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स्वदेश दीपक: एक बहुत बड़े विस्तार में निपट अकेला…

जन्मदिन विशेष: एक सर्जक के मन की पीड़ाएं उसकी सर्जना के लिए माध्यम बनती हैं पर स्वयं सर्जक भी स्पष्ट रूप से नहीं समझ पाते कि उनकी मानसिक व्याधियों से उनकी कला का वह रूप संभव हो सका है, या अशांत मन के विकारों ने उनकी कला को सीमित किया. स्वदेश दीपक भी अपने मन की प्रेत-छायाओं से लड़ते रहे और अंततः जब लड़ने से थक गए तो अपने आस-पास की दुनिया को छोड़कर एक सुबह चुपचाप कहीं चले गए.

स्वदेश दीपक. (फोटो साभार: सौमित्र मोहन)

स्वदेश दीपक की ‘मैंने मांडू नहीं देखा’ पढ़ने के बाद सहसा यह विश्वास नहीं होता कि सात साल (1991-1997) तक दुनिया से नहीं बल्कि स्वयं से भी आत्मनिर्वासित व्यक्तित्व इस प्रकार की रचना लिख सकता है. एक लेखक के रूप में अपनी खोई हुई शक्तियों को प्राप्त करने की प्रक्रिया और उस प्रक्रिया की सुखद परिणति -यह किताब- सर्जक व्यक्तित्व की वापसी का विरल उदाहरण है.

स्वदेश दीपक (जन्म: 6 अगस्त 1942) ने वैसे तो ‘मायापोत’ और ‘नंबर 57 स्क्वाड्रन’ उपन्यास और ‘अश्वारोही’ जैसे कहानी संग्रह भी लिखे हैं, पर मुख्यतया हिन्दी साहित्य में वह अपने नाटकों के लिए जाने जाते हैं, जिनमें यथार्थ को देखने के लिए एक अलग नज़रिया, एक अलग ट्रीटमेंट उपयोग में लाया गया है. 1

980 के अंतिम वर्षों में स्वदेश के नाटकों ने हिन्दी के बेजान पड़ गए रंगमंच को एक नई ऊर्जा से आप्लावित किया. नाटक ‘कोर्ट मार्शल’ (1991) आधुनिक हिन्दी रंगमंच की दृष्टि से स्वदेश की सफलतम रचना है, जिसके हजारों प्रदर्शन देश-विदेश में हुए. सैन्य न्याय-व्यवस्था और भारतीय मानस में गहरे धंसे जातीय भेदभाव पर आधारित यह नाटक स्वदेश के ही नहीं बल्कि 20वीं शताब्दी के बेहतरीन नाटकों में भी एक है.

इसके अलावा ‘जलता हुआ रथ, काल कोठरी , सबसे उदास कविता’ स्वदेश की प्रमुख नाट्यकृतियां हैं. नाट्य विधा और रंगमंच में अपने अमूल्य योगदान के लिए वर्ष 2004 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

रावलपिंडी में जन्मे स्वदेश पर विभाजन की भी छायाएं थीं. गांव के गांव हिंसा और नफरत की आग में जिस तरह झुलसते चले गए, उन सब ने स्वदेश के अवचेतन को कहीं गहरे स्तर पर प्रभावित किया था. जिस प्रकार उनकी कथा का केंद्र मृत्यु से बनता है, एक गहरी छाया जो नाटकों में उभर आती है, उन सब के पीछे संभवतः बचपन की वह हिंसक स्मृतियां हों, जो खुद-ब-खुद उनकी लेखनी में आ जाते थे.

‘बगूगोशे’ कहानी संग्रह (2017), जिसे स्वदेश के जाने के एक दशक बाद उनके प्रिय मित्र सौमित्र मोहन ने संपादित किया था, में भी विस्थापित जीवन की छायाएं दिखती हैं. प्लाथ

स्वदेश दीपक का शुमार हिन्दी साहित्य के संदर्भ में बहुत कुछ उसी प्रकार किया जा सकता है जैसा कि अंग्रेजी साहित्य में सिल्विया प्लाथ और वर्जीनिया वुल्फ का होता है. इन सभी में समानता है तो सर्वप्रथम इस बात की कि इन सब रचनाकारों की सर्जनात्मकता को इनके मानसिक व्याधियों ने प्रभावित किया.

वुल्फ जो स्वयं व्यक्तित्व के दो अतिवादी रूपों से ताउम्र जूझती रहीं (जिसे आधुनिक विज्ञान ने बाइपोलैरिटी का नाम दिया) अंततः आत्महत्या से ही शांति प्राप्त करती हैं. सिल्विया प्लाथ, जिन्हें अंग्रेज़ी कविता के आधुनिक स्तंभों में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है, अपने 30 वर्ष के अल्प जीवन में मनोअवसाद (डिप्रेशन) का शिकार रहीं और आत्मघात की कई असफल कोशिशों के बाद अंततः स्वयं अपनी ज़िंदगी ख़त्म कर ली.

