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नगालैंड नागरिक हत्या: सुप्रीम कोर्ट ने सैन्यकर्मियों के ख़िलाफ़ पुलिस कार्यवाही पर रोक लगाई

दिसंबर 2021 में मोन ज़िले के ओटिंग और तिरु गांवों के बीच सेना की गोलीबारी में 14 नागरिकों की मौत हो गई थी, जिसकी जांच के लिए राज्य सरकार ने एसआईटी का गठन किया था. बीते महीने मामले में नगालैंड पुलिस द्वारा मेजर रैंक के एक अधिकारी समेत 21 पैरा स्पेशल फोर्स के 30 जवानों के ख़िलाफ़ आरोप-पत्र दायर किया गया था.

छह दिसंबर 2021 को मोन जिले में सशस्त्र बलों की गोलीबारी में मारे गए नागरिकों के अंतिम संस्कार में शामिल हुए परिजन और स्थानीय लोग. (फाइल फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: दिसंबर 2021 में नगालैंड के मोन जिले में 14 नागरिकों की हत्या के लिए कथित रूप से जिम्मेदार 30 सैन्यकर्मचारियों के खिलाफ राज्य पुलिस द्वारा शुरू की गई कार्यवाही पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को रोक लगा दी.

जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस वी. रामसुब्रमनियन की पीठ ने यह भी कहा कि ‘हिंसा के दौरान एक पैराट्रूपर (कमांडो) की मौत’ की अभी तक जांच नहीं हुई है. पैराट्रूपर गौतम लाल को बाद में उसी रात गुस्साए नागरिकों द्वारा मार डाला गया था और मोन मुठभेड़ के दौरान उनकी मौत नहीं हुई थी.

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें एक याचिका आरोपी सैन्य अधिकारी मेजर अंकुश गुप्ता की पत्नी अंजली गुप्ता ने लगाई है. उन्होंने अपने पति के नाम दर्ज एफआईआर, एसआईटी की रिपोर्ट और अन्य सहायक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी.

उन्होंने दावा किया कि (सैन्य) अधिकारी केवल ‘भारत संघ द्वारा निर्देशित अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे थे, लेकिन उक्त घटना की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच करने के लिए गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) ने पूरी तरह से मनमाने, एकतरफा और अवैध तरीके से काम किया है.’

उनका कहना है कि जनता के गुस्से को शांत करने के लिए और कुछ चुनिंदा लोगों की चिंताएं दूर करने के लिए एसआईटी ने उसके समक्ष उपलब्ध सबूतों को मनचाहे तरीके से रिकॉर्ड पर लिया है.

बता दें कि 4 दिसंबर 2021 को मोन जिले के तिरु-ओटिंग क्षेत्र में गोलीबारी की दो घटनाएं हुईं. पहली घटना शाम के करीब 4:26 बजे हुई, जिसमें छह लोग मारे गए. दूसरी घटना कुछ घंटों बाद रात करीब 9:55 बजे हुई, जिसमें सात ग्रामीण मारे गए.

द वायर ने इस महीने की शुरुआत में अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि कैसे मामले की जांच कर रही एसआईटी को पता चला था कि सेना के टीम कमांडर ने जान-बूझकर इस तथ्य को दबाया कि टीम कम से कम 50 मिनटों के लिए गलत दिशा में चली गई थी.

यह निष्कर्ष नगालैंड सरकार द्वारा फायरिंग और उसके बाद हुईं मौतों की जांच के लिए गठित एसआईटी द्वारा की गई छह महीने लंबी जांच के लिए मुख्य है.

बता दें कि बीते माह नगालैंड पुलिस ने मामले में मेजर रैंक के एक अधिकारी सहित ‘21 पैरा स्पेशल फोर्स’ के 30 कर्मचारियों के खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल किया था.

पुलिस ने बताया था कि जांच से पता चला है कि मेजर रैंक के एक अधिकारी के नेतृत्व में 31 कर्मचारियों वाली 21 पैरा स्पेशल फोर्स की अल्फा टीम ने नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (खापलांग) (युंग आंग) (एनएससीएन-के (वाईए) और यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) कैडर के एक समूह की क्षेत्र में मौजूदगी के बारे में खुफिया सूचना के आधार पर तीन दिसंबर, 2021 को ओटिंग तिरु क्षेत्र में एक अभियान शुरू किया था.

चार दिसंबर, 2021 को अपराह्न लगभग 4:20 बजे अपर तिरु और ओटिंग गांव के बीच लोंगखाओ में घात लगाकर वहां मौजूद 21 पैरा स्पेशल फोर्स की ऑपरेशन टीम ने सफेद बोलेरो पिकअप वाहन पर गोलियां चला दीं, जिसमें ओटिंग गांव के आठ आम आदमी सवार थे. इनमें से ज्यादातर तिरु में कोयला खदानों में मजदूर के रूप में काम करते थे. उन्होंने इन लोगों की न तो सही पहचान सुनिश्चित की थी और न ही हमले से पहले उन्हें कोई चुनौती दी थी.

पुलिस डीजीपी ने कहा था कि जांच से पता चला है कि ओटिंग और तिरु के ग्रामीण जब लापता ग्रामीणों की तलाश में घटनास्थल पर पहुंचे और रात करीब आठ बजे बोलेरो पिकअप वाहन मिला तो वे शव मिलने पर हिंसक हो गए और और 21 पैरा स्पेशल फोर्स के जवानों तथा ग्रामीणों के बीच हाथापाई शुरू हो गई, जिसमें एक पैराट्रूपर की मौत हो गई थी और हाथापाई के परिणामस्वरूप 21 पैरा स्पेशल फोर्स टीम के 14 कर्मचारियों को चोटें आईं. इसके चलते मेजर ने रात करीब 10 बजे गोली चलाने का आदेश दिया था. दूसरी घटना में विशेष बल की गोलियों से सात ग्रामीणों की मौत हो गई थी.