राजनीति

उत्तराखंड: कांग्रेस के आपसी झगड़ों और चुनावी कुप्रबंधन ने भाजपा की जीत का रास्ता साफ किया

उत्तराखंड में कांग्रेस अपनी हार के लिए मतदाताओं या भाजपा को ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकती. यह वक़्त है कि वह गहराई से आत्मविश्लेषण करे कि पांच साल अगर उसने कारगर विपक्षी दल की भूमिका सही ढंग से निभाई होती, तो फिर से इतने बुरे दिन नहीं देखने पड़ते.

दिसंबर 2021 में उत्तराखंड कांग्रेस में मची खींचतान के बाद दिल्ली में राहुल गांधी से मिलकर लौटते हरीश रावत और प्रदेश कांग्रेस के अन्य नेता. (फोटो: पीटीआई)

उत्तराखंड की 70 विधानसभा सीटों के चुनाव नतीजों ने 21 साल पहले जन्मे इस हिमालयी राज्य में एक नया इतिहास रच दिया. राज्य बनने के बाद से ही बेशुमार समस्याओं से घिरे इस प्रदेश में पहली बार विपक्ष इस तरह चित्त हुआ.

बारी-बारी से सरकार बदलने का तिलिस्म टूटा और सत्ता विरोधी रुझान होने के बावजूद मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को जनता ने लगातार दूसरी बार सिरे से नकार दिया.

भाजपा को भी एक झटका लगा. चार महीने पहले युवा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी कुमाऊं की तराई की खटीमा सीट तक नहीं बचा पाए. उनके साथ भाजपा के कई दिग्गज चुनाव हार गए.

लेकिन राज्य में आरामतलबी के आगोश में लिपटी गुटबाजी और खेमेबंदी में बंटी कांग्रेस के लिए भी बेहद बुरी खबर निकली. उसके मुख्यमंत्री के दावेदार हरीश रावत को लालकुआं विधानसभा सीट से निराशाजनक हार का सामना करना पड़ा.

कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्र में अच्छा-खासा असर रखने वाले रावत अपने कई उन कई करीबियों को भी चुनाव नहीं जितवा पाए, जिनको उन्होंने ज़ोरदार पैरवी करके टिकट दिलवाए थे.

कांग्रेस को दूसरा झटका प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल की पराजय ने दिया. श्रीनगर की प्रतिष्ठा की सीट पर मामूली वोटों से इस हार को जीत में बदलना ज़्यादा मुश्किल नहीं था.

यह रावत को दूसरा झटका था. उन्होंने ही गोदियाल को कुछ ही महीने पहले प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर बिठाया था. अब आगे पांच साल सत्ता से दूर रहकर कांग्रेस को इस हार का पश्चाताप वर्षों तक रहेगा.

कांग्रेस के लिए मुश्किल यह है कि उसने 2017 की बुरी हार से कोई सबक नहीं सीखा. तब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे हरीश रावत दो-दो जगह से चुनाव हार गए थे. अपनी बुरी हार के बावजूद कांग्रेस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही. न संगठन का ढांचा बनाया और न ही ज़मीनी स्तर पर पार्टी का जनाधार बढ़ाने की कोशिश की.

साफ़ दिखता है कि उसके नेता बस चुनाव के इंतज़ार में बैठे रहे. शायद सोचते रहे होंगे कि पांच साल मेहनत से क्या फ़ायदा जब जनता आखिर में भाजपा से नाराज़ होकर हमें खुद ही वोट डालने नमूदार हो जाएगी.

कांग्रेस इस बार भी इसी मुगालते में रही कि राज्य में नेतृत्व की खींचतान और भावी मुख्यमंत्री घोषित करने को लेकर मचा घमासान मतदान के दिन तक थम जाएगा. लेकिन उसका भ्रम अब टूट गया कि गुटबाजी और विधानसभा की टिकट बेचने के आरोप प्रत्यारोपों के बावजूद पहाड़ के लोग कांग्रेस को सत्ता की चाभी इतनी आसानी से सौंपने का जोखिम उठाएंगे.

यह स्पष्ट है कि भाजपा की तैयारियों और उसके अकूत धनबल और गांव के स्तर तक फैले उसके नेटवर्क को कांग्रेस ने एकदम नज़रअंदाज़ किया.

एकता कायम करने के लिए दिल्ली में सोनिया गांधी और राहुल गांधी के साथ बैठकों के कई दौर चले. कुछ दिन शांति रहती, लेकिन चुनावी तैयारियों को लेकर उत्तराखंड कांग्रेस के पास न तो कोई विजन था और न ही दिल्ली दरबार के पास कोई व्यापक रणनीति थी जिसके बल पर पहाड़ों के ज्वलंत मुद्दों को उठाकर चुनावी धार दी जाती.

पहाड़ों में बेरोजगारी, खाली होते गांव, भ्रष्टाचार, घोटाले और तीन-तीन मुख्यमंत्री बदलने की नाकामियों को लेकर कांग्रेस की कोई ज़ोरदार घेराबंदी कहीं नहीं दिखी. गुटबंदी के कारण समय पर उम्मीदवारों को टिकट नहीं बंटे.

