अडानी ने शपथपत्र में माना: अमेरिकी न्याय विभाग से बातचीत के दौरान वकीलों ने 10 अरब डॉलर निवेश की पेशकश की थी

अमेरिकी अदालत में दाखिल शपथपत्र में गौतम अडानी ने पहली बार स्वीकार किया है कि उनके वकीलों ने अमेरिकी न्याय विभाग (डीओजे) के साथ समझौता वार्ता के दौरान अमेरिका में 10 अरब डॉलर निवेश के प्रस्ताव का उल्लेख किया था. हालांकि, डीओजे ने इस प्रस्ताव को औपचारिक रूप से ख़ारिज कर दिया था.

अडानी समूह के चेयरपर्सन गौतम अडानी. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: भारतीय अरबपति उद्योगपति गौतम अडानी ने बुधवार (15 जुलाई) को पहली बार अमेरिकी अदालत में दाखिल एक शपथपत्र (स्वॉर्न एफिडेविट) में स्वीकार किया कि उनके वकीलों ने अमेरिकी अभियोजकों को यह सुझाव दिया था कि अडानी समूह की अमेरिका में 10 अरब डॉलर निवेश करने की सार्वजनिक रूप से घोषित योजना को उनके खिलाफ चल रहे आपराधिक और दीवानी मामलों के समाधान (सेटलमेंट) का हिस्सा बनाया जा सकता है, यदि अमेरिकी न्याय विभाग (डीओजे) या प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग (एसईसी) ऐसा चाहता हो.

अडानी के शपथपत्र से यह भी स्पष्ट होता है कि अभियोजकों ने इस संभावित लेन-देन (क्विड प्रो क्वो) के प्रस्ताव को औपचारिक रूप से खारिज कर दिया था. हालांकि, इसके बावजूद उन्होंने बाद में अलग आधारों का हवाला देते हुए अडानी के खिलाफ मामला वापस लेने पर सहमति दे दी.

यह शपथपत्र मंगलवार को न्यूयॉर्क के ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट स्थित अमेरिकी जिला अदालत (यूएस डिस्ट्रिक्ट कोर्ट फॉर द ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट ऑफ न्यूयॉर्क) में दाखिल किया गया. इसमें पहली बार खुद गौतम अडानी ने शपथपूर्वक स्वीकार किया है कि उनके वकीलों ने अमेरिकी न्याय विभाग के साथ समझौता वार्ता के दौरान इस प्रस्तावित निवेश का मुद्दा उठाया था.

अडानी ने अपने शपथपत्र में कहा, ‘इन समझौता वार्ताओं के दौरान मुझे जानकारी मिली कि मेरे वकीलों ने सुझाव दिया था कि अमेरिका में 10 अरब डॉलर निवेश करने की मेरी सार्वजनिक रूप से घोषित मंशा को इन मामलों के समाधान का हिस्सा बनाया जा सकता है, यदि डीओजे या एसईसी ऐसा चाहते हों.’

अडानी ने कहा कि उनकी समझ के अनुसार बाद में अमेरिकी न्याय विभाग ने उनके वकीलों को स्पष्ट कर दिया था कि वह आपराधिक मामले को खारिज करने का फैसला लेते समय इस संभावित निवेश पर विचार नहीं करेगा. उन्होंने यह भी कहा कि उनकी जानकारी के मुताबिक, मामला वापस लेने के न्याय विभाग के फैसले में इस प्रस्तावित निवेश की कोई भूमिका नहीं थी.

शपथपत्र में अडानी ने बताया कि यह प्रस्ताव उनके 13 नवंबर 2024 को एक्स (पहले ट्विटर) पर किए गए एक पोस्ट से जुड़ा था. उस पोस्ट में उन्होंने घोषणा की थी कि अडानी समूह अमेरिका की ऊर्जा सुरक्षा और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में 10 अरब डॉलर निवेश करने के लिए प्रतिबद्ध है, जिससे करीब 15,000 रोजगार सृजित होने की संभावना है.

अडानी ने अदालत को बताया कि जब उन्होंने यह घोषणा की थी, उस समय डीओजे का अभियोग और एसईसी की शिकायत अभी सार्वजनिक नहीं हुई थी, इसलिए उन्हें इनके अस्तित्व की कोई जानकारी नहीं थी.

हालांकि, अडानी ने अपने शपथपत्र में यह नहीं बताया कि अभियोग सार्वजनिक होने से पहले उन्हें इस जांच की जानकारी थी या नहीं. वहीं, डीओजे के अभियोग के अनुसार 17 मार्च 2023 को एफबीआई एजेंट गौतम अडानी के भतीजे और सह-आरोपी सागर अडानी के पास तलाशी वारंट लेकर पहुंचे थे. एजेंटों ने उनके इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जब्त किए थे और उन्हें एक वारंट सौंपा था, जिसमें अमेरिकी सरकार की जांच के दायरे में आने वाले कथित अपराधों, व्यक्तियों और संस्थाओं का उल्लेख था.

