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यूपी: चित्रकूट के रसिन गांव के चित्र और रंग अनेक, चुनाव में अपनी जगह ढूंढती अलग-अलग आवाज़ें

ग्राउंड रिपोर्ट: बुंदेलखंड के चित्रकूट जिले के कर्वी ब्लॉक का रसिन राज्य के लोक निर्माण राज्यमंत्री चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय का गांव है. यहां ग्रामीण विस्थापन, बेरोज़गारी, आवारा पशु जैसी कई समस्याएं बताते हैं, हालांकि मतदान को लेकर उनकी राय मुद्दों की बजाय स्पष्ट तौर पर जातिगत समीकरणों पर आधारित है.

रसिन गांव के लोग. (सभी फोटो: मनोज सिंह)

चित्रकूट: ‘सरकार ने तो नुकसान बहुत किया है. सब कुछ उजड़ गया. अब जहां बसाया है, कुछ दिन बाद वहां से भी उजाड़ देगी. पहले अपने खेत में काम करते थे अब मजदूरी कर रहे हैं. गरीबों को न कॉलोनी आवास मिलती है, न शौचालय न रसोई गैस. सरकार ने जान, आत्मा तो सब ले ली है. बताओ क्या करें?

जंगल से जलौनी लकड़ियां लेकर लौट रहीं रसिन गांव की बिजुरी देवी ने बेहद बुझे स्वर में यह बात तब कही जब उनसे चुनाव और वोट के बारे में पूछा. बिजुरी और राजकुमारी रसिन बांध परियोजना के विस्थापितों में से हैं. दोनों के सभी खेत बांध के अंदर आ गए हैं. सात बीघा खेत परियोजना में चला गया और अब वे भूमिहीन हैं और मजदूरी करती हैं.

उन्होंने बताया कि घर के लिए 90 हजार रुपये मिला लेकिन खेत का पूरा मुआवजा नहीं मिला. अब सड़क किनारे घर बनवाकर रह रही हैं. एक बेटा मजदूरी करने बाहर चला गया है जबकि दूसरा बेटी यहीं रहकर मजदूरी करता है.

बिजुरी कहती हैं कि बांध परियोजना से पूरा गांव उजड़ गया. घर, खेती सब चली गई. अब बांध के बाजू में घर बनाकर रह रही हैं.

राजकुमारी और बिजुरी ने बताया कि सुबह ही दस बजे लकड़ियां लेने जंगल की तरफ गई थीं और अब चार बजे लौट रही हैं. आज जितनी लकड़ियां इकट्ठा की हैं वे एक सप्ताह काम आएगी. अभी वे चार दिन और जंगल जाकर लकड़ियां इकट्ठा करेंगी तो एक महीने तक खाना बनाने का इंतजाम हो जाएगा. सरकार की तरफ से दोनों को रसोई गैस नहीं मिली है.

मंत्री का गांव

बुंदेलखंड के चित्रकूट जिले के कर्वी ब्लॉक का रसिन गांव प्रदेश के लोक निर्माण राज्यमंत्री चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय का गांव है. यह गांव चित्रकूट विधानसभा क्षेत्र में आता है. चित्रकूट जिले में दो विधानसभा-चित्रकूट और मानिकपुर हैं और यहां पांचवें चरण में 27 फरवरी को मतदान है.

चित्रकूट विधानसभा क्षेत्र से वर्ष 2017 में चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय भाजपा से विजयी हुए थे. उन्होंने सपा के वीर सिंह को हराया था. बसपा प्रत्याशी तीसरे स्थान पर रहे थे.

इस बार भाजपा चंद्रिका प्रसाद फिर चुनाव मैदान में हैं. सपा ने वीर सिंह के बजाय अनिल कुमार प्रधान को और बसपा ने पुष्पेंद्र सिंह को चुनाव मैदान में उतारा है. कांग्रेस से निर्मला, सीपीआई से अमित यादव चुनाव लड़ रहे हैं.

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार गांव में 1,600 से अधिक घर और 8,786 आबादी है. गांव के लोगों के अनुसार 42 पुरवों में बंटे इस गांव की आबादी 15 हजार से अधिक है.

गांव में 21 फीसदी से अधिक दलित आबादी है, जिनमें जाटव सबसे अधिक हैं. पिछड़ी जातियों में कुर्मी, हरख, यादव, कुम्हार, कहार और सवर्णों में ब्राह्मणों की संख्या सबसे अधिक है.

