बात किसान आंदोलन से गलत साबित हुई और उसके पहले नागरिकता के संशोधित कानून का विरोध कर रहे आंदोलन के प्रति सरकार और जनसंचार माध्यमों के रवैये से भी गलत साबित होती है.

लोगों का कहना है कि किसान आंदोलन की मांगे भी तभी आंशिक रूप से मानी गईं जब भारतीय जनता पार्टी को भय हुआ कि उत्तर प्रदेश और पंजाब में उसे भारी हानि होगी. किसान अगर उसके संभावित मतदाता न होते तो भाजपा को उनके हितों की भी कोई परवाह न होती.

यह बात साबित होती है नागरिकता के कानून के विरोध में हुए आंदोलन के प्रति उसके बेहिस और हिंसक रुख से. भाजपा को मालूम है कि मुसलमान उसके मतदाता नहीं हैं बल्कि वह अपने मतदाता को मुसलमान और ईसाई विरोधी हिंदू ही बनाना चाहती है. इसलिए उसने उस आंदोलन पर कान नहीं दिया.

न सिर्फ यह उसने उस आंदोलन का भारी दमन किया जिसका चरम  दिल्ली में फरवरी 2020 में की गई हिंसा थी. ऐसा करके उसने हिंदुओं के एक हिस्से में पैठी मुसलमान विरोधी हिंसा को तुष्ट किया.

आपने ध्यान दिया होगा कि ट्रेनों में आगजनी और तोड़फोड़ के बाद भी सरकार और अखबारों और टीवी चैनलों की तरफ से आंदोलनकारियों पर वैसा हमला नहीं किया गया जैसा नागरिकता कानून या किसानों से जुड़े कानूनों के विरोध में हुए आंदोलनों पर किया गया था.

किसी ने नहीं कहा कि सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान का बदला लिया जाएगा हालांकि ऐसा कहने वाले आज भी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हुए हैं. इसके उलट रेलवे मंत्री ने आंदोलनकारियों की मांग पर विचार करने का आश्वासन दिया.

मंत्री ने आंदोलनकारियों से सार्वजनिक संपत्ति को अपनी संपत्ति समझने का अनुरोध किया और तोड़फोड़ से बचने की अपील की. रेल मंत्रालय ने कहा कि वह आंदोलन की मांग पर विचार करेगी. यह सब कुछ बहुत नया है और इस सरकार के स्वभाव के उलट है.

इलाहाबाद में पुलिस ने जो हिंसा की, उसे जायज ठहराने की जगह उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ने हिंसा में लिप्त पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई का भरोसा दिलाया और आंदोलनकारियों से संयम की अपील की. यह भी उनके और उनकी सरकार के स्वभाव के विपरीत है.

जो उनका तरीका है उसके मुताबिक़ अब तक इन आंदोलनकारी नौजवानों के नाम और तस्वीरों वाले पोस्टर शहर में लग जाने चाहिए थे और इनके घर कुर्की-जब्ती शुरू हो जानी थी.

बिहार और उत्तर प्रदेश में, खासकर इलाहाबाद में जिस तरह आंदोलनकारी नौजवानों को उनके छात्रावास में घुसकर मारा गया, उससे कुछ लोगों को जामिया मिलिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पुलिस की भीषण हिंसा की याद आ गई.

पुलिस की इस हिंसा पर कुछ बात करना ज़रूरी है इसके पहले कि हम अभी के नौजवानों के आंदोलन पर बात करें.

आंदोलनों में पुलिस का काम कठिन होता है. आंदोलनकारी जोश में और कई बार इरादतन व्यवस्था भंग करते हैं. पुलिस का काम व्यवस्था बनाए रखने का होता है. इसलिए दोनों के बीच खींचतान होना स्वाभाविक है. पुलिस बल का प्रयोग करेगी, यह भी सब जानते हैं.

पहले के आंदोलनों में यह होता रहा है. लेकिन पिछले सात साल में यह बदल गया है. अब पुलिस बलप्रयोग से स्थिति को नियंत्रित नहीं करती. वह इरादतन हिंसा करती है.

जामिया मिलिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पुलिस की कार्रवाई को इरादतन हिंसा के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता. अमूमन पुलिस दुश्मनों की तरह बर्ताव नहीं करती. लेकिन 2019 दिसंबर में नागरिकता के कानून के खिलाफ आंदोलनकारियों के साथ पुलिस का बर्ताव ऐसा था जैसे उसकी इनसे ज़ाती दुश्मनी हो.

यही बात 2 अप्रैल, 2018 को दलित संगठनों की तरफ से किए गए बंद के दौरान पुलिस की हिंसा में दिखलाई दी. उसने कथित ऊंची जाति के गुंडों के साथ मिलकर दलितों पर हिंसा की.

पुलिस और शासक दल के गुंडों के गठजोड़ का प्रमाण इस नारे से बेहतर और कोई नहीं हो सकता, ‘दिल्ली पुलिस लट्ठ चलाओ, हम तुम्हारे साथ हैं.’ पुलिस का सक्रिय हिंसक बल में बदल जाना जनतंत्र और गणतंत्र दोनों के लिए घातक है.

उत्तर प्रदेश और अब असम या अन्य राज्यों में पुलिस को सरकार विरोधियों के साथ हिंसा की जो छूट दी जा रही है, उसका ही परिणाम इलाहाबाद में पुलिस की अवाक् कर देने वाली हिंसा थी. वह छात्रावास में घुसकर जिस तरह बंदूक के कुंदों से दरवाजे तोड़ने की कोशिश कर रही थी, जिस तरह पुलिसवाले बार-बार दरवाज़े तोड़ने में हांफ रहे थे, उससे लग रहा था, यह उनका व्यक्तिगत क्रोध है.

