दुनिया

भारत ने पेगासस में दिखाई थी ख़ास दिलचस्पी, कई सालों के क़रार के लिए करोड़ों ख़र्चे

द न्यूयॉर्क टाइम्स के लिए काम करने वाले इज़रायल के खोजी पत्रकार रॉनेन बर्गमैन ने द वायर से बातचीत में कहा कि भारत के साथ हुए सौदे की शर्तों के अनुसार यहां की ख़ुफ़िया एजेंसियां एक बार में पचास फोन को स्पायवेयर हमले का निशाना बना सकती थीं.

2019 में इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: 2017 में पेगासस की खरीद के लिए भारत और इजरायल के बीच होनेवाला गोपनीय सौदा दोनों ही देशों के शीर्ष राजनीतिक और इंटेलिजेंस नेतृत्व के ‘शीर्ष स्तर’ पर अटक गया था.

इजरायल के खोजी पत्रकार रॉनेन बर्गमैन ने द वायर  को बताया कि इसकी वजह विवादास्पद स्पायवेयर पेगासस में मोदी सरकार की खास दिलचस्पी और इसकी खरीद पर इसके खास जोर के कारण था.

इंटरव्यू को नीचे दिए लिंक पर देखा जा सकता है.

बर्गमैन लंबे समय से इजरायल के इंटेलिजेंस और सैन्य प्रतिष्ठानों की रिपोर्टिंग कर रहे हैं और 2007 में एनएसओ समूह के अस्तित्व में आने के बाद से ही वे उस पर नजर बनाए हुए हैं.

पेगासस को लेकर न्यूयॉर्क टाइम्स में पिछले हफ्ते बर्गमैन की मार्क मजेटी के साथ संयुक्त रूप से एक खोजी रिपोर्ट प्रकाशित हुई है.

बर्गमैन के शब्दों में पेगासस ‘दुनिया का सबसे शक्तिशाली साइबर हथियार’ है. तेल अवीव के अपने घर से द वायर  से बात करते हुए उन्होंने 2017 में भारत द्वारा इजरायल से दो अरब डॉलर के हथियार सौदे के भाग के तौर पर स्पायवेयर की खरीद पर न्यूयॉर्क टाइम्स के खुलासे पर कुछ अतिरिक्त जानकारियां दीं.

यह पूछे जाने पर कि 2017 में भारत में पेगासस का सौदा कितने में किया, बर्गमैन ने इसकी कीमत कई दर्जन मिलियन में बताई और कहा कि यह अप्रैल में इजरायल के साथ किए गए दो अरब डॉलर के रक्षा सौदे का बस एक छोटा-सा भाग है.

बर्गमैन ने बताया कि पेगासस लाइसेंसों का शुल्क एक साथ निगरानी किए जा सकने वाले फोनों की एक अधिकतम संख्या (कोटे) के साथ आता है और भारत का सौदा एक समय में 50 फोन को निशाना बनाने की बात कही गई थी.

2021 में पेगासस प्रोजेक्ट ग्लोबल मीडिया कंसोर्टियम के हिस्से के तौर पर द वायर  की रिपोर्ट के बाद से मोदी सरकार ने अब तक पेगासस की खरीद की न तो पुष्टि की है, न ही इससे साफ तौर पर इनकार किया है.

एमनेस्टी इंटरनेशनल की टेक लैब द्वारा किए गए फॉरेंसिक जांचों ने कई पत्रकारों के स्मार्टफोन में सैन्य श्रेणी के स्पायवेयर होने का खुलासा किया. जिन्हें इस स्पायवेयर का निशाना बनाया गया, उनमें द वायर  के दो संस्थापक सदस्य, पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता और सुशांत सिंह और विपक्ष के प्रमुख रणनीतिकार प्रशांत किशोर शामिल हैं. ये नंबर पेगासस के संभावित निशानों के लीक डेटाबेस का हिस्सा थे.

इस डेटाबेस में कांग्रेस नेता राहुल गांधी, पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा, पूर्व सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा और मोदी सरकार के दो मंत्री अश्विनी वैष्णव और प्रह्लाद सिंह पटेल के नाम भी शामिल थे.

सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश के निर्देशन में काम कर रही एक समिति वर्तमान में इस बात की जांच में लगी है कि क्या सरकार ने पेगासस की खरीद की और क्या इसका इस्तेमाल किया और अगर ऐसा किया, तो किस कानूनी अधिकार के तहत किया?

उम्मीद की जा रही है कि समिति द्वारा अगले कुछ हफ्तों में अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में जमा करा दी जाएगी.

इस पृष्ठभूमि में द न्यूयॉर्क टाइम्स के खुलासे ने पेगासस के इस्तेमाल को लेकर राजनीतिक बहस को एक बार फिर से सुलगा दिया है.

विपक्ष ने प्रधानमंत्री को घेरते हुए एक स्पायवेयर के इस्तेमाल के द्वारा देश के लोकतंत्र का गला घोंटने और संसद को गुमराह करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी पर देशद्रोह का आरोप लगाया है.

रॉनेन बर्गमैन. फोटो साभार: ट्विटर/@ronenbergman)

अपने स्रोतों की गोपनीयता को सुरक्षित रखने का हवाला देते हुए बर्गमैन ने इस समझौते में शामिल व्यक्तियों के नाम को लेकर या किस भारतीय एजेंसी या एजेंसियों ने यह लाइसेंस हासिल किया, के बारे में सवालों का जवाब नहीं दिया.

