भारत

तीस्ता सीतलवाड़ की ज़मानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को नोटिस भेजा

अहमदाबाद पुलिस की क्राइम ब्रांच में दर्ज हुई एफआईआर में सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ पर आरोप है कि उन्होंने 2002 के गुजरात दंगों को लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ-साथ अन्य मंत्रियों, अफसरों और राज्य सरकार को बदनाम करने की साज़िश रची थी. बीते 30 जुलाई को हाईकोर्ट उन्हें ज़मानत देने से इनकार कर चुका है.

सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़. (फोटो: तीस्ता सीतलवाड़ फेसबुक)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ की जमानत याचिका पर सोमवार को गुजरात सरकार से जवाब मांगा और मामले पर सुनवाई के लिए 25 अगस्त की तारीख तय की है.

सीतलवाड़ को 2002 के गुजरात दंगों के मामलों में ‘निर्दोष लोगोंको फंसाने’ के लिए कथित तौर पर सबूत गढ़ने के लिए जून में गिरफ्तार किया गया था.

जस्टिस यूयू ललित की अध्यक्षता वाली पीठ ने सीतलवाड़ की याचिका पर राज्य को नोटिस जारी किया.

द हिंदू के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ सीतलवाड़ की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अधिवक्ता अपर्णा भट्ट द्वारा जमानत याचिका पर तत्काल सुनवाई और फैसले के लिए किए गए अनुरोध पर सहमत हो गई.

सुनवाई की शुरुआत में ही जस्टिस ललित ने सिब्बल से पूछा कि कहीं उन्हें इस पर आपत्ति तो नहीं कि वह (जस्टिस ललित) पीठ का हिस्सा हैं क्योंकि एक वकील के तौर पर वे सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर मामले में कुछ आरोपियों की तरफ से पेश हुए थे.

इस पर सिब्बल ने जवाब दिया, ‘जहां तक हमारा सवाल है, हमें कोई समस्या नहीं है.’ इस तरह पीठ ने सिब्बल की स्वीकृति लेकर मामले की सुनवाई शुरू की.

सिब्बल ने मामले को लेकर तर्क पेश किया कि अहमदाबाद में दर्ज एफआईआर, जिसके आधार पर सीतलवाड़ को गिरफ्तार किया गया था, में जकिया जाफरी मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए फैसले में की गई टिप्पणियों का दोहराव था.

उन्होंने कहा, ‘याचिकाकर्ता के खिलाफ और कुछ भी आरोप नहीं लगाया गया है. फिर भी, उन्हें हिरासत में ले लिया गया.’

संक्षिप्त सुनवाई के बाद अदालत ने कहा कि वह तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करते हुए मामले पर त्वरित और बिना देरी किए विचार करेगी. मामले की अगली सुनवाई 25 अगस्त को होगी.

इससे पहले, गुजरात हाईकोर्ट ने याचिका पर तीन अगस्त को राज्य सरकार को नोटिस जारी किया था और मामले पर सुनवाई के लिए 19 सितंबर की तारीख तय की थी.

वहीं, 30 जुलाई को अहमदाबाद में एक सत्र अदालत ने मामले में सीतलवाड़ तथा पूर्व पुलिस महानिदेशक आरबी श्रीकुमार की जमानत याचिकाएं खारिज करते हुए कहा था कि उनकी रिहाई से गलत काम करने वाले लोगों को संदेश जाएगा कि कोई भी आरोप लगा सकता है और सजा से बच सकता है.

अदालत ने जमानत याचिका खारिज करते हुए साथ ही कहा था कि आरोपियों ने साजिश रचकर राज्य को बदनाम किया है.

गौरतलब है कि मामले की जांच के लिए गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) ने अपने हलफनामे में आरोप लगाया था कि सीतलवाड़ और श्रीकुमार गुजरात में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार को अस्थिर करने के लिए कांग्रेस के दिवंगत नेता अहमद पटेल के इशारे पर की गई एक बड़ी साजिश का हिस्सा थे.

वहीं, मामले में तीसरे आरोपी पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट ने जमानत के लिए अर्जी नहीं दी है. भट्ट को जब इस मामले में गिरफ्तार किया गया था, तब वह एक अन्य आपराधिक मामले में पहले ही जेल में थे.

गौरतलब है कि सीतलवाड़, श्रीकुमार और भट्ट के खिलाफ एफआईआर सुप्रीम कोर्ट द्वारा बीते 24 जून को गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य को 2002 के दंगा मामले में विशेष जांच दल (एसआईटी) द्वारा दी गई क्लीनचिट को चुनौती देने वाली जकिया जाफरी की याचिका को खारिज किए जाने के एक दिन बाद 25 जून को दर्ज हुई थी.

एफआईआर में सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के एक हिस्से का हवाला दिया गया था, जिसमें शीर्ष अदालत ने कहा था, ‘हमें यह प्रतीत होता है कि गुजरात राज्य के असंतुष्ट अधिकारियों के साथ-साथ अन्य लोगों का एक संयुक्त प्रयास खुलासे करके सनसनी पैदा करना था, जो उनके अपने ज्ञान के लिए झूठे थे. वास्तव में, प्रक्रिया के इस तरह के दुरुपयोग में शामिल सभी लोगों को कटघरे में खड़ा होना चाहिए और कानून के अनुसार आगे बढ़ना चाहिए.’

परिणामