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कृष्ण जन्मभूमि मामला: अदालत शाही ईदगाह मस्जिद हटाने का अनुरोध करने वाली याचिका पर विचार करेगी

मथुरा की ज़िला अदालत ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि परिसर में मौजूद शाही ईदगाह मस्जिद को हटाकर वह भूमि श्रीकृष्ण जन्मभूमि न्यास को सौंपने के मामले में दिए गए आदेश पर फिर से विचार करते हुए सुनवाई के लिए मंज़ूर कर लिया. सितंबर 2020 में इस याचिका को ख़ारिज कर​ दिया गया था. इस समय इसी तरह की मांग को लेकर स्थानीय अदालतों में 12 से अधिक और मामले में भी चल रहे हैं.

कृष्ण जन्मभूमि मंदिर और शाही ईदगाह मस्जिद. (फाइल फोटो: पीटीआई)

मथुरा: उत्तर प्रदेश में मथुरा की जिला अदालत ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि परिसर में मौजूद शाही ईदगाह मस्जिद को हटाकर वह भूमि श्रीकृष्ण जन्मभूमि न्यास को सौंपने के मामले में आदेश के पुनरीक्षण पर विचार करते हुए बीते बृहस्पतिवार को इस मामले को सुनवाई के लिए मंजूर कर लिया.

जिला शासकीय अधिवक्ता शिवराम सिंह तरकर ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रंजना अग्निहोत्री सहित छह कृष्ण भक्तों द्वारा 25 सितंबर, 2020 में पहली बार पेश किए गए इस मामले पर सुनवाई करते हुए सिविल जज (सीनियर डिवीजन) ने इसे खारिज कर दिया था, जिसके बाद यह प्रकरण पुनरीक्षण के लिए जिला जज की अदालत में पेश किया गया.

उन्होंने बताया कि इस बीच 12 से अधिक और मामले में भी इसी प्रकार की मांग को लेकर स्थानीय अदालतों में चल रहे हैं.

जिला न्यायाधीश राजीव भारती ने इस मामले पर बीती पांच मई को दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था. इस याचिका को बृहस्पतिवार को मंजूर कर लिया गया है. अब वह जिस सत्र अदालत को यह मामला सौंपा जाएगा, जहां इसकी सुनवाई होगी.

जिला शासकीय अधिवक्ता तरकर ने बताया कि रंजना अग्निहोत्री समेत याचिकाकर्ताओं का कहना है कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि की 13.37 एकड़ भूमि में से जिस जमीन पर शाही ईदगाह खड़ी है, वहां भगवान श्रीकृष्ण का जन्मस्थान और मंदिर का गर्भगृह स्थित रहा है, इसलिए ईदगाह को वहां से हटाकर वह भूमि जन्मभूमि न्यास को सौंप दी जाए.

याचिकाकर्ताओं का दावा है कि श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान एवं शाही ईदगाह इंतजामिया कमेटी के बीच जो समझौता हुआ था, वह अवैध है और उसे अमान्य घोषित किया जाए.

गौरतलब है कि रंजना अग्निहोत्री ने राम जन्मभूमि अयोध्या प्रकरण में भी अदालत में वाद दायर किया था और वहां भी उस मामले की पैरवी उन्हीं वकीलों- हरिशंकर जैन एवं विष्णु शंकर जैन ने की थी, जो इस समय वाराणसी के सिविल जज (सीनियर डिवीजन) की अदालत में चल रहे ज्ञानवापी मस्जिद के मामले की पैरवी कर रहे हैं.

दूसरी ओर, बीते 18 मई को सिविल जज की अदालत में अखिल भारत हिंदू महासभा के कोषाध्यक्ष दिनेश शर्मा ने एक नई अर्जी पेशकर शाही ईदगाह को भगवान श्रीकृष्ण मंदिर का गर्भगृह बताते हुए वहां जलाभिषेक किए जाने की मांग की है, लेकिन अधिवक्ताओं की हड़ताल हो जाने से इस मामले पर सुनवाई न हो सकी.

इसके बाद अदालत ने अन्य मामलों के साथ ही इस पर भी सुनवाई के लिए एक जुलाई की तारीख तय की है.

इस बीच, मथुरा की शाही ईदगाह मस्जिद में ‘हिंदू मंदिर के निशानों’ की मौजूदगी की जांच के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की एक टीम को भेजने का आदेश देने के आग्रह वाली एक याचिका बृहस्पतिवार को स्थानीय अदालत में दाखिल की गई.

