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कैसी होती है ग्लैमर से दूर गुमनामी में संन्यास लेने वाले क्रिकेट खिलाड़ियों की ज़िंदगी

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलने वाले भारतीय टीम के बड़े चेहरों के सुर्ख़ियां बनाने वाले रिटायरमेंट के उलट कम चर्चित, मगर प्रतिभावान खिलाड़ी अक्सर मीडिया की चकाचौंध से दूर मैदान को अलविदा कह देते हैं. अपने हुनर और अनुभव के बावजूद उनको कई बार बेहद संघर्षपूर्ण स्थितियों का सामना करना पड़ता है.

नवंबर 2013 में अपने आखिरी टेस्ट मैच के दौरान सचिन तेंदुलकर. (फोटो साभार: बीसीसीआई)

नई दिल्ली: लाइट्स, कैमरा और इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) ऑक्शन- तारीख थी 14 फरवरी और अब बारी सुरेश रैना की थी जिन्होंने आईपीएल 2022 की नीलामी में अपना बेस प्राइज़ 2 करोड़ रखा था. लेकिन वक्त गुज़रता गया और देखते ही देखते इस बार की आईपीएल की नीलामी में उनको किसी भी टीम में जगह नहीं मिली.

आज के समय में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद रैना जैसे खिलाड़ियों को आईपीएल अपने क्रिकेट को जीने का एक मौका देता है. मगर हर संन्यास की कहानी में यह पन्ना नहीं लिखा होता.

मैदान के रोमांच, स्टेडियम में दर्शकों की गूंज के इर्द-गिर्द ही खिलाड़ियों की जान बसती है और फिर एक दिन संन्यास लेकर एक नई पारी की शुरुआत करना कैसा होता है? क्या संन्यास के बाद की ज़िंदगी में ढलना आसान है?

30-40 की उम्र में सक्रिय खेल को छोड़ अपने अंदर बचे क्रिकेट को ज़िंदा रखने का क्या कोई तरीका नहीं है? क्योंकि हर एक खिलाड़ी के हिस्से सौरव गांगुली, सचिन तेंदुलकर या अनिल कुंबले जैसा संन्यास नहीं आता जो मैदान पर आखिरी अंतरराष्ट्रीय पारी खेल पाए और फिर जर्सी में मैदान को चूमने का उसको मौका मिले.

कई बार युवराज सिंह जैसे खिलाड़ियों को बिना आखिरी मुकाबला खेले ही संन्यास लेना पड़ा लेकिन यहां ऐसे संन्यास का भी ज़िक्र नहीं है. यहां ज़िक्र है संन्यास की अनसुनी दास्तानों का, उसके बाद की ज़िंदगी और संन्यास के बाद के विकल्पों का.

संन्यास के बाद कई खिलाड़ियों को क्रिकेट कमेंटेटर, कोच, अंपायर बनते दिखते हैं, तो कइयों को राजनीति, बॉलीवुड या ख़ुद का कोई बिज़नेस करता पाते है लेकिन हर क्रिकेट खिलाड़ी की सक्रिय खेल के बाद की ज़िंदगी आसान नहीं होती.

भारतीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट टीम का हिस्सा रह चुके विनोद कांबली बताते हैं कि साल 2011 में संन्यास लेने के बाद उनके ज़हन में सबसे पहले अपने बेटे का ख़याल आया. वह कहते हैं, ‘मैं अपने बेटे को क्रिकेट एकेडमी लेकर गया और वहां उसका पहला शॉट देखकर ही मुझे उसमें अपना भविष्य नज़र आने लगा.’

लेकिन कई प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को वह मुकाम ही नहीं हासिल होता जिसमें वह किसी का भी भविष्य देख पाएं.

‘संन्यास लेने के 7 साल बाद तक यही सोचता रहा कि मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?’ खेल के मैदान से दूर उत्तर प्रदेश के रसूलाबाद में 6 भाइयों, 5 बहनों के बीच पल रहे उबैद कमाल ने क्रिकेटर बनने का सपना देखा.