1990 के दशकों में सतह पर आ जाने वाले मनोरोग, जिसे बाईपोलैरिटी और स्किज़ोफ्रेनिया (Schizophrenia) कहा गया, ने स्वदेश को सालों परेशान किया. मन में घुमड़ने वाली छाया ही स्त्री का रूप धर- मायाविनी बनकर स्वदेश के यथार्थ में प्रवेश कर गई. यह छाया जो स्वदेश के अवचेतन के लिए यथार्थ था, उनके आस-पास की चेतन दुनिया के लिए उनके मन का वहम-मनोरोग.

स्वदेश दीपक भी अपने इन प्रिय लेखकों के समान ही अपने मन की प्रेत-छायाओं से लड़ते रहे और अंततः जब लड़ने की पूरी प्रक्रिया से थक गए तो अपने आस-पास की दुनिया को उसी प्रकार छोड़कर एक सुबह चुपचाप कहीं निकल पड़े- कभी वापस न लौटने के लिए.

सर्जक मन की यह दुखांत नियति सर्जना के लिए कितनी आवश्यक है, इस पर अध्ययन की पर्याप्त संभावनाएं हैं. स्वदेश की मानसिक व्याधि हालांकि बहुत बाद में जाकर सतह पर आई जो कि प्लाथ और वुल्फ से अलग स्थिति थी. उन दोनों ही लेखिकाओं ने आजीवन अपनी रचनात्मकता के समानांतर ही मानसिक व्याघातों को झेला था.

स्वदेश की आत्मकथा में वह वर्ष 1990 को अपने आत्म से निर्वासन का वर्ष मानते हुए स्पष्ट रूप से एक घटना/अनुभव विशेष को रेखांकित करते हैं, जिसके बाद से उनकी मानसिक दशा पहले की तरह नहीं रही. अपनी आत्मकथा ‘मैंने मांडू नहीं देखा’ में स्वदेश यह स्पष्ट करते हैं कि किस प्रकार ‘कोर्ट मार्शल’ के कलकत्ते में हुए एक प्रदर्शन के बाद एक रहस्यमयी स्त्री, जिसे वह मायाविनी कहते थे, ने उन्हें अपने साथ मांडू ले चलने का आग्रह किया- मांडू का किला जो रानी रूपमती और बाजबहादुर के अमर प्रेम की मिसाल था.

स्वदेश, जो उग्र स्वभाव के थे, गुस्से से भर कर न केवल मायाविनी को इनकार करते हैं, बल्कि बुरा-भला भी कहते हैं, जिसके बदले में वह स्वदेश पर काला जादू कर बैठती है.उन्हें इस काले जादू में घिर जाने का इतना विश्वास था कि वह हमेशा यह मानते रहे कि ‘मैं बीमार हूं क्योंकि मैंने उसका (मायाविनी का) अपमान किया था, क्योंकि मैंने उसके प्यार का प्रत्युत्तर देने से इनकार कर दिया था.’

पर वुल्फ और प्लाथ से तुलना को अग्रभूमि में लाने का उद्देश्य यह दिखलाना है कि किस प्रकार से एक सर्जक के मन की पीड़ाएं उसकी सर्जना के लिए माध्यम बनती हैं. और इस तथ्य को स्वयं सर्जक भी स्पष्ट रूप से नहीं समझ पाते कि उनकी मानसिक व्याधियों की वजह से उनकी कला का वह रूप संभव हो सका है, या अशांत मन के विकारों ने उनकी कला को सीमित किया है. स्वयं वुल्फ ने भी यह स्वीकार किया है कि,

‘The only way I keep afloat is by working. Directly, I stop working, I feel that I am sinking down, down. And as usual I feel that if I sink further, I shall reach the truth.’   

स्वदेश दीपक भी क्रियात्मकता की हद तक अपने इस मनोविकार को उपयोग में लाते हैं और इसी अध्यवसाय का परिणाम है- मैंने मांडू नहीं देखा. यह रचना हमें लेखक के उन सात वर्षों का आख्यान देता है, जो उन्होंने स्किज़ोफ्रेनिया के गहरे अवसादपूर्ण दिनों के साये में बिताए थे. रचना को लिखना भी वस्तुतः बहुत त्रासदायी था, क्योंकि एक अति-संवेदनशील मन को पुनः उस काले अतीत में जाकर उन स्मृतियों का पुनःसृजन करना था, उन्हें फिर से जीना था.