पुलिस के चरित्र में इस  परिवर्तन पर हमें सोचने की ज़रूरत है. पुलिस को जनता का मालिक बना देने के नतीजे भयानक हो सकते हैं.

इन बातों से आगे हम इस पर विचार करें कि क्या छात्र आंदोलन की शुरुआत हो गई है? ऐसी कल्पना के पहले यह समझना आवश्यक है कि जो भी अभी सड़क पर थे, वे छात्र नहीं रह गए हैं.

यह भारत की पिछले दो दशकों की बड़ी दुर्घटना है जो चुपचाप हुई और जिससे हम सबने आंखें चुरा रखी हैं. ख़ासकर, उत्तर भारत में छात्र की जगह अब परीक्षार्थी या ‘टेस्टार्थी’ ने ले ली है. यह एक ऐसी प्रजाति विकसित की गई है जो सालोंसाल एक के बाद दूसरे टेस्ट देती रहती है.

जैसा इस रेलवे भर्ती परीक्षा के मामले से ही पता चलता है, इन सारे ‘टेस्टों’ को इतना जटिल बना दिया गया है और इन्हें इतना लंबा खींचा जाता है कि इनमें शामिल होने वालों की सारी युवा ऊर्जा उसी भूलभुलैया में बाहर का रास्ता खोजने को भागते हुए चुक जाती है.

वे एक नौकरी के टेस्ट से दूसरी नौकरी के टेस्ट के फॉर्म भरते रहते हैं, टेस्ट की तैयारी में कोचिंग करते हैं और गाइड में सिर खपाते रहते हैं. उनका खासा वक्त कोचिंग में गुजरता है. अपने समाज और राजनीति के बारे में विचार करने के लिए उनके पास वक्त नहीं होता जिसने उन्हें इस जाल में फंसा रखा है.

धीरे-धीरे वे इतना झुका दिए जाते हैं कि कम से कम पर समझौते को तैयार हो जाते हैं. उनकी आत्म छवि भी छात्र से ज़्यादा ‘प्रिपरेशनकारी’ की होती है. कॉलेज और विश्वविद्यालय के परिसर से ज़्यादा वक्त उनका कोचिंग सेंटर में बीतता है. यहां उन्हें अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखने को कहा जाता है और फालतू की बहस से दूर रहने की शिक्षा दी जाती है.

गांवों और छोटे क़स्बों में एक दूसरी तैयारी या कोचिंग चलती है. सुबह-सुबह आप नौजवानों को दौड़ लगाते देख सकते हैं. वे दौड़ते रहते हैं कि सेना, बीएसएफ या किसी राज्य की पुलिस में उनकी बहाली हो जाए. फिर उसके साथ वे घूस का इंतजाम भी करते हैं.

ये छात्र नहीं रह जाते. इसमें इनका कोई कसूर नहीं. लेकिन यह सच्चाई है कि भारत में, विशेषकर उत्तर भारत में छात्रों की जगह अब टेस्टार्थियों ने ले ली है. उनके पास आंदोलन का समय नहीं.

यह बात मेरी समझ में आई 2016 में संसद भवन थाने में ऐसे ही परीक्षार्थियों के एक झुंड से बात करके. ये सब ऊंचे स्तर के टेस्टार्थी थे. वे संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं की तैयारी करने वाले थे. किसी मसले पर वे आंदोलन कर रहे थे और अपनी मांग लेकर भाजपा के दफ्तर गए थे. वहां उनकी पिटाई हुई और पुलिस पकड़कर उन्हें थाने ले आई.

उनमें से एक ने मुझसे कहा कि पुलिस ने उन पर कितना जुल्म किया है. यह फरवरी 2016 की बात है. अभी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में उमर खालिद, कन्हैया, अनिर्बान आदि की गिरफ्तारी हुई थी. मैंने उनसे कहा कि पुलिस ने जेएनयू में भी छात्रों के साथ जुल्म किया है. इतना सुनना था कि वे छात्र बिदक उठे.

उन्होंने कहा कि हमें उनसे मत मिलाइए. हमारा मामला अलग है. मैं समझ गया कि इन सबने खुद को छात्रों की श्रेणी से अलग कर लिया है. ये प्रिपरेशन करने वाले टेस्टार्थी समुदाय के सदस्य हैं. ये छात्रों से किसी तरह का कोई लगाव महसूस करें, इसका कारण नहीं है.

जैसा पहले लिखा, इसके लिए ये दोषी नहीं हैं. यह जमात हमने पैदा की है. राज्यों के विश्वविद्यालयों को ध्वस्त करके उनकी जगह कोचिंग सेंटर खड़े करने में राज्य सरकारों को शर्म नहीं आती.

नीतीश कुमार के सत्तासीन होने के बाद पटना में बड़ा बैनर देखा था, ‘पटना को कोटा बनाना है.’ पटना की यह महत्त्वाकांक्षा देखकर सिर झुक गया. पटना विश्वविद्यालय ढह चुका है. चारों तरफ छोटे बड़े कोचिंग सेंटर उग आए हैं. छात्र समुदाय की मृत्यु हो चुकी है. उसकी जगह टेस्टार्थियों की भीड़ खड़ी हो गई है. भीड़ का गुस्सा ज़रूर फूट सकता है. वह आंदोलन नहीं कर सकती.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)