कड़ी मेहनत के बाद 18 साल की उम्र में उन्होंने उत्तर प्रदेश की टीम से खेलना शुरू किया. रणजी में यह तेज़ गेंदबाज़ सुर्खियां बटोर रहा था. उबैद कमाल की गेंदबाज़ी ने उत्तर प्रदेश की रणजी टीम की साख़ मजबूत की.

करिअर के शुरुआती मैच में उबैद कमाल. (फोटो क्रेडिट: उबैद कमाल)

उनकी रफ्तार का कमाल ऐसा था कि साल 1992-93 के रणजी सीज़न में तेज़ गेंदबाज़ों में सबसे ज़्यादा विकेट चटकाने वाले वही थे. पूरे करिअर की बात करें तो 57 फस्ट-क्लास मैच में उन्होंने 178 विकेट लिए थे.

यही नहीं, उबैद कमाल ने सचिन तेंदुलकर का दो बार विकेट लिया था जिसमें से दलीप ट्रॉफी के एक मैच में लिया विकेट उनके लिए यादगार था. वह राहुल द्रविड़ को भी तीन-चार बार आउट कर चुके थे.

उस दौरान भारतीय टीम में जवागल श्रीनाथ, मनोज प्रभाकर जैसे तेज़ गेंदबाज़ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेल रहे थे और घरेलू क्रिकेट में उबैद कमाल जैसे गेंदबाज़ अपनी बारी के इंतज़ार में खुद को खेल दर खेल निखारने में लगे थे.

उन दिनों वरिष्ठ खेल पत्रकार विजय लोकपल्ली रणजी ट्रॉफी के खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर रिपोर्ट लिखा करते थे. वह बताते हैं कि उत्तर प्रदेश से उबैद कमाल और आशीष विस्टन ज़ैदी- यह दो सबसे प्रभावशाली तेज़ गेंदबाज़ थे. इन दोनों का रणजी में प्रदर्शन शानदार था और यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने के प्रबल दावेदार थे. लेकिन दोनों को कभी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने का मौका नहीं मिला.

इंडिया की जर्सी के लिए…

उबैद के मुताबिक, बिशन सिंह बेदी के कहने पर उन्होंने अपना राज्य तक बदला और पंजाब से खेलकर भारतीय जर्सी को अपने नाम करने की कोशिशें की, लेकिन भूपिंदर सिंह को उनकी जगह मौका दिया गया.

उबैद कहते हैं, ‘ऐसे करते-करते मेरे समय में क़रीब 10 खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मौके मिले और मैं यही सोचता रहा कि मेरे पास इतनी प्रतिभा होने के बाद भी मुझे क्यों नहीं मौका दिया गया. जो मिलता वहीं कहता कि तुम नीली जर्सी के हकदार हो.’

उनके मुताबिक, उन दिनों बीसीसीआई के मुख्य पद पर रहे लोगों तक ने चयनकर्ताओं की अनियमितताओं पर हैरानी जताई थी. और फिर वो दिन भी आया जब उन्होंने क्रिकेट को अलविदा कह दिया.

साल 2000 में उन्होंने संन्यास ले लिया.

संन्यास लेने के बाद भी तेज़ गेंदबाज़ी से उनका प्यार, वो मैदान पर रोज़ उतरकर अपनी टीम के लिए खेलना और अच्छे प्रदर्शन के बावजूद मौके न मिलना, उनको मन ही मन खोखला करता गया.

उन्होंने अपने जीवन के 7 साल ऐसे अंधकार में गुज़ारे जहां रोशनी की कोई हल्की किरण भी उनके इस शोक को भेद नहीं पा रही थी.

सात साल बाद उन्होंने अपने आपको संभाला. अपने समय की महिला क्रिकेट खिलाड़ी से विवाह किया और फिर उत्तर प्रदेश के लेवल-ए (लेवल-1) के कोच के लिए इम्तिहान दिया.