‘मैंने मांडू नहीं देखा’ हिन्दी में इस तरह की एक अनूठी रचना है, जो साहित्यिक प्रयोग को ध्यान में रखकर तो नहीं लिखी गई, पर उसकी अनुभूति और आस्वादन नवीन है- अभूतपूर्व. रचना का कथ्य, सत्य घटना, स्वानुभूति पर आधारित है, इसलिए स्मृतियों की भूमिका इस रचना के लिए महत्वपूर्ण है. और चूंकि स्मृतियों पर जीवन की कहानी आधारित है, इसलिए जैसे-जैसे अवचेतन पर पड़े चिह्न ऊपर उभर के आते हैं, वैसे-वैसे स्वदेश उसे पन्नों पर अंकित करते हैं.

(फोटो साभार: Juggernaut Books)

अपने संस्मरण लिखने की प्रेरणा भी दीपक को उनके परिचित गिरिधर राठी ने इसी तर्क पर दी कि ‘उस काल के बारे में कभी लिखने का सोचा आपने? बहुत सारे क्रिएटिव लोग उस रोग से जकड़े-पकड़े गए. लिखा किसी ने नहीं.’

और जब स्वदेश यह कहकर आनाकानी करने लगे कि अपनी बीमारी के बारे में नहीं लिखना चाहता, तब स्वदेश को प्रोत्साहन देने के क्रम में, उनकी सात साल लंबी बीमारी का आस्वाद स्पष्ट करते हुए कहा ‘मैंने कब कहा आप बीमारी का वर्णन करें. आपको एक पहाड़ के नीचे दबे रहने की तकलीफ़ बतानी है.’

और देखा जाए तो मानसिक अवसाद और बीमारी की पीड़ा, वस्तुतः किसी पहाड़ के नीचे दबे रहने की अनुभूति ही तो थी. अपनी आत्मकथा की भूमिका में स्वदेश स्वीकार करते हैं:

‘मैं सात वर्ष तक एक मनोरोग से ग्रस्त रहा. इस रोग से जुड़ी लोगों की कल्पनाएं डरावनी और प्रतिक्रियाएं हिंसक, नफ़रत भरी होती हैं. परिचित और पराए दोनों डंक मारते हैं, हौसला नहीं देते. समाज में विक्षिप्त आदमी लांछन बन जाता है.’

मैंने मांडू नहीं देखा इसलिए उस पूरी यात्रा को ही नहीं दिखलाती जिसे स्वदेश ने व्यक्ति के स्तर पर जिया था, बल्कि यह यात्रा उस पूरे समाज पर भी एक मर्मांतक टिप्पणी है, जो सामान्य और असामान्य के बीच गहरी खाई खींच देता है- मनोरोग को एक अभिशाप की तरह देखता है.

बेटी पारुल उस कॉलेज में नहीं पढ़ना चाहती थी जहां वह कभी खुद पढ़ाया करते थे और कारण बस यही कि साथी प्रोफेसर रोक-रोककर उनका हाल-चाल पूछा करते थे और अंततः बस यह टिप्पणी कर सब कुछ झुठला देते कि ‘अरे कुछ नहीं हुआ है प्रोफेसर दीपक को, ऐश कर रहे हैं, ऐश. सारा दिन बिस्तरे पर और हाथ में किताब. ही एज ए लक्की मैन’.

ऐसे अनकानेक प्रसंग ‘मांडू..’ को सामाजिक मनोविज्ञान की रचना बना देते हैं, जहां व्यक्ति समाज में रह कर भी दिन-ब-दिन अकेला पड़ता जाता है, बकौल स्वदेश ‘एक बहुत बड़े विस्तार में मैं निपट अकेला’. पर एक दूसरे स्तर पर यह रचना उन परिवारों के भी आंतरिक संघर्ष और पीड़ा की कहानी है जिन्हें अपने नितांत क़रीबी को मानसिक कष्ट में देखते हुए भोगना पड़ता है.

आगे चल कर, स्वदेश के बेटे, सुकान्त दीपक अपने संस्मरण, ‘Papa, Elsewhere’ (A Book of Light) [जेरी पिन्टो द्वारा संपादित संकलन] में इस संघर्ष, रोज़मर्रा के जीवन की चुनौतियों और देखभाल करने वालों की मानसिकता को रेखांकित करते हैं.

मैंने मांडू… हिन्दी में अपनी तरह की एक विशिष्ट रचना अपने शिल्प की दृष्टि से भी मानी जाती है. गिरिधर राठी ने, जो उन दिनों साहित्य अकादमी से संबद्ध थे, स्वदेश को उनकी आत्मकथा की शैली के संबंध में भी राह दिखलायी थी ‘शैली, स्टाइल को भूल जाएं. मन करे तो कविता में  लिखें, नाटक के संवाद में लिखें- A fractured prose for a fractured autobiography.’