खुद हरीश रावत नामांकन की आख़िरी तारीख को ही तय कर पाए कि चुनाव कहां से लड़ेंगे. बिना तैयारी के लालकुआं सीट पर उतरना उनकी हार का बड़ा कारण था. टिकट वितरण के अंतिम क्षणों में उनके शिष्य रणजीत रावत ने ही हरीश रावत की टिकट पर ग्रहण लगा दिया और कांग्रेस के पूरे चुनाव अभियान की हवा निकाल दी.

मौसम की मार भी पार्टियों पर भारी पड़ी. सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों में कंपकंपाती ठंड और बर्फबारी के बीच कांग्रेस अपनी चुनावी मशीनरी को समय पर नहीं झोंक पाई. दूसरी ओर, भाजपा ने अकूत पैसा, संसाधन और कार्यकर्ताओं की फौज हर जगह उतार दी.

चुनाव अभियान ख़त्म होने को था तो कांग्रेस के ज़्यादातर रणनीतिकार देहरादून में गाड़ियों में मंडारते दिखे जबकि उन्हें दूरदराज के क्षेत्रों में पार्टी के बूथ प्रबंधन और मतदाताओं के सीधे संपर्क में होना चाहिए था. कारगर जमीनी संवाद की रणनीति से ही भाजपा के खिलाफ आम जनमानस के आक्रोश को कांग्रेस के पक्ष में मतदान के लिए प्रेरित किया जा सकता था.

चुनाव अभियान के बीच कांग्रेस में आतंरिक तौर पर यह चर्चा लगातार रही कि कम से कम 20 विधानसभा सीटों पर कांग्रेस इसलिए चुनाव हार सकती है जहां उसने अयोग्य और खराब छवि के लोगों को टिकट बांट दिए.

कांग्रेस के भीतर-बाहर यही चर्चा चलती रही कि कइयों को टिकट बोली लगाकर बेचे गए और आख़िरी क्षणों में कई टिकट बदले गए और पार्टी के निष्ठावान लोगों को दरकिनार कर दिया गया.

उत्तराखंड कांग्रेस के प्रभारी देवेंद्र यादव पर हरीश रावत गुट ने खुलेआम टिकट बेचने का आरोप लगाया. हरीश रावत ने पार्टी नेतृत्व पर दबाव बनाने के लिए और अपने पक्ष में हवा बनाने की खातिर चुनाव से हटने तक की धमकी दे डाली.

इतना ही नहीं कांग्रेस के खिलाफ मुस्लिम तुष्टिकरण को लेकर भी हथियार बनाया गया. भाजपा ने हरीश रावत के नेतृत्व वाली पिछली कांग्रेस सरकार पर यह भी झूठा आरोप हवा में उछाला कि राज्य में मुस्लिम विश्वविद्यालय बनाने का ऐलान हुआ था. साथ ही नमाज के लिए छुट्टी का दिन घोषित करवाने की बेसिरपैर की खबरें भी भाजपा और उसके आईटी सेल ने सप्ताह भर तक चलाई.

कांग्रेस जब तक भाजपा की मशीनरी के इस शरारतपूर्ण दुष्प्रचार का मुकाबला करती तब तक बहुत देर हो चुकी थी. भाजपा ने उन सीटों पर भी हिंदू-मुस्लिम विभाजन के सांप्रदायिक कार्ड का इस्तेमाल किया जहां मुस्लिम अल्पसंख्यक आबादी न के बराबर है.

कई लोगों को इस बात का मलाल है कि हर मोर्चे पर भाजपा सरकार की नाकामी के बावजूद कांग्रेस ने मुद्दों को उठाकर भाजपा को मतदाताओं के सामने कटघरे में खड़ा करने में भारी चूक कर दी.

प्रियंका गांधी का ‘लड़की हूं लड़ सकती हूं’ अभियान भले ही यूपी में कांग्रेस के चुनाव प्रचार में चलता रहा, लेकिन उत्तराखंड की महिलाओं के बीच इस मुहिम को सही ढंग से ले जाया जाता तो संभव था कि कांग्रेस के जनाधार वाले पहाड़ में उसकी सरकार की वापसी हो सकती थी.

महिलाएं ज़ाहिर तौर पर उत्तराखंड के सामाजिक आर्थिक जीवन का मज़बूत आधार हैं. राज्य बनने के बाद भी उनकी आशाएं, आकांक्षाएं अधूरी हैं. दूसरी ओर भाजपा ने मोदी मैजिक और ज़रूरतमंद परिवारों को दो साल से मुफ़्त राशन बांटकर महिलाओं और गरीब तबकों में अपना जनाधार बढ़ाया है.