‘टोटल हिंदुत्ववादी’

जब हम रसिन गांव के सबसे पहले पुरवे पर पहुंचे तो देखा कि साधन क्षेत्रीय सहकारी समिति समिति के बंद कार्यालय के पास इंटरलॉकिंग सड़क का काम तेजी से चल रहा है. वहां एक गुमटी के पास चार पांच लोग जमा हैं और चुनावी चर्चा में मशगूल हैं. पान खा रहे राजा मिश्रा का विश्लेषण है कि इस क्षेत्र में भाजपा और सपा में टक्कर है.

वह कहते हैं, ‘दोनो मामला रोमांच से है. कोई कमजोर नहीं है. सपा-भाजपा की कांटे की लड़ाई है. परिणाम किसी भी करवट ले सकता है.’ उनका मानना है कि बसपा लड़ाई में नहीं है. वह कहते हैं कि ‘बसपा पस्त हो गई है.’

मंत्री जी के काम का मूल्यांकन करते हुए वे कहते हैं कि उनका कार्यकाल न बहुत अच्छा रहा न बहुत बुरा. उनका काम हाई लेवल में नहीं है. उनके कार्यकाल में सड़क बनी है.

राजा मिश्रा के साथ खड़े रामनयन भाजपा के कट्टर समर्थक हैं. उनका कहना था कि पूरा ब्राह्मण समाज भाजपा के साथ है. वे बोले, ‘हम पार्टी को देखकर वोट करते हैं. हमने हमेशा भाजपा को वोट दिया है.’

भाजपा के पांच अच्छे कार्य के बारे में पूछने पर वह कहते हैं, ‘अयोध्या में मंदिर बन रहा है. बनारस में बना है. मथुरा में बनेगा.’ यह पूछने पर कि नौजवान रोजगार का सवाल उठा रहे हैं और कह रहे कि सरकार इस मुद्दे पर फेल है, रामनयन सरकार का बचाव करते हुए कहते हैं कि सरकार के बस में जो है, वह कर रही है.

बातचीत चल रही थी कि भगवा गमछा डाले दो युवाओं ने हस्तक्षेप किया. रवि शुक्ला और पवन शुक्ला नाम के ये युवक पास के गांव में लोक निर्माण राज्यमंत्री चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय का प्रचार कर लौट रहे थे.

रवि शुक्ला ने अपना परिचय ‘टोटल हिंदुत्ववादी’ के रूप में देते हुए कहा कि हम योगी के साथ हैं.

वह आगे कहते हैं, ‘इस चुनाव में बेरोजगारी कोई मुद्दा नहीं है. इस सरकार में सबसे अच्छा यह हुआ है कि जातिगत आरक्षण नहीं दिया गया है. ब्राह्मणों को नौकरी मिलना मुश्किल हो गया था. भाजपा सरकार ने 10 प्रतिशत सवर्ण आरक्षण कर अच्छा काम किया है. हम तो चाहते हैं कि आरक्षण खत्म हो जाए.’

पवन शुक्ला ने माना कि अन्ना पशु एक मुद्दा है और किसानों को बहुत नुकसान हो रहा है. फिर भी वह कहते हैं कि वे भाजपा और मंत्री जी के साथ हैं.

गांव के दूसरे हिस्सों में भी हमें ‘टोटल हिंदुत्ववादी’ मिले. पूरन पुरवा में मिले अरख बिरादरी के दुर्विजय सिंह का कहना था कि ‘मंत्री जी ने बहुत काम करवाया है. सड़क बनवाई है, बांध बनवाया है और गौशाला भी बनवाई है.’

वह कहते हैं, ‘कोई बुराई, तो कोई निकाई करेगा लेकिन मंत्री जी ने गांव के लिए काम किया है. यहां भाजपा की सपा से कांटे की लड़ाई है.  दोनों का कांटा चढ़ रहा है.’

सिंह ने भाजपा का समर्थन करते हुए महंगाई को मुद्दा मानने से इनकार कर दिया और कहा कि महंगाई घटती-बढ़ती रहती है. तभी रामभवदी नाम के एक नौजवान ने उनका जवाब देते हुए कहा, ‘आप गलत बोल रहे हैं. इस सरकार में महंगाई बहुत बढ़ी है. खाने के तेल और पेट्रोल का दाम तो देखिए. महंगाई से गरीब आदमी पिस रहा है.’

बेरोजगार की आवाज- हमें स्कूल बंद करके फावड़ा उठाना पड़ा

रामभवदी बीएड की पढ़ाई पूरी कर एमए कर रहे हैं. वह गांव में एक स्कूल चलाते थे जो मार्च 2020 में कोरोना लाॅकडाउन में बंद हो गया. इसके बाद उन्हें मजदूरी करनी पड़ी.

