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जेएनयू ने कई कैंटीन और ढाबा मालिकों को 30 जून तक परिसर ख़ाली करने का निर्देश दिया

दिल्ली जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय प्रशासन ने परिसर में कई कैंटीन और ढाबों के मालिकों से लाखों रुपये की बकाया राशि का भुगतान करने और 30 जून तक विश्वविद्यालय परिसर को खाली करने का निर्देश दिया है. इसका विरोध करते हुए आइसा ने आरोप लगाया कि प्रशासन चाहता है कि ये कैंटीन मालिक परिसर ख़ाली कर दें, क्योंकि वे यहां बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाने की योजना बना रहे हैं.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) प्रशासन ने परिसर में कई कैंटीन और ढाबों के मालिकों से लाखों रुपये की बकाया राशि का भुगतान करने और 30 जून तक विश्वविद्यालय परिसर को खाली करने का निर्देश दिया है. विश्वविद्यालय ने आरोप लगाया कि इन दुकानों को उचित निविदा प्रक्रिया का पालन किए बिना आवंटित किया गया था.

विश्वविद्यालय के संयुक्त रजिस्ट्रार (संपदा) एमके पचौरी ने 22 जून को कई कैंटीन मालिकों को भेजे गए नोटिस में उनसे इसके जारी होने के सात दिन के अंदर संपूर्ण बकाया राशि का भुगतान करने को कहा है.

इस बीच, परेशान दुकान मालिकों को अपनी आजीविका खोने का डर है और बकाया भुगतान के लिए पैसे की व्यवस्था करना उनके लिए मुश्किल हो रहा है. उनके अनुसार, परिसर में 10 कैंटीन/ढाबों/फॉटोकॉपी की दुकानों को ये नोटिस दिए गए हैं.

विश्वविद्यालय ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति नोटिस का पालन करने में विफल रहता है तो वह सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जेदारों की बेदखली) अधिनियम, 1971 के अनुसार बेदखली की कार्यवाही के लिए उत्तरदायी होगा.

इसमें कहा गया है, ‘इस नोटिस के जारी होने की तारीख से सात दिन के अंदर उन्हें बकाया राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया जाता है, इस निर्देश के साथ कि उन्हें 30/06/2022 तक विश्वविद्यालय परिसर खाली करना होगा.’

इसके अनुसार, ‘उपरोक्त निर्देश का पालन करने में विफल रहने वाला व्यक्ति सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम 1971 के अनुसार बेदखली की कार्यवाही के लिए उत्तरदायी होगा. उक्त स्थान को खाली करने तक की तिथि तक बकाया किराया, जल एवं बिजली बिल आदि के बकाया का भुगतान किया जाना चाहिए.’

जेएनयू के रेक्टर अजय दुबे ने स्पष्ट किया कि उन दुकान मालिकों को नोटिस दिया गया है, जिन्होंने ‘लंबे समय से’ किराये और बिजली के बिल का भुगतान नहीं किया है. उन्होंने कहा कि कई दुकान उचित प्रक्रिया के तहत आवंटित नहीं की गई थीं.

नोटिस पाने वाले एक कैंटीन मालिक ने कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन उनसे बकाया किराये और बिजली बिल के रूप में 10 लाख रुपये मांग रहा है.

उन्होंने नाम सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर कहा, ‘मैं एक गरीब आर्थिक पृष्ठभूमि से आता हूं. परिवार में मैं और मेरा भाई ही कमाने वाले सदस्य हैं और हमारी आजीविका इस कैंटीन पर निर्भर है. मैं 10 लाख रुपये कैसे दे सकता हूं? उन्हें मासिक या वार्षिक बकाया की मांग करनी चाहिए थी. हम एक बार में 10 लाख रुपये का भुगतान कैसे कर सकते हैं? यहां तक ​​कि अगर हम भुगतान करते हैं, तो भी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि वे हमें रहने देंगे.’

साल 2016 से परिसर में पेंट्री की दुकान चला रहे एक व्यक्ति ने कहा कि उन्हें 20 लाख रुपये से अधिक का बकाया बिल प्रदान किया गया है.

उन्होंने कहा, ‘नोटिस के अनुसार, हमें इस बिल (20 लाख रुपये) का भुगतान करना होगा और परिसर खाली करना होगा. उन्होंने पहले भी नोटिस दिए थे, लेकिन हमने उनसे छूट के लिए अनुरोध किया था, क्योंकि हम केवल ‘समोसा’ और चाय बेचते हैं, लेकिन प्रशासन की ओर से कोई जवाब नहीं आया. अब हमें यह नोटिस दिया गया है.’

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, उन्होंने कहा, ‘मैं अपने कर्मचारियों को एक साल से वेतन नहीं दे पा रहा हूं और पेंट्री अच्छा नहीं कर रही है, लेकिन यह मेरी आय का एकमात्र स्रोत है. हमारी मदद करने के बजाय, प्रशासन यह बोझ हम पर डाल रहा है.’

नोटिस के अनुसार, मई 2019 में मालिकों को एक नोटिस भी दिया गया था, जिसमें जवाब मांगा गया था कि उनके खिलाफ बेदखली की कार्यवाही क्यों शुरू नहीं की जानी चाहिए.

2019 का नोटिस आगे की सूचना के साथ निविदा प्रक्रिया का पालन किए बिना कैंटीन/ पेंट्री/फोटोकॉपी दुकानों के आवंटन के मुद्दे को देखने के लिए विश्वविद्यालय द्वारा गठित समिति की सिफारिश पर तामील किया गया था.

इस कदम का विरोध करते हुए वाम-संबद्ध ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन (आइसा) ने आरोप लगाया कि प्रशासन चाहता है कि ये कैंटीन मालिक परिसर खाली कर दें, क्योंकि वे परिसर में सेवा के लिए बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाने की योजना बना रहे हैं.

आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एन. साई बालाजी ने कहा, ‘2014 से पहले दुकानों के आवंटन के लिए कोई नीति नहीं थी. इन लोगों (मालिकों) का साक्षात्कार लिया गया और उन्हें दुकानें आवंटित की गईं. विश्वविद्यालय ने 2014 के बाद एक नीति बनाई. और अब इन लोगों को लाखों में भुगतान करने और बेदखल करने के लिए कह रहा है.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)