अडानी का यह हस्ताक्षरित शपथपत्र जस्टिस निकोलस गराफिस के आदेश के जवाब में दाखिल किया गया. पिछले सप्ताह जज ने अडानी को शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश देते हुए कहा था कि न्याय विभाग द्वारा मुकदमा वापस लेने के लिए दी गई दलील से यह आशंका पैदा होती है कि कहीं इसके पीछे कोई ऐसा समझौता तो नहीं था, जिसका खुलासा नहीं किया गया.

जज ने अडानी से पूछा था कि क्या उन्हें ऐसी किसी बात की जानकारी है जिसे सरकार द्वारा नवंबर 2024 के अभियोग को वापस लेने के फैसले के संबंध में वादा किया गया हो, पेश किया गया हो, मांगा गया हो, प्राप्त किया गया हो, उस पर सहमति बनी हो या स्वीकार किया गया हो. उन्होंने यह भी पूछा कि क्या अभियोग वापस लेने के बदले किसी तरह के लेन-देन या समझौते की जानकारी उन्हें है.

अडानी ने दोनों सवालों का जवाब ‘नहीं’ में दिया. उन्होंने कहा कि उनके वकीलों और अमेरिकी न्याय विभाग के बीच अमेरिकी प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग के समानांतर चल रहे मामले तथा ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल की अलग जांच के निपटारे को लेकर हुई बातचीत के अलावा, उन्हें ऐसी किसी बात की जानकारी नहीं है जिसमें अभियोग वापस लेने के बदले कुछ वादा किया गया हो या किसी तरह की सहमति बनी हो.

उन्होंने यह भी कहा कि उनकी जानकारी में ऐसा कोई समझौता नहीं है, जिसके तहत अभियोग वापस लेने के बदले किसी प्रकार का लेन-देन हुआ हो.

अडानी के वकील मार्क मुकैसी जेफ्रा ने अमेरिकी न्याय विभाग की अपनी जस्टिस मैनुअल का हवाला देते हुए कहा कि किसी मामले के निपटारे पर फैसला लेते समय अभियोजक जिन बातों पर विचार करते हैं, उनमें ऐसे शेयरधारकों, पेंशनधारकों, कर्मचारियों और अन्य लोगों को होने वाला असंगत नुकसान भी शामिल है, जिनकी व्यक्तिगत रूप से कोई गलती साबित नहीं हुई हो.

जेफ्रा ने आगे कहा कि 10 अरब डॉलर के निवेश का प्रस्ताव इसलिए रखा गया था ताकि यह रेखांकित किया जा सके कि इन आरोपों के लंबित रहने का एक दुष्परिणाम यह है कि इससे अडानी समूह की अमेरिका में निवेश करने की क्षमता और भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है.

जेफ्रा ने यह भी खुलासा किया कि 11 मई को अमेरिकी अटॉर्नी जोसेफ नोसेला ने बचाव पक्ष को ईमेल भेजकर स्पष्ट कर दिया था कि आपराधिक आरोपों के निपटारे के लिए अमेरिका में 10 अरब डॉलर निवेश करने के सामान्य प्रस्ताव को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा और इस कार्यालय द्वारा उस पर कोई विचार नहीं किया जाएगा.

घोषणा-पत्र के अनुसार, यह ईमेल मिलने के बाद बचाव पक्ष ने 10 अरब डॉलर के निवेश का प्रस्ताव दोबारा नहीं उठाया. साथ ही, बाद में अमेरिकी न्याय विभाग, प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग और ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल के साथ हुए समझौतों में इस निवेश प्रस्ताव को किसी भी रूप में शामिल नहीं किया गया और न ही इसे किसी समझौते की शर्त बनाया गया.

जस्टिस निकोलस गराफिस ने इन शपथपत्रों की मांग इसलिए की थी क्योंकि 4 जुलाई को अमेरिकी न्याय विभाग ने अदालत में दाखिल अपने आवेदन में स्वीकार किया था कि अडानी के अमेरिका में प्रस्तावित निवेश पर बातचीत हुई थी, हालांकि उसने मीडिया में आई उन खबरों से इनकार किया था जिनमें कहा गया था कि इन्हीं निवेश प्रस्तावों के कारण अडानी के खिलाफ आपराधिक मुकदमा वापस लेने का फैसला किया गया.

फिलहाल, जज ने अभियोग को खारिज करने के लिए न्याय विभाग की ओर से की गई मांग पर कोई फैसला नहीं दिया है.

द वायर ने जून में अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि उसने यह जानने के लिए भारत के 20 जीवित पूर्व मुख्य न्यायाधीशों से संपर्क किया था कि क्या उन्होंने गौतम अडानी के पक्ष में कोई कानूनी राय या बयान तैयार किया था.

अब तक सात पूर्व मुख्य न्यायाधीशों, बीआर गवई, संजीव खन्ना, आरएम लोढ़ा, जीबी. पटनायक, टीएस ठाकुर, एनवी रमना और पी. सदाशिवम, ने ऐसी किसी भी राय या बयान को तैयार करने से इनकार किया है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)