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तूतुकुडी फायरिंग: जांच समिति ने कहा- पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर अकारण गोली चलाई

2018 में तमिलनाडु के तूतुकुडी में स्टरलाइट विरोधी प्रदर्शन में भाग लेने वाले नागरिकों पर पुलिस फायरिंग की जांच के लिए बने जस्टिस अरुणा जगदीशन कमीशन ऑफ इंक्वायरी ने प्रदर्शनकारियों पर ‘बिना किसी कारण के अत्यधिक घातक बलप्रयोग’ के लिए शीर्ष पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई की सिफ़ारिश की है.

(फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: 2018 में तमिलनाडु के तूतुकुडी में स्टरलाइट विरोधी प्रदर्शन में भाग लेने वाले नागरिकों पर पुलिस फायरिंग की जांच को लेकर गठित जस्टिस अरुणा जगदीशन कमीशन ऑफ इंक्वायरी ने कहा कि प्रदर्शनकारियों पर पुलिस द्वारा ‘अत्यधिक घातक बलप्रयोग’ ‘अकारण’ था.

फ्रंटलाइन की रिपोर्ट के अनुसार, आयोग ने कहा कि इन विरोध प्रदर्शनों, जिसमें 13 लोगों की जान चली गई और कई घायल हो गए, के दौरान वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और जिला कलेक्टर के बीच ‘समन्वय की कमी’ थी, जिसके परिणामस्वरूप हिंसा हुई और नागरिकों की जान चली गई.

पैनल की प्रमुख और मद्रास हाईकोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस जगदीशन ने तत्कालीन अखिल भारतीय अन्नाद्रविड़ मुनेत्र कषगम (एआईएडीएमके) सरकार के दावों कि पुलिस को भीड़ की हिंसा को काबू करने के लिए गोलियां चलानी पड़ीं, को खारिज करते हुए कहा, ‘यह दिखाने के लिए कोई ऐसी सामग्री नहीं है कि जो यह दिखाए कि केवल प्रदर्शनकारियों की एक उन्मादी भीड़ से निपटने के लिए फायरिंग की गई थी.’

आयोग ने सिफारिश की है कि राज्य सरकार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ उनकी चूकों के लिए बिना किसी पूर्वाग्रह के आपराधिक कार्रवाई शुरू करे, क्योंकि वे ‘निश्चित रूप से अपनी सीमा के परे गए हैं.’

उल्लेखनीय है कि 2018 में पर्यावरणीय कारणों का हवाला देते हुए स्थानीय नागरिक वेदांता समूह के स्टरलाइट कॉपर प्लांट को बंद करने के लिए 99 दिनों से प्रदर्शन कर रहे थे जब 22 मई को प्रदर्शन हिंसक होगया, जिसके बाद हुई पुलिस फायरिंग में 13 नागरिकों की मौत हो गई. घटना के बाद जिले में इंटरनेट भी बंद कर दिया गया था, जो उस समय तमिलनाडु में पहली बार हुआ था.

जांच आयोग की रिपोर्ट 18 मई 2022 को मुख्यमंत्री एमके स्टालिन को भेजी गई है और इसे नियमानुसार छह महीने के भीतर विधानसभा के समक्ष प्रस्तुत करना होगा.

2021 विधानसभा चुनाव से पहले स्टालिन की पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) ने सत्ता में आने पर लोगों की जान जाने और हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का आश्वासन दिया. स्टालिन सरकार ने इस साल 28 मई को संयंत्र द्वारा मानदंडों के उल्लंघन का हवाला देते हुए वन और पर्यावरण विभाग द्वारा जारी एक आदेश के माध्यम से संयंत्र को बंद कर दिया था.

आयोग की रिपोर्ट ने हिंसा के लिए कई शीर्ष पुलिस अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया, जिनमें तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक (दक्षिण क्षेत्र) शैलेश कुमार यादव (अब एडीजीपी, पुलिस कल्याण), पुलिस उप महानिरीक्षक (तिरुनेलवेली रेंज) कपिल कुमार सी. शरतकर (अब अतिरिक्त पुलिस आयुक्त, चेन्नई शहर); पुलिस अधीक्षक (तूतुकुडी) पी. महेंद्रन (अब उपायुक्त (प्रशासन), चेन्नई); और डिप्टी एसपी (तूतुकुडी) लिंगथिरुमरन के साथ तीन इंस्पेक्टर, दो सब-इंस्पेक्टर, एक हेड कॉन्स्टेबल और सात कॉन्स्टेबल शामिल हैं.

पांच भागों में 3,000 पन्नों की इस विस्तृत रिपोर्ट में जांच आयोग ने पुलिस पर ‘भागते हुए प्रदर्शनकारियों’ पर गोली चलने का आरोप लगाया है.

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘यहां पुलिस द्वारा उनकी छिपी हुई जगहों से उन प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई गई जो उनसे बहुत दूर थे.’ रिपोर्ट आगे कहती है कि प्रदर्शनकारियों को पता भी नहीं था कि गोली कहां, किस दिशा से आ रही हैं, जिसका परिणाम ‘अराजकता, बर्बादी और मौत’ के तौर पर निकला.

आयोग ने विशेष रूप से तत्कालीन जिला कलेक्टर एन. वेंकटेश का नाम लिया है, जो वर्तमान में हैदराबाद में राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड में कार्यरत हैं. रिपोर्ट ने उन्हें ‘जिम्मेदारी से बचने, घोर लापरवाही और गलत फैसलों’ के लिए उत्तरदायी बताया है.

वेंकटेश के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश करते हुए जांच समिति ने कहा कि वह 22 मई को तूतुकुडी में जिला मुख्यालय में रहने के बजाय लगभग 100 किलोमीटर दूर कोविलपट्टी में थे, जबकि शहर ‘घेराबंदी’ में था.

बैलिस्टिक रिपोर्ट के विश्लेषण के आधार पर आयोग ने निष्कर्ष  दिया है कि ‘गोली लंबी दूरी (के हथियारों) से चलाई गई थी, न कि छोटी दूरी के. बाद में मृतकों की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और घायल व्यक्तियों के केस स्टडी ने भी इस बात की पुष्टि की थी.

रिपोर्ट के अनुसार, वहां तैनात पुलिसकर्मियों ने पुलिस के स्थायी आदेशों, या ऐसी स्थितियों के लिए अनिवार्य ‘डूज़ एंड डोंट्स’ (Dos and Don’ts) का पालन नहीं किया. आयोग ने कहा, ‘पीएसओ द्वारा अनिवार्य रूप से कोई चेतावनी नहीं दी गई , आंसू गैस या वॉटर कैनन (पानी की बौछार) का उपयोग, लाठीचार्ज, या हवा में गोली चलाकर चेतावनी देने जैसी कोई कार्रवाई नहीं की गई थी.’ रिपोर्ट यह भी कहती है कि पुलिसकर्मियों को जान-माल का नुकसान पहुंचने का कोई खतरा नहीं था.

समिति ने यह भी कहा कि सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए कमर और घुटनों के नीचे निशाना नहीं लगाया, बल्कि शहर के विभिन्न स्थानों पर एकत्रित लोगों पर ‘रैंडम शॉट’ यानी अचानक गोलियां दागीं. आयोग ने ‘पुलिस के न्यायेतर कारनामों’ के उदाहरण के लिए ‘पक्के शूटर’ के तौर पर विशेष रूप से एक पुलिस कॉन्स्टेबल सुदलाईकन्नू का नाम लिया है.