उबैद अब उत्तर प्रदेश की अंडर-25 टीम के कोच हैं. (फोटो क्रेडिट: उबैद कमाल)

वे बताते हैं, ‘लेकिन मेरा बतौर कोच चयन नहीं हुआ. अब तेज़ गेंदबाज़ से फिरकी पर सवाल पूछेंगे तो क्या होगा. ऊपर से मेरी अंग्रेज़ी बिल्कुल अच्छी नहीं थी. मगर मैंने हार नहीं मानी. मैंने एक एकेडमी खोली, कई बच्चों को निशुल्क सिखाया जिनमें कामरान ख़ान जैसे खिलाड़ी रहे. लेकिन फिर कुछ ज़मीन विवाद के चलते मेरी वह एकेडमी बंद हो गई.’

उबैद बताते हैं कि इस समय खेल रहे दीपक चाहर, भुवनेश्वर कुमार को भी उन्होंने गाइड किया हुआ है. कुछ सालों बाद उनको उत्तर प्रदेश क्रिकेट टीम में पद मिले.

उबैद बताते हैं , ’10 साल पहले जब मैं उत्तर प्रदेश टीम की चयन कमेटी में मुख्य भूमिका में था तो एक 10 दिन का ट्रेनिंग कैंप लगा था जिसमें भुवनेश्वर कुमार ने मुझसे नौ दिन तक कुछ नहीं पूछा. मैं थोड़ा हैरान हुआ क्योंकि मुझे उसमें प्रतिभा नज़र आ रही थी. फिर आखिरी दिन उसने मुझसे इन-कटर मारने की सही तकनीक पूछी और मैंने उसको एक्शन और ग्रिप समझाई. वह बहुत जल्दी सीख गया और सीखने के साथ-साथ स्मार्ट भी है. मैंने अनुमान लगा लिया था कि आगे तक जाएगा. यही नहीं, दीपक चाहर को भी मैंने गाइड किया है.’

उन्होंने बताया, ‘मैं उत्तर प्रदेश की चयन कमेटी में मुख्य भूमिका में रहा. अब उत्तर प्रदेश की अंडर-25 टीम का कोच हूं और अब दोबारा एक एकादमी खोलने की कोशिश कर रहा हूं. मैं यह भी चाहता हूं कि मेरा बेटे अब मेरी खेल की विरासत को क्रिकेट के मैदान तक ले जाए.’

संन्यास के बाद कोच की भूमिका पाने की होड़

भारत में घरेलू क्रिकेट में कोच तक बनने के लिए जिस तरह की मुश्किलों का सामना उबैद कमाल ने किया, आज परिस्थितियां उससे काफी बेहतर हैं.

साल 2004 में सक्रिय क्रिकेट से संन्यास लेने वाले और मौजूदा समय में जम्मू कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन में बतौर हेड कोच कार्यरत संजीव शर्मा बताते हैं कि कोच बनने के लिए पहले राज्य-स्तर पर मौजूद एसोसिएशन को भर्तियों का नोटिफिकेशन आता है, फिर जो खिलाड़ी कोच बनना चाहते हैं, वह अपना नाम देते हैं. इसके बाद एसोसिएशन में लेवल- ओ का इम्तिहान पास करना होता है, फिर नेशनल क्रिकेट एकेडमी के लेवल-ए, लेवल-बी, सी का कोच बनने के लिए थ्योरी और प्रैक्टिकल का अलग-अलग इम्तिहान देना होता है. इन परीक्षाओं में बैठने के लिए अंतरराष्ट्रीय या घरेलू (क्लब, ज़िला) स्तर पर क्रिकेट खेलना का अनुभव होना ज़रूरी है.

अगर हम बीसीसीआई के 2016-17 की वार्षिक रिपोर्ट पर ग़ौर करें तो पता चलता है कि हर ज़ोन के मुताबिक घरेलू क्रिकेट में कोच पद के लिए 4, ट्रेनर की 2, फिजियोथेरेपिस्ट की 2 और वीडियो एनालिस्ट की 1, हर ज़ोन यानी कि नॉर्थ, साउथ, ईस्ट, वेस्ट और सेंट्रल ज़ोन में नियुक्तियां बंटी हैं.