श्री कृष्ण जन्मस्थान-शाही ईदगाह मस्जिद विवाद मामले में बृहस्पतिवार को सिविल जज (सीनियर डिवीजन) की अदालत में मनीष यादव नामक व्यक्ति ने दो अलग-अलग याचिकाएं दाखिल कीं.

याची के वकील दीपक शर्मा ने बताया कि एक याचिका में अदालत से गुजारिश की गई है कि वह मस्जिद के अंदर हिंदू मंदिर के निशानों की मौजूदगी का पता लगाने के लिए एएसआई की एक टीम भेजने के आदेश दे.

उन्होंने बताया कि दूसरी याचिका में अदालत से निवेदन किया गया है कि वह शाही ईदगाह मस्जिद के अंदर सीसीटीवी कैमरा लगाने के निर्देश दे, ताकि वहां मौजूद मंदिर के निशानों को संरक्षित किया जा सके.

शर्मा ने बताया कि अदालत से यह भी गुजारिश की गई है कि वह ईदगाह परिसर में रहने वाले लोगों को छोड़कर बाकी लोगों के मस्जिद में दाखिल होने पर पाबंदी लगाए और राज्य के गृह विभाग के प्रमुख सचिव को मस्जिद की निगरानी करने के निर्देश दे, ताकि कानूनी साक्ष्य के लिए मंदिर के निशान मौजूद रह सकें.

उन्होंने कहा कि याची को इस बात का अंदेशा है कि मस्जिद में मौजूद मंदिर के निशानों को मिटाया या क्षतिग्रस्त किया जा सकता है.

बीते 13 मई को मथुरा की एक अदालत में एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें वाराणसी के ज्ञानवापी मस्जिद के वीडियो सर्वेक्षण का हवाला देते हुए शाही ईदगाह मस्जिद के भी वीडियोग्राफिक सर्वेक्षण की मांग की गई थी.

गौरतलब है कि शाही ईदगाह मस्जिद कटरा केशव देव मंदिर परिसर में स्थित है. हिंदू पक्ष का दावा है कि मस्जिद के अंदर ही भगवान श्री कृष्ण का जन्म स्थान है.

मथुरा, अयोध्या और काशी (वाराणसी) उन तीनों स्थलों में से हैं, जिन्हें हिंदुत्ववादी कार्यकर्ता अक्सर इस्लामी संरचनाओं के विनाश के माध्यम से ‘मुक्त’ करने का संकल्प लेते हैं. 1980 के दशक से दक्षिणपंथी आंदोलनों के साथ ‘अयोध्या-बाबरी सिर्फ झांकी है, काशी-मथुरा अब बाकी है’ के नारे लगते रहे हैं.

फाइनेंशियल एक्सप्रेस ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि उपरोक्त याचिका में वीडियो सर्वेक्षण की मांग की गई है ताकि यह पता लगाया जा सके कि मस्जिद परिसर के भीतर ‘हिंदू कलाकृतियां’ और ‘प्राचीन धार्मिक शिलालेख’ हैं या नहीं.

ज्ञानवापी मामले में भी याचिकाकर्ताओं ने यह पता लगाने के लिए एक सर्वेक्षण की मांग की थी कि क्या परिसर में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं और उन्होंने मस्जिद में साल भर पहुंच की मांग की थी, जिसके बारे में उनका तर्क था कि उनके भीतर एक हिंदू मंदिर है.

समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, बीते 12 मई को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने मथुरा अदालत को कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद से संबंधित सभी मामलों को चार महीने की अवधि के साथ निपटाने का निर्देश दिया था.

हाईकोर्ट का आदेश कृष्ण भक्तों के एक समूह ‘नारायणी सेना’ के अध्यक्ष मनीष यादव की याचिका पर आया था, जिन्होंने मथुरा अदालत के समक्ष लंबित विवाद से संबंधित अपने मामले को जल्द से जल्द निपटाने की मांग की थी.

हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि इन मामलों के पक्षकारों, जैसे कि उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड और अन्य को अदालत के सामने पेश होने और सुनवाई में भाग लेने की आवश्यकता है. हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि अगर वे नहीं हैं और सुनवाई को रोकने का प्रयास करते हैं, तो मथुरा अदालत एकतरफा आदेश जारी कर सकती है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)