उन्होंने बताया, ‘हमने कभी फावड़ा नहीं उठाया था लेकिन हालात ने वह काम भी कराया. मैने जाॅब कार्ड बनवाया और मजदूरी की. पिछले साल से अब तक मनरेगा में 75 दिन मजदूरी की है लेकिन अभी तक पूरा पैसे का भुगतान नहीं हुआ है.’

वह कहते हैं, ‘हम अखिलेश यादव से प्रभावित हैं. उन्होंने अपने कार्यकाल में युवाओं के लिए अच्छा कार्य किया. युवा बेरोजगारी के मुद्दे पर वोट देगा. पढ़ा-लिखा कोई भी व्यक्ति इस सरकार को सपोर्ट नहीं करेगा. देखिए इस सरकार ने शिक्षा मित्रों के साथ क्या किया?’

बातचीत के दौरान बाइक से पहुंचे हेलमेट लगाए एक व्यक्ति का परिचय कराते हुए उन्होंने कहा, ‘ये शिक्षा मित्र हैं. अखिलेश सरकार में 40 हजार रुपये पाते थे. अब दस हजार पा रहे हैं. इनसे पूछिए कि इनके मन में क्या है?’

जब उनसे सवाल किया तो उनका कहना था कि ‘हमसे कुछ कहवाइए नहीं. हमारे अंदर बहुत कुछ है.’

दलितों का दर्द: ‘न तरकारी मिली न सरकारी, मर रहे हम बेमौत’

गांव के दलित समुदाय के लोग.

रसिन गांव के दलित पुरवे से गुजरते हुए नहर की पुलिया में बैठे एक दर्जन लोगों से मुलाकात हुई. इनमें छोटेलाल भी मौजूद थे. वह अपने मोबाइल पर बाबा साहब आंबेडकर का गीत सुन रहे थे.

छोटेलाल ने बातचीत ईवीएम से शुरू की. उनका कहना था, ‘आप लोग इसे हटवाइए. यह मशीन समझ में नहीं आ रही है. बटन दबाते हैं दूसरे पर और वोट जाता है तीसरे पर. पिछले चुनाव में हाथी पर वोटा डाला लेकिन चला गया कमल और मोदी पर.’

छोटेलाल को एक व्यक्ति समझाते हुए कहते हैं, ‘इस बार बटन दबाते के बाद पर्ची निकलेगी. पर्ची देख लीजिएगा. यदि पर्ची दूसरी निकले तो तुरंते खरमंडल कर दीजिएगा.’

छोटेलाल गांव में चुनावी माहौल का विश्लेषण करते हुए कहते हैं, ‘ब्राह्मण साइकिल और कमल के फूल में बंटे हुए हैं. हम सब एक साथ हैं.’ यह कहने पर लोग बसपा को कमजोर बता रहे हैं, वह कहते हैं, ‘हम कमजोर हों चाहें मजबूत, रहेंगे बसपा के साथ ही.’

छोटेलाल शिकायत करते हैं कि दलित समाज के किसानों को किसान सम्मान धनराशि नहीं मिल रही है. उन्हें आवास और शौचालय भी नहीं मिल रहा है.

छोटेलाल के साथी चंदू बताते हैं कि उम्र ज्यादा होने के कारण वे प्रचार में नहीं जा रहे हैं लेकिन बेटा प्रचार में गया है. ‘हम अपनी पार्टी के साथ हैं. हमें अपना वोट खराब नहीं करना है.’

चंदू कहते हैं, ‘गांव में आवारा पशुओं से काफी नुकसान हो रहा है. गांव में बनाए गए गौशाला के चारे-भूसा के लिए हमसे एक-एक हजार रुपये चंदा मांगा जा रहा है और कहा जा रहा कि गौशाला के लिए बजट नहीं है. हम पूछते हैं कि सरकार ने जब गौशाला बनाई है तो हम उसके लिए क्यों पैसा दें. सरकार वहां काम कर रहे लोगों को तनख्वाह दे सकती है तो चारा-भूसा के लिए पैसे का इंतजाम क्यों नहीं कर सकती?’

वे कहते हैं, ‘बेरोजगारी बड़ी समस्या है. गांव का बच्चा-बच्चा बाहर है. हम बूढ़े ही रह गए हैं.’