इसके साथ ही समय-समय पर अलग-अलग टूर्नामेंट्स के लिए कुछ और चयन भी होते हैं. हालांकि कौन, कितने साल किसी टीम का कोच रहेगा यह निश्चित नहीं रहता.

संघर्षों से जूझे सदानंद विश्वनाथ

80 के दशक में अंतरराष्ट्रीय भारतीय टीम में बतौर विकेटकीपर बल्लेबाज़ चमकने वाले एक खिलाड़ी थे सदानंद विश्वनाथ. सैयद किरमानी, रोजर बिन्नी जैसे खिलाड़ियों के साथ घरेलू मुकाबले खेलने वाले कर्नाटक के सदानंद विश्वनाथ ने साल 1985-1988 तक अपने प्रदर्शन से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबदबा बनाया.

सदानंद. (फोटो साभार: सदानंद विश्वनाथ)

साल 1984 में भारतीय टीम में चयन होने के कुछ महीनों बाद ही सदानंद के पिता ने आर्थिक तंगी के कारण आत्महत्या कर ली थी. इसके बावजूद उन्होंने सदमे से उबरकर कुछ समय बाद अच्छा प्रदर्शन किया. सुनील गावस्कर ने ऑस्ट्रेलिया के साथ हुई वर्ल्ड चैंपियनशिप में विश्वनाथ को बतौर विकेटकीपर बल्लेबाज़ चुना और सदानंद विश्वनाथ ने निराश नहीं किया.

लेकिन मां की हार्ट सर्जरी और अपनी उंगली की चोट के बाद वह वापसी नहीं कर पाए.

सदानंन विश्वनाथ बताते हैं कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में विकेट-कीपर बल्लेबाज़ किरण मोरे अपनी जगह बनाने लगे थे और वह अपने निजी
ज़िंदगी की कुछ जटिलताओं में फंस रह गए. इसके बाद वह संन्यास लेकर भारत छोड़काट मध्य पूर्वी देश में नौकरी करने लगे. हालांकि वहां उनका मन नहीं लगा और वह वापस भारत आए

इसके बाद के चार बरस गुमनामी में बीते. फिर साल 2001 में वह लेवल-सी (लेवल-3) के विदर्भ के कोच बनें और आज घरेलू क्रिकेट में अंपायर हैं.

वह कहते हैं ‘मुझे कोचिंग से ज़्यादा अंपायरिंग पसंद है. मैं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अंपायर बनना चाहता था जैसे वेंकट राघवन, जय प्रकाश बने हैं. लेकिन मैं नहीं बन पाया. फिर भी मैं खुश हूं.’

अंपायर के बतौर काम करने की बात करें तो पूर्व में भारत की तरफ से अंतरराष्ट्रीय अंपायर रह चुके के. हरिहरन ने बताया कि घरेलू क्रिकेट में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) लगभग 132 अंपायर को नौकरी देता है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चयन आईसीसी द्वारा ही किया जाता जाता है जिसमें हर देश से चार अंपायर चुने जाते हैं और एलीट पैनल के स्तर के 12 से 8 अंपायर चुने जाते हैं.

अंपायर के तौर पर मैदान में सदानंद. (दाएं) (फोटो साभार: सदानंद विश्वनाथ)

वह यह भी बताते हैं कि पैसे तो अच्छे मिलते हैं लेकिन घरेलू अंपायर को ज़्यादा से ज़्यादा साल में 50 दिन काम के मिलता है, ऐसे में हाथ में कोई दूसरी नौकरी भी ज़रूरी है. वे खुद कस्टम विभाग में कार्यरत हैं.

दिल्ली से क्रिकेट खेल चुके और साल 2000 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में चुने जा चुके अमित भंडारी कहते हैं कि जब उनको दिल्ली के लिए खेलते हुए ओनजीसी में नौकरी का ऑफर आया तो उन्होंने वह नौकरी कर ली.

