मीडिया ‘कंगारू कोर्ट’ चलाकर लोकतंत्र को कमज़ोर कर रहा है: सीजेआई रमना

देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एनवी रमना ने एक कार्यक्रम में कहा कि न्याय देने से जुड़े मुद्दों पर ग़लत जानकारी और एजेंडा-संचालित बहसें लोकतंत्र के लिए हानिकारक साबित हो रही हैं. प्रिंट मीडिया अब भी कुछ हद तक जवाबदेह है, जबकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की कोई जवाबदेही नहीं है, यह जो दिखाता है वो हवाहवाई है.

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श्रीनगर में जम्मू कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट के नए परिसर के शिलान्यास समारोह में सीजेआई एनवी रमना. (फोटो: पीटीआई)

देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एनवी रमना ने एक कार्यक्रम में कहा कि न्याय देने से जुड़े मुद्दों पर ग़लत जानकारी और एजेंडा-संचालित बहसें लोकतंत्र के लिए हानिकारक साबित हो रही हैं. प्रिंट मीडिया अब भी कुछ हद तक जवाबदेह है, जबकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की कोई जवाबदेही नहीं है, यह जो दिखाता है वो हवाहवाई है.

सीजेआई एनवी रमना. (फाइल फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) एनवी रमना ने शनिवार को वर्तमान न्यायपालिका के सामने आने वाली चुनौतियों को सूचीबद्ध करते हुए कहा कि देश में कई मीडिया संगठन ‘कंगारू कोर्ट’ चला रहे हैं… वो भी ऐसे मुद्दों पर जिन पर फैसला करने में अनुभवी जजों को भी कठिनाई होती है.

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, रांची में नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सीजेआई ने कहा, ‘न्याय देने से जुड़े मुद्दों पर गलत जानकारी और एजेंडा-संचालित बहसें लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो रही हैं. मीडिया द्वारा प्रचारित किए जा रहे पक्षपातपूर्ण विचार लोगों को प्रभावित कर रहे हैं, लोकतंत्र को कमजोर कर रहे हैं और व्यवस्था को नुकसान पहुंचा रहे हैं. इस प्रक्रिया में न्याय देने की प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.’

उन्होंने आगे कहा कि मीडिया अपनी जिम्मेदारियों के दायरे से आगे जाकर और उनका उल्लंघन करके लोकतंत्र को पीछे ले जा रहा है.

सीजेआई ने कहा, ‘प्रिंट मीडिया अब भी कुछ हद तक जवाबदेह है. जबकि, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की कोई जवाबदेही नहीं है, जो यह दिखाता है वो हवाहवाई होता है. सोशल मीडिया इससे भी बदतर है.’

सीजेआई रमना ने कहा, ‘मीडिया के लिए यह सबसे बेहतर होगा कि वह अपने शब्दों का नियमन और मूल्यांकन करे. आपको अपनी सीमाएं नहीं लांघनी चाहिए और सरकार या अदालतों से हस्तक्षेप की नौबत नहीं आनी चाहिए. जज तुरंत प्रतिक्रिया नहीं दे सकते हैं. कृपया इसे कमजोरी या लाचारी न समझें.’

जजों पर बढ़ते शारीरिक हमलों के बारे में बात करते हुए सीजेआई रमना ने जोर देकर कहा कि नेताओं, नौकरशाहों, पुलिस अधिकारियों और अन्य जनप्रतिनिधियों को उनके काम की संवेदनशीलता को देखते हुए सेवानिवृत्ति के बाद भी अक्सर सुरक्षा प्रदान की जाती है, ‘विडंबना यह है कि जजों को भी समान रूप से इस सुरक्षा के दायरे में नहीं लाया जाता.’

सीजेआई ने कहा. ‘इन दिनों, हम जजों पर शारीरिक हमलों की संख्या में वृद्धि देख रहे हैं… जजों को उसी समाज में रहना होता है जहां वह लोगों को सजा सुना चुके होते हैं, वो भी बिना किसी सुरक्षा या सुरक्षा के आश्वासन के.’

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, सीजेआई ने यह भी कहा कि वर्तमान समय की न्यायपालिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती ‘निर्णय के लिए मामलों को प्राथमिकता देना’ है. जज सामाजिक सच्चाईयों से आंखें नहीं मूंद सकते हैं. टालने योग्य विवादों और भारों से व्यवस्था को बचाने के लिए जजों को ऐसे दबावपूर्ण मामलों को प्राथमिकता में रखना होता है.’

मुख्य न्यायाधीश ने आगे कहा कि न्यायिक रिक्तियों को न भरना और बुनियादी ढांचे में सुधार नहीं करना देश में लंबित मामलों के मुख्य कारण हैं.