स्वदेश जो अपनी आत्मकथा लिखने का साहस नहीं कर पा रहे थे, अंततः अपने अनुभवों को याद करने के क्रम में यह निर्णय देते हैं कि स्मृतियां रेत में सूख जाती हैं, मेरा ऐसा सोचना गलत था, स्मृतियों का निवास आत्मा में है, इसलिए अमर.’

रचना में भी कभी लेखक अतीत में होता है, तो कभी भविष्य में, तो कभी त्रासद वर्तमान साथ-साथ चलता रहता है. जिस प्रकार स्ट्रीम ऑफ कॉनशियसनस शैली में किसी प्रकार की तारतम्यता न रह कर चेतना के प्रवाह के सहारे ही कथावस्तु को बुना जाता है, ठीक उसी प्रकार ‘मांडू….’ में भी अवचेतन और चेतन साथ-साथ चलते हैं. स्वप्न के भीतर स्वप्न है, कथा के भीतर ही कई कथाएं और समय के अंतराल एक दूसरे में विलय हो गए हैं, अतीत और वर्तमान की परिभाषाएं गड्डमड्ड हो गईं-सी.

इस रोग से ठीक होने के बाद स्वदेश ने ‘सबसे उदास कविता’ नाटक लिखा, निर्मल वर्मा के प्रोत्साहन से, जिन्होंने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि ‘भूल जाने होते हैं पहले लेखक को निजी दुख, तभी जी पाएगा, लिख पाएगा पात्रों के दुख, जिस दिन पकड़ लेंगे पात्र आपका हाथ, लिखी जाएगी आप से किताब.’

और जब नाटक लिखने के बाद समर्पण का प्रश्न आया तो स्वदेश को नाम चुनने में कोई दिक्कत नहीं आई. आठ साल के रचनात्मक सूखे के बाद, जिसके विश्वास पर फिर से स्वदेश ने लिखना शुरू किया था, उन्हीं निर्मल वर्मा को, यह जानते हुए भी कि वह राजनीतिक हिंसा के विरुद्ध हैं, सशस्त्र क्रांति का यह नाटक समर्पित किया गया.

‘मैंने मांडू नहीं देखा’ स्वदेश का स्वयं का भोगा हुआ त्रासद अतीत था जिसकी छाया से उनका वर्तमान कभी भी मुक्त नहीं हो सका, क्योंकि चिकित्सकों ने भी इसे पुष्ट कर दिया था और स्वयं भोक्ता मन, अर्थात रचनाकार भी इस वास्तविकता से वाकिफ़ था. स्वदेश आत्मकथा में लिखते हैं- ‘मेरे रोग का साइकिल चार-पांच साल का है. अगेन आई विल टेक द जंप, बट दिस टाइम आई विल टेक फाइनल जंप.’

और अपने विषय में इस प्रकार की भविष्यवाणी करने वाला लेखक वस्तुतः ही बीमारी के उन स्याह सात वर्षों को जीने के बाद अंततः अपनी रचनात्मक ऊर्जा से अपनी आत्मकथा लिखने के बाद एक सुबह अज्ञातवास पर निकल गया- कभी न वापस लौटने के लिए. सुकान्त दीपक लिखते हैं:

‘जून 2006 में मां ने फोन किया, ‘स्वदेश कल घूमने बाहर गए और अभी तक वापस नहीं आए हैं’. हमने एक और दिन इंतज़ार करने का फैसला किया. वह नहीं लौटे. कोई चिठ्ठी नहीं थी. उनकी घड़ी, बटुआ और टॉर्च का जोड़ा, जो वह हमेशा अपने पास रखते थे, उनके कमरे में था.’

और आज भी स्वदेश लापता ही हैं. हां, उनके मृत्यु की अटकलें लगाई जाती हैं, पर यकीन से कुछ नहीं कहा जाता. प्रसिद्ध लेखक और पत्रकार निरुपमा दत्त, जो स्वदेश की मित्र भी थीं, रंग-निर्देशक अरविंद गौड़ के संदर्भ में बतलाती हैं कि कैसे अरविंद बार-बार स्वदेश के नाटकों का मंचन सिर्फ इसी उम्मीद में करते रहते हैं कि क्या पता दर्शक दीर्घा में सबसे पीछे बैठे हुए स्वदेश उन्हें कहीं नजर ही आ जाएं.

जाने-अनजाने स्वदेश को खोजने की कोशिशों में कई लोग लगे हुए हैं, पर रचनाकार स्वदेश को तो उनकी रचनाओं में ढूंढा जा ही सकता है. इसलिए आज उनके जन्मदिन पर एक बार फिर उन्हें खोजा जाए, वह भी वाया मांडू.

(अदिति भारद्वाज दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं.)