लोक निर्माण राज्य मंत्री चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय के बारे में पूछने पर वे व्यंग्य में कहते हैं, ‘गांव में बहुत काम हुआ है!’ राजा मिश्रा के टोले के तरफ इशारा करत हुए वह कहते हैं, ‘देखिए! वहां सिर्फ एक व्यक्ति के लिए सड़क बन रही है.’

लाला पुरवा के युवा कल्लू वर्मा आक्रोशित स्वर में कहते हैं, ‘छोटी जात वालों की कोई सुनता नहीं हैं. नोटबंदी के समय बैंकवाले हम लोगों को पैसा नहीं देते थे और बड़े लोगों को आसानी से पैसा दे देते थे. हमें कॉलोनी (आवास) नहीं दिया. अधिकारी कहते हैं कि तुम्हारे पास तो घर है. अरे घर कहां है? थोड़ा से अटरा बनवा लिया तो कह रहे हैं कि हमारे पास घर है!’

वे आगे कहते हैं, ‘मैं गुजरात में मजदूरी करता हूं. छुट्टी में घर आया हूं. मुझे गांव में राशन नहीं मिल रहा है. कोटेदार कहता है कि मैं गांव में नहीं रहता हूं, इसलिए राशन नहीं मिलेगा. मेरा इसलिए सबसे झगड़ा हो जाता है क्योंकि मैं कहीं झुकता नहीं हूूं. सरकारी कर्मचारी काम नहीं करेगा तो हमारी गाली सुनना पड़ेगा.’

उम्मीद की आवाज: ‘देश के वीरों समय न छोड़ो, भारत स्वर्ग लोक बन जइहों, धीर धरो सजनी’

डाॅ. आंबेडकर के गीत गाने वाले एक वृद्ध व्यक्ति को सभी लोग सम्मान से बाबा पुकार रहे हैं. बाबा कहते हैं, ‘इस सरकार में दलितों को  न तरकारी मिली न सरकारी, मर रहे हम बेमौत. जमीन न होती तो हम मर जाते.’

वह कहते हैं, ‘गांव का आधा आदमी हरियाणा, पंजाब और पता नहीं कहां-कहां चला गया है. वोट डालने भी नहीं या पाएगा.’ तमाम दुश्वारियों के बावजूद वह अपने गीत से समाज में हो रहे बदलाव से आश्वस्त करते हुए उम्मीद जगाने वाले गीत सुनाते हैं:

डाॅ. भीम ने बनायो संविधनवा
नयनवा से नीर बरसे
देश के वीरों समय न छोड़ो
भाारत माता के सुनके आवाज
भारत स्वर्ग लोक बन जइहों
धीर धरो सजनी

विद्या का प्रचार है भारी
स्कूल खुले अउर खुले मदरसा
नदिया दूधों की बहियो
धीर धरो सजनी

खेत मिलल बिजली मिली और ट्यूबवेल
राजा का राज गई टूट, टूट गई जमीदारी
खेत पर बंद हुई मनमानी
जुल्मी जइहें जेलिया
होइहें कर्ज माफी
धीर धरो सजनी

रसिन बांध परियोजना.

रसिन बांध परियोजना के विस्थापित

रसिन बांध परियोजना के पास वाले पुरवे में कुएं के जगत पर बैठे दलित समुदाय से आने वाले राधेश्याम, मोहन और दादू दयाल मिले.

राधेश्याम बोले, ‘ मंत्री जी पहले गांव में रहते थे, अब चित्रकूट में रहते हैं. अब यहां कम आते हैं. प्रचार चल रहा है. सब पार्टी आ चुकी है, अभी वह नहीं आए हैं. उनका अपना गांव है, सबसे आखिर में आयेंगे.’

यह पूछने पर कि ‘मंत्री जी’  ने क्या काम कराया है, जवाब देते हैं, ‘देखो चुनाव का मौसम आ गया तो सड़क बन रही है. अबकी माहौल ठीकठाक नहीं हैं. माहौल बदला हुआ है.’

बगल में खड़े दादू दयाल कहते हैं कि उनको कॉलोनी नहीं मिली है. किसान सम्मान निधि मिल रही है. यह पूछने पर किसी वोट देंगे तो वह कहते हैं, ‘अभी नहीं बताया जा सकता. समीकरण देख रहे हैं. सभी लोगों की पार्टी बनी है तो पार्टी देखकर वोट होगा.’

तभी वहीं बैठे मोहन बोल पड़ते हैं, ‘अपना-अपना आंकड़ा है. हम भी अपने आंकड़ें में रहेंगे.’

