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यूएपीए के तहत मुक़दमा चलाने की मंज़ूरी के लिए समयसीमा अनिवार्य: केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट का यह आदेश संबंधित आरोपी द्वारा दायर एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर आया है, जिसमें विशेष अदालत के आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें यूएपीए के तहत मुक़दमा चलाने की मंज़ूरी में देरी होने के आधार पर आरोपमुक्त करने की उसकी याचिका को ख़ारिज कर दिया गया था.

केरल हाईकोर्ट. (फोटो साभार: विकिमीडिया कॉमंस)

कोच्चिः केरल हाईकोर्ट ने राजद्रोह और एक प्रतिबंधित संगठन का सदस्य होने संबंधी तीन मामलों को रद्द करते हुए कहा कि गैर कानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत अभियोजन (मुकदमा चलाने) की मंजूरी के लिए समयसीमा अनिवार्य एवं महत्वपूर्ण है.

हाईकोर्ट ने भाकपा (माओवादी) के एक कथित सदस्य के खिलाफ मामलों को रद्द कर दिया.

हाईकोर्ट ने कहा कि यूएपीए के तहत मुकदमा चलाने की मंजूरी इसके लिए सिफारिश प्राप्त करने के छह महीने बाद दी गई थी, जबकि नियम कहते हैं कि इसे सात दिनों में दिया जाना चाहिए.

जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जस्टिस सी. जयचंद्रन ने यह भी कहा कि आईपीसी के तहत राजद्रोह के अपराध को लेकर आरोपी के अभियोजन (मुकदमा चलाने) के लिए विवेक का जरा भी इस्तेमाल नहीं किया गया.

हाईकोर्ट का यह आदेश आरोपी रूपेश द्वारा दायर एक आपराधिक पुनरीक्षण (क्रिमिनल रिव्यू) याचिका पर आया है, जिसमें विशेष अदालत के आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें मंजूरी में देरी होने के आधार पर आरोपमुक्त करने की उसकी याचिका को खारिज कर दिया गया था.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार का कहना है कि रूपेश और भाकपा (माओवादी) के अन्य सदस्यों ने वायनाड जिले के आदिवासी इलाकों में ‘देशविरोधी लेखन’ वाले पर्चे बांटे थे. उन्होंने इन इलाकों के स्थानीय लोगों को भी धमकाया था और खाने की मांग करते हुए कुछ घरों में भी घुसे थे.

राजद्रोह और यूएपीए के अपराधों के अलावा रूपेश और अन्य पर गैरकानूनी रूप से इकट्ठा होने, आपराधिक धमकी देने और शस्त्र अधिनियम की धारा 25 (1ए) के तहत भी आरोप लगाए गए थे.

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अभियोजन की सिफारिश किए जाने के बाद मंजूरी सात दिनों के भीतर दी जानी चाहिए थी.

न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज की अध्यक्षता में प्राधिकरण ने सात फरवरी 2018 को गृह विभाग के पत्र के आधार पर रूपेश के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी की सिफारिश की थी. राज्य सरकार ने छह जून 2018 को दो आरोपों और सात अप्रैल 2018 को तीसरे के लिए मंजूरी दी थी लेकिन दोनों में देरी की गई थी.

यूएपीए और उसके तहत बनाए गए नियमों के अनुसार, ‘सात दिनों का एक विशिष्ट समय प्रदान किया जाता है.’ इसे लेकर रूपेश के वकील ने तर्क दिया कि प्राधिकरण द्वारा एक सिफारिश किए जाने के बाद सरकार- यदि ऐसा चाहती है- सिफारिश प्राप्त होने के सात दिनों के भीतर मंजूरी प्रदान की जानी चाहिए.

अदालत ने इससे सहमति जताई. हाईकोर्ट ने कहा, ‘हमें पता चला कि यूएपीए की मंजूरी का आदेश समय पर नहीं लाया गया, जो कि वैधानिक रूप से अनिवार्य था.’

कोर्ट ने कहा, ‘दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 196 (1) के तहत फिर से मंजूरी में समझदारी नहीं बरती गई है जैसा कि मामले में दिए गए आदेशों से स्पष्ट है और इसलिए आईपीसी की धारा 124 ए (राजद्रोह) के तहत अपराध का संज्ञान लेना भी नहीं लिया जाएगा।

पीठ ने आगे जोड़ा, ‘आईपीसी और यूएपीए के तहत सत्र न्यायालय द्वारा लिया गया संज्ञान खारिज किया जाता है और साथ ही, आपराधिक पुनरीक्षण याचिकाओं में पारित आदेश को खारिज किया जाता है।’

आरोपी ने तर्क दिया कि अगर यूएपीए के तहत मंजूरी समय पर नहीं दी गई तो विशेष अदालत इस अधिनियम के तहत अपराधों पर संज्ञान नहीं ले सकती। इस पर राज्य सरकार का कहना था कि यह निर्धारित समय वाली बात अनिवार्य नहीं थी.

राज्य सरकार ने तर्क दिया कि समय कोई महत्वपूर्ण कारक नहीं है और देरी होने से आरोपी को लेकर कोई पूर्वाग्रह नहीं बनता जब तक कि संज्ञान लेने से पूर्व मंजूरी न मिल जाए.

राज्य सरकार के इस तर्क से असहमति जताते हुए पीठ ने कहा, ‘केंद्र सरकार गैर कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) व (अभियोजन की सिफारिश एवं मंजूरी नियम), 2008 समयसीमा निर्धारित करते हुए लेकर आई थी, जिसके तहत सिफारिश करनी होगी और मंजूरी देनी होगी. समय बहुत महत्वपूर्ण है और हमारे मुताबिक यह अनिवार्य है.’

इस मामले में हाईकोर्ट ने कहा कि यूएपीए के तहत मंजूरी सिफारिश मिलने की तारीख से छह महीने के बाद दी गई और इसलिए यह वैध नहीं है.

हाईकोर्ट ने कहा कि संसद 2008 में एक प्रावधान लेकर आया था, जिसके लिए न सिर्फ उपयुक्त सरकार से मंजूरी लेनी थी, बल्कि इस अधिनियम के तहत प्रशासन से पूर्व में अनुशंसा भी अनिवार्य थी.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, केरल हाईकोर्ट की एकल पीठ ने सितंबर 2019 में रूपेश द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका को मंजूरी दी थी, जिसमें रूपेश ने उस पर यूएपीए और राजद्रोह की धाराओं के तहत लगे आरोपों से मुक्त करने को कहा था.

हाईकोर्ट ने यूएपीए के तहत विशेष अदालत द्वारा लगाए गए इन आरोपों को रद्द करते हुए माना था कि सरकार ने तय समयसीमा के भीतर इसे मंजूरी नहीं दी थी.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि एनआईए की विशेष अदालत द्वारा पारित किए गए आदेश के खिलाफ पुनरीक्षण याचिका को सिर्फ हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष ही रखा जा सकता है. इसके बाद मामले को सुनवाई के लिए हाईकोर्ट के पास भेज दिया गया.

इस बीच, द न्यूज मिनट की 2019 की एक रिपोर्ट में बताती है कि रूपेश के खिलाफ तीन मामलों में यूएपीए के आरोपों को कानूनी रूप से हटा दिया गया है.

कथित माओवादी नेता के खिलाफ यूएपीए के तहत केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक में 40 से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)