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उदयपुर हत्या के बहाने समाज बांटने की कोशिश करने वालों से सावधान रहना ज़रूरी है

उदयपुर में हुई नृशंसता के बावजूद इस प्रचार को क़बूल नहीं किया जा सकता कि हिंदू ख़तरे में हैं. इस हत्या के बहाने जो लोग मुसलमानों के ख़िलाफ़ घृणा प्रचार कर रहे हैं, वे हत्या और हिंसा के पैरोकार हैं. यह समझना होगा कि एक सुनियोजित षड्यंत्र चलाया जा रहा है कि किसी घटना पर हिंदू, मुसलमान एक साथ एक स्वर में न बोल पाएं.

बुधवार को कन्हैयालाल की अंतिम यात्रा (फोटो: पीटीआई).

उदयपुर के कन्हैयालाल के हत्यारों को राजस्थान पुलिस ने राजसमंद में गिरफ्तार कर लिया है. राज्य के मुख्यमंत्री ने कहा कि यह कोई मामूली घटना नहीं है और जिस तरह हत्या की गई है, वह कल्पना के बाहर है. यह दुखद है और यह सारा घटनाक्रम चिंताजनक है. लोगों में इसे लेकर आक्रोश होगा, यह भी स्वाभाविक है. लेकिन राज्य इस हिंसा के मामले में इंसाफ करेगा और उन दोनों पर तेजी से मुकदमा चलाकर उन्हें सजा देना निश्चित किया जाएगा.

कन्हैयालाल के हत्यारे मुसलमान हैं. जिस तरह गला काटकर हत्या की गई वह मन में दहशत भर देती है. इस हत्या में एक विश्वासघात भी है. दर्जी जिसकी नाप ले रहा हो, वह उसका गला काट देगा, यह क्या वह सोच सकता था?

इसके बाद क्या दुकानदार और ग्राहक के बीच के रिश्ते में संदेह पैदा हो जाएगा. हर कोई हर दूसरे को संदेह की निगाह से देखेगा. यह कत्ल एक व्यक्ति का है, लेकिन किसी निजी झगड़े, विवाद, क्रोध में नहीं किया गया. हिंदुओं और मुसलमानों के बीच राह-रस्म पहले से मुश्किल हो जाएगी.

एक हत्या मात्र एक घटना नहीं होती और वह उसे क्षण तक सीमित नहीं रहती. कुछ ऐसी हत्याएं ऐसी होती हैं जिनका असर उस व्यक्ति के परिजन से बड़े समुदाय पर पड़ता है. मुख्यमंत्री की चिंता उनके राज्य में समाज के रिश्तों पर पड़ने वाले असर को लेकर भी है. हिंदुओं और मुसलमानों के बीच के रिश्तों को लेकर. इसलिए वे सबसे आक्रोश के बावजूद धैर्य, संयम और शांति की अपील कर रहे हैं.

जब राज्य तत्परता से इंसाफ की कार्रवाई करे तो उसकी मांग करते हुए किसी प्रदर्शन की आवश्यकता नहीं. जब उस हत्या को लेकर कोई समर्थन समाज के किसी हिस्से में हो तो उससे क्षोभ होना स्वाभाविक है. लेकिन जब हर तबका उससे स्तब्ध हो, सदमे में हो और उसे अस्वीकार करे तो एक साझा प्रतिक्रिया ही हो सकती है. सिर्फ हिंदू प्रतिक्रिया या मुसलमान प्रतिक्रिया नहीं.

हत्या के बाद मुसलमानों के सारे संगठनों, उनके धार्मिक अगुवों ने इस हत्या की एक स्वर में निंदा की है और हत्यारों को सजा देने की मांग की है. सारे मुखर मुसलमान बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों ने एक आवाज़ में अपना सदमा और कत्ल पर अपना रंज जाहिर किया है.

मुसलमानों में किसी ने हत्यारों के इस तर्क को किसी तरह स्वीकार नहीं किया कि पैगंबर की बेहुरमती करने वाली भारतीय जनता पार्टी की नेत्री का समर्थन करने के लिए कन्हैयालाल को उन्होंने मारा है.

सारे राजनीतिक दलों- वामपंथी, कांग्रेस समेत इस जघन्य हत्या की निंदा की है. आखिर कोई इसका समर्थन कर ही कैसे सकता है? लेकिन कुछ ऐसे लोग भी हैं जो शायद यह चाहते हैं कि इस हत्या का समर्थन करने वाले भी हों. खासकर मुसलमानों में. ऐसा हुआ नहीं है. मुसलमानों में किसी भी समूह, किसी भी व्यक्ति ने इसका समर्थन नहीं किया है और इसके लिए कोई औचित्य भी पेश नहीं किया है.

यह ठीक है कि पैगंबर मोहम्मद साहब के अपमान वाले टिप्पणियों के लिए भाजपा के नेताओं के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की जा रही थी. लेकिन किसी ने खुद उन्हें सजा देने की बात कभी नहीं की.