दादू दयाल की 14 बीघा जमीन रसिन बांध परियोजना में चली गई हैं. उनको अभी मुआवजा का एक पैसा भी नहीं मिला है. वह कहते हैं, ‘बांध बहन जी के जमाने में बनना शुरू हुआ. वर्ष 2016 तक बन गया. योगी जी पिछले साल आकर हैंडओवर कर गए हैं.’

गले में भगवा गमछा डाले और चेहरे पर भगवा मास्क लगाए युवा रोहित त्रिपाठी दलितों से बातचीत करते देख वहां आते हैं और कहते हैं, ‘मंत्री ने मुआवजा दिलाने का प्रयास किया लेकिन इंजीनियर काम नहीं किए. मुआवजा का बजट नहीं मिला. बांध परियोजना से प्रभावित 75 फीसदी लोगों को मुआवजा नहीं मिला है. बहुत एप्लीकेशन दिए हल्ला मचाए लेकिन मुआवजा नहीं मिला.’

यह पूछने पर कि भाजपा की सरकार और गांव का मंत्री होने के बाद भी लोगों को मुआवजा आप क्यों नहीं दिला पाए तो थोड़े से रुआंसे होते हुए कहा, ‘अब आप ही बताएं क्यां करें? मेरी भी 20 बीघा जमीन बांध परियोजना में गई है. सरकार ने सिर्फ 22 हजार रुपये बीघा जमीन का रेट तय किया है जबकि जमीन की कीमत सात से आठ लाख रुपये बीघा है.’

रोहित कहते हैं, ‘बाजार दर से मुआवजा मिल जाए तो दूसरी जगह जमीन खरीद लें लेकिन सब काम रुका हुआ है.’ दादू दयाल कहते हैं, ‘आप लोग इस मुद्दे को उठाइए. आजकल तो पत्रकार ही सरकार हैं. जो चाहे उछाल दे.’

बांध विस्थापन पर बात चल रही थी कि तब तक गले में भगवा गमछा लपेटे माधव त्रिपाठी वहां पहुंच गए और कहने लगे, ‘आप लोग गौशाला का मुद्दा उठाइए. गौशाला की गायों के चारे के लिए धन नहीं मिल रहा है. अधिकारी ढिलाई कर रहे हैं.’

यह पूछे जाने पर कि ‘मंत्री जी’ भी बजट नहीं दिलवा पा रहे हैं क्या, वे निरुत्तर हो गए.

रोहित खुद मुआवजा न पाने के बावजूद भाजपा का प्रचार कर रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि ‘योगी जी सरकार बना लेंगे.’ माधव त्रिपाठी को भी यही उम्मीद है. वह कहते हैं, ‘कुछ ब्राह्मण इधर-उधर की बात कर रहे हैं लेकिन आखिर सब भाजपा में ही जाएगा.’

कई शहरों का नाम बदलने वाली योगी सरकार ने रसिन गांव की बांध परियोजना-रसिन बांध परियोजना का नाम भी बदल दिया है. पहले इसका नाम चौधरी चरण सिंह सिंचाई परियोजना थी.

इस परियोजना को वर्ष 2003 में तत्कालीन मायावती सरकार ने शुरू किया था. उस समय उसकी लागत 17.25 करोड़ थी. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले वर्ष 10 मार्च को इसका उद्घाटन किया. इसके बाद से बांध परियोजना के सभी बोर्ड, दीवारें भगवा रंग में रंग दी गईं.

योगी सरकार का दावा है कि उसने इस परियोजना को पूर्ण किया जिससे 17 गांवों की 2,290 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई हो रही है और इससे 3,625 किसानों को लाभ मिल रहा है. हालांकि नहरों में पानी न रहने की शिकायत आम है. बांध परियोजना से प्रभावित किसानों को आज तक मुआवजा देने का काम पूरा नहीं हुआ है. बांध से सैकड़ों प्रभावित किसान अब मजदूर बन गए हैं.

गांव के दलित कहते हैं, ‘बांध परियोजना बहन जी ने बनवाई लेकिन गांव के ब्राह्मण इसका श्रेय मंत्री चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय को देते हैं और उनके द्वारा कराए गए काम में इसको शामिल करते हैं.’

रसिन गांव के ये अलग-अलग चित्र और रंग बुंदेलखंड के चित्रकूट, बांदा के तमाम गांवों की कहानी है जो इस चुनाव में अपनी आवाज के लिए जगह ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं.

(लेखक गोरखपुर न्यूज़लाइन वेबसाइट के संपादक हैं.)