देहरादून में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और अन्य पार्टी नेताओं के साथ कांग्रेस का घोषणापत्र जारी करतीं पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी. (फोटो साभार: ट्विटर/उत्तराखंड कांग्रेस)

राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के नाम पर भाजपा का सबसे बड़ा वोट बैंक पूर्व सैनिकों व उनके परिवारों का रहा. कांग्रेस ने भरपूर कोशिश की कि भाजपा के इस मज़बूत वोट बैक में सेंध लगाई जाए लेकिन उसकी तैयारी परवान नहीं चढ़ी. इस बार भी भाजपा ने ज़्यादातर सीटों पर सेवारत फौजियों के बैलेट पेपर और पूर्व सैनिकों के वोटों के बल पर ही बढ़त बनाई.

मतदान के नतीजे बताते हैं कि इस सबके बावजूद उत्तराखंड में भाजपा के वोट में दो प्रतिशत की गिरावट आई है, लेकिन इसका भी लाभ कांग्रेस को नहीं मिला. खुश होने के लिए उसके पास यही एकमात्र बहाना है कि उसकी सीटें 11 से बढ़कर 20 हो गईं.

दरअसल, उत्तराखंड में कांग्रेस के सामने साख बचाए रखने का सबसे बड़ा संकट रहा है . 2012 से 2017 तक अपनी सरकार में अपने काम से कांग्रेस ने ऐसी कोई छाप नहीं छोड़ी, जिससे लोग भाजपा को सत्ता से हटाकर आसानी से उसे बागडोर सौंप देते. भाजपा सरकार की पांच साल की नाकामियों के खिलाफ कोई ठोस रणनीति मैदान में नहीं उतारी गई.

भाजपा के मुकाबले कांग्रेस में समर्पित कार्यकर्ताओं का सबसे बड़ा संकट रहा है. कार्यकर्ताओं का यह संकट आने वाले दिनों में और भी बढ़ेगा क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस से अब लगभग सारे राज्य छिन चुके हैं.

केंद्रीय स्तर पर नेतृत्व की दिशाहीनता का असर उत्तराखंड पर भी पड़ना तय है. हरिद्वार जनपद की तीन सीटों में से दो पर बसपा और एक पर निर्दलीय ने जीत हासिल की. इन सीटों पर सही रणनीति बनाई जाती तो यह कांग्रेस की झोली में आती.

इसी तरह उत्तरकाशी की यमुनोत्री सीट पर भाजपा विरोधी जनाक्रोश का लाभ कांग्रेस को नहीं बल्कि निर्दलीय संजय डोभाल ने आसान चमत्कारिक जीत हासिल करके कांग्रेस और भाजपा दोनों को पटखनी दी.

कांग्रेस का हर दांव उल्टा पड़ा. चुनाव कार्यक्रम घोषित करने के हरीश रावत के हठयोग ने कांग्रेस की छवि को नुकसान पहुंचाया. जबकि पांच साल की अस्थिरता के बावजूद भाजपा में इस तरह का कोई संकट नहीं दिखा.

इन्हीं सारी बातों से भाजपा के हाथ मुद्दे लगते रहे और उसने सत्ता विरोधी रुझान को कांग्रेस के खिलाफ ही इस्तेमाल किया और इस बार भी दो तिहाई बढ़त हासिल कर ली.

विडंबना देखिए कि जिस भाजपा से पांच साल तक डांवाडोल सरकार चलाने, विवादास्पद भू क़ानून लाकर उत्तराखंड की ज़मीनों पर बाहरी कॉलोनाइज़र्स और धन्ना सेठों का कब्ज़ा कराने और भ्रष्टाचार के आरोपों के जवाब मांगे जाने चाहिए थे, वहीं भाजपा विपक्ष में पस्त पड़ी कांग्रेस से पांच साल का हिसाब मांगने लग गई. वहीं, कांग्रेस चुनाव अभियान के बीच आपसी झगड़ों और टांग खिंचाई में उलझी रही.

बहरहाल उत्तराखंड में कांग्रेस अपनी हार के लिए मतदाताओं या भाजपा को ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकती. यह वक्त है कि वह गहराई से आत्मविश्लेषण करे कि पांच साल तक उसने कारगर विपक्षी दल की भूमिका सही ढंग से निभाई होती तो फिर से इतने बुरे दिन नहीं देखने पड़ते.

उसे अब इसी पर संतोष है कि 2017 में मात्र 11 सीटों वाली कांग्रेस को इस बार 20 सीटें मिल गई. चुनावी कुप्रबंधन, भितरघात और ग़लत लोगों को उम्मीदवार बनाकर कांग्रेस ने भाजपा की राह कई सीटों पर आसान कर दी.

कांग्रेस की इस करारी हार से दरअसल उन ज्वलंत मुद्दों की पराजय हुई, जिनके लिए इस राज्य का का गठन हुआ था. अब भाजपा न तो गैरसैंण में स्थायी राजधानी की बात करेगी, न ही रोज़गार, स्वास्थ्य, और सड़क, बिजली, पानी और अपने राज में हुए दर्जनों भ्रष्टाचार और घोटालों पर. इस जनादेश की आड़ में अपनी पिछली नाकामियों पर पर्दा डालने का उसे अच्छा खासा लाइसेंस जो मिल गया.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)