क्रिकेट के जाने-माने कमेंटेटर हर्षा भोगले कहते हैं कि अगर खिलाड़ी संन्यास लेने के कुछ समय पहले ही संन्यास के बाद की ज़िंदगी में वह क्या करेंगे, इसे लेकर सक्रिय हो जाते हैं तो इससे उनको सही फैसले लेने में मदद मिलती है.

खिलाड़ियों को मिलती है पेंशन

ऐसे कई खिलाड़ियों की मदद के लिए साल 2004 में बीसीसीआई ने पेंशन स्कीम शरू की थी. 2004 के बाद 2015 में एक बार फिर इसमें संशोधन किया गया था और पेंशन की रकम को बढ़ाया गया था.

कम से कम 174 पूर्व खिलाड़ियों को कुछ नियमों के तहत हर महीने सैलरी मिलती है जैसे 31 दिसंबर 1993 से पहले संन्यास ले चुके खिलाड़ियों में से जिन्होंने 25 से कम टेस्ट खेले हैं उऩको हर महीने 37,500 रुपये मिलते हैं. वहीं कई खिलाड़ियों के लिए वन टाइम पेंशन का प्रावधान भी है जिसका फायदा सुनील गावस्कर, रवि शास्त्री, सैयद किरमानी जैसे खिलाड़ियों को हुआ.

यही नहीं, वन डे और टेस्ट से जो अंपायर संन्यास लेते हैं उनके लिए भी बीसीसीआई ने पेंशन स्कीम का प्रावधान रखा है.

आईपीएल के एक मैच में सुरेश रैना के साथ महेंद्र सिंह धोनी. (फाइल फोटो, साभार: फेसबुक/चेन्नई सुपर किंग्स)

आईपीएल को हां, विदेशी लीग को न!

लेकिन संन्यास लिए खिलाड़ियों की कहानी आईपीएल के आने से रंगों से भरी नज़र आती है. टी-20 आईपीएल की शुरुआत की वजह से आज के खिलाड़ियों के पास संन्यास लेने के बाद कमेंटेटर, कोच, रेफरी, बीसीसीआई स्टाफ या अन्य विकल्पों से पहले अपने अंदर के क्रिकेट को ज़िंदा रखने का एक मौका आईपीएल के ज़रिये मिलता है.

हालांकि सुरेश रैना, इरफान पठान ने बीसीसीआई से यह निवेदन किया था कि खिलाड़ियों को विदेशी लीग जैसे बिग बैश लीग में भी खेलने की अनुमति दी जाए.

बीसीसीआई के नियमानुसार, जब तक खिलाड़ी सारे फॉर्मेट से संन्यास न ले ले, यहां तक किआईपीएल से भी और साथ ही बीसीसीआई से अनापत्ति प्रमाण पत्र न हासिल कर लें तब तक किसी भी भारतीय खिलाड़ी को विदेशी टी-20, टी-10 लीग में खेलने की अनुमति नहीं है.

साल 2019 में इन्हीं कारणों की वजह से युवराज सिंह, हरभजन सिंह को विदेशी लीग से अपना नाम वापस लेना पड़ा था क्योंकि संन्यास लेने के बावजूद वह आईपीएल से जुड़े थे.

यहां पर ग़ौर करने वाली बात यह है कि महिला खिलाड़ियों पर इस तरह की पाबंदियां नहीं है. स्मृति मंधाना से लेकर मिताली राज तक बिग बैश जैसी विदेशी लीग में खेलती हैं.

इस मुद्दे पर वरिष्ठ खेल पत्रकार विजय लोकपल्ली की राय में खिलाड़ियों को अगर ऐसे नियमों से नहीं बांधा जाएगा तो रणजी का खिलाड़ी
घरेलू टूर्नामेंट छोड़कर इन मुक़ाबलों में हिस्सा लेने लगेंगे. रही बात संन्यास लिए खिलाड़ियों की तो उनके पास विकल्प के तौर पर आईपीएल है और उसकी लोकप्रियता बनाए रखने के लिए ऐसे नियम ज़रूरी है.

(सूर्यांशी पांडेय स्वतंत्र पत्रकार हैं.)