हालांकि उन्होंने यह बताया कि ‘भारतीय नेतृत्व ने इजरायली नेतृत्व से अपनी वार्ता में इस लाइसेंस को हासिल करने के प्रति खास दिलचस्पी का परिचय देते हुए इस पर विशेष तौर पर जोर दिया.’

उन्होंने यह भी कहा कि कोई इंटेलिजेंस एजेंसी पेगासस को खरीदे, उसे इंस्टॉल करे और उस सिस्टम का ऑनलाइन एक्टीवेशन हो सके, इस प्रक्रिया में अनिवार्य तौर पर शीर्ष इजरायली अधिकारी की भूमिका होती है. रक्षा मंत्रालय के शीर्ष अधिकारी को लाइसेंस पर दस्तखत करना होता है और यह सिर्फ विदेश मंत्रालय की इजाजत से ही हो सकता है.’

उन्होंने आगे जोड़ा, ‘सामान्य तौर पर इसमें इजरायली प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की सीधी भूमिका होती है… कुल मिलाकर इजरायल की सीक्रेट एजेंसी मोसाद की भी इसमें भूमिका होती है.’

उन्होंने जोर देकर कहा कि इजरायली रक्षा प्रतिष्ठान के सभी विभिन्न अंगों और भारत के शीर्ष अधिकारियों… भारतीय इंटेलिजेंस सेवाओं- की भी इस प्रक्रिया में भूमिका होना जरूरी है.

इजरायल में लक्षित हत्याओं के गोपनीय इतिहास पर किताब लिखने वाले बर्गमैन ने बताया कि इजरायल के निर्यात नियमों के अनुसार पेगासस के हर ग्राहक को एक पन्ने के अंतिम उपयोगकर्ता (एंड यूजर) क़रार पर दस्तखत करना होता है, जिसमें वे इस स्पायवेयर का इस्तेमाल र्स्फि आतंकवादियों और संगठित अपराधों के खिलाफ करने का वचन देते हैं.

‘एंड यूजर को एक एंड यूजर सर्टिफिकेट पर दस्तखत करना होता है जिसमें वह (अंतिम उपयोगकर्ता) वचन देता है – यह (करार) इजरायली रक्षा मंत्रालय और अंतिम उपयोगकर्ता (एंड यूजर), मिसाल के तौर पर इंडियन ब्यूरो ऑफ इंटेलिजेंस के बीच होता है. तो, इंडियन ब्यूरो ऑफ इंटेलिजेंस तीन वचन देगा: एक, वह इसका इस्तेमाल सिर्फ खुद करेगा और अगर वह इसे किसी तीसरी पार्टी को देगा, तो इसके लिए इजरायल के रक्षा मंत्रालय से पूर्व इजाजत लेगा.  दूसरा वचन यह कि इसका इस्तेमाल सिर्फ आतंकवाद और संगठित अपराध के खिलाफ दिया जाएगा. इस पर दस्तखत करने के बाद ही लाइसेंस मिलता है और एनएसओ को बिक्री करने की इजाजत मिलती है.’

यह पूछे जाने पर कि क्या इजरायल के रक्षा मंत्रालय की डिफेंस एक्सपोर्ट कंट्रोल एजेंसी (डीईसीए) पत्रकारों, राजनीतिज्ञों और मानवाधिकार रक्षकों के खिलाफ पेगासस के इस्तेमाल को भारत द्वारा एंड यूज एग्रीमेट का उल्लंघन मानता है, बर्गमैन ने कहा कि डीईसीए और रक्षा मंत्रालय से अधिकार संबंधी सवाल कई बार पूछे गए हैं, लेकिन वे कभी भी जवाब नहीं देते हैं.

उन्होंने बताया कि सऊदी अरब के मामले में, जिसमें सऊदी अरब के सरकारी एजेंटों द्वारा सरकार विरोधी पत्रकार जमाल खशोगी की निर्मतापूर्वक हत्या के बाद रक्षा मंत्रालय द्वारा रियाद को पेगासस के इस्तेमाल का अधिकार वापस लेने पर विचार किया जा रहा था, लेकिन सऊदी युवराज और इजरायली प्रधानमंत्री के बीच टेलीफोन पर हुई बातचीत के बाद इसे फिर से बहाल कर दिया.

भारत के पेगासस करार के खास बिंदुओं के बारे में पूछे जाने पर बर्गमैन ने कहा,

‘भारत को जो मशीन बेची गई, उसकी कीमत के हिसाब से देखें, तो इसकी एक निश्चित क्षमता है, इसकी एक बैंडविड्थ (bandwidth) है, जिसे पहले ही तय कर लिया जाता है.  …लाइसेंस का मतलब किसी समय पर एक फोन की जासूसी करने की क्षमता से है. और पेगासस के बारे में मैं जितना जानता हूं, भारत को जो पेगासस बेचे गए, उसकी संख्या हालांकि सटीक तरीके से याद नहीं है, लेकिन यह 10 से 50 के बीच में है.

तो जैसा तय हुआ हो, उस हिसाब से इनमें से प्रत्येक 10 से 50 फोनों की निगरानी कर सकता है… एक बार जब आप इस कोटे से ऊपर चले जाते हैं, जो ऑपरेटर को किसी अन्य फोन की निगरानी को रोकना पड़ता है ताकि निगरानी किए जा रहे फोन की संख्या कोटे के भीतर रहे.’

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)