यह अलग बात है कि उस अपमान को अनेक लोग भाजपा नेताओं की अभिव्यक्ति का अधिकार ठहराकर उन नेताओं के पक्ष में अभियान चला रहे थे. राजस्थान में ही उन नेताओं के पक्ष में सभा की जा रही थी. मुसलमानों की तरफ़ से राज्य की संस्थाओं से मांग की जा रही है कि वे न्याय करें.

इस नृशंस हत्या का समर्थन मुसलमान नहीं कर रहे हैं, यह बात कई लोगों को अजीब लग रही है. आखिर उसे राजसमंद में, जहां ये हत्यारे पकड़े गए हैं, शंभूलाल रैगर, एक हिंदू ने कुछ उसी तरह अफराजुल, एक मुसलमान का कत्ल किया था. उसे टुकड़े-टुकड़े कर मारा था, उसकी फिल्म बनाई थी और उसे व्यापक हिंदू समाज में उनके आनंद के लिए प्रसारित किया था.

उस हत्या ने पूरे देश में सनसनी फैला दी थी. मुसलमानों में उससे दहशत फैल गई थी. लेकिन उस समय और आजतक उस हत्यारे के लिए एक बड़ा समर्थन हिंदू समूहों में था और है. हत्यारे की प्रतिमा बनाई गई, उसके पक्ष में हिंदुओं की एक भीड़ अदालत में पहुंच गई और उसने अदालत पर भगवा ध्वज लहरा दिया. हत्यारे की वकालत के लिए चंदा किया गया. आज तक अफराजुल के हत्यारे के पक्ष में समर्थन मौजूद है.

चूंकि इस प्रकार की प्रतिक्रिया तब हुई थी, आज कल्पना की जा रही है कि मुसलमान हत्यारों के पक्ष में भी मुसलमान खड़े होंगे. मुसलमान हत्यारे के पक्ष में नहीं, उसके ख़िलाफ़ हैं. वे उस पर सख़्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं.

ऐसा होता न देख यह कहा जाएगा कि जो अफसोस या निंदा कर रहे हैं, वे सच नहीं बोल रहे. वे मन में हत्यारे के साथ हैं. इस तरह समाज को बांटने की साजिश की जाती रही है और वह अभी भी की जाएगी.

राजस्थान सरकार ने बिना देर किए कार्रवाई की. तुरंत गिरफ़्तारी की गई. मुकदमा विशेष अदालत में त्वरित गति से चलाया जाएगा. इन सबके बावजूद भाजपा के नेता इस हत्या के बाद कांग्रेस सरकार पर तुष्टिकरण का आरोप लगा रहे हैं. वे मुख्यमंत्री की भर्त्सना कर रहे हैं. इसके लिए उन्हें निजी तौर पर जिम्मेदार ठहरा रहे हैं.

ये वही लोग हैं जिनका कहना है कि 2000 में गुजरात में लगभग 2000 हत्याओं और लाखों लोगों (प्रायः मुसलमान) के विस्थापन के लिए वहां के तत्कालीन मुख्यमंत्री को जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता बल्कि जो ऐसा कहता है, वही अपराधी है जैसा अभी तीस्ता और श्रीकुमार की गिरफ़्तारी पर खुशी की लहर से जाहिर होता है.

इस हत्या के बहाने मोहम्मद ज़ुबैर की गिरफ़्तारी को जायज ठहराया जा रहा है. मांग की जा रही है कि और भी लोगों को गिरफ्तार किया जाए जिन्होंने मुसलमानों के ख़िलाफ़ घृणा फैलाने वाले भाजपा नेताओं पर कानूनी कार्रवाई का अभियान चलाया है.

इस मांग में जो बेईमानी है, उसे वे भी जानते हैं जो यह मांग कर रहे हैं. वे चाहते हैं कि हम मान लें कि भाजपा नेताओं के घृणा प्रचार के खिलाफ मुहिम के कारण यह हत्या हुई है. इसलिए जहां इस हत्या से मुसलमान स्तब्ध हैं, वहीं भाजपा नेताओं में नई उत्तेजना भर गई है. वे बहुसंख्यक खतरे में हैं, का नारा लगाते हुए सड़क पर लोगों को लाने में जुट गए हैं.

इस हत्या की नृशंसता के बावजूद इस प्रचार को क़बूल नहीं किया जा सकता कि हिंदू ख़तरे में हैं. इस हत्या के बहाने मुसलमानों के ख़िलाफ़ जो लोग घृणा प्रचार कर रहे हैं, वे हत्या और हिंसा के पैरोकार हैं.

हम सबको यह समझना ही होगा कि एक सुनियोजित षड्यंत्र चलाया जा रहा है कि किसी एक घटना पर हिंदू मुसलमान एक साथ एक स्वर में न बोल पाएं. उस समान, साझा भारतीय भूमि को जोकि मानवीय भूमि है, हमें खोजना ही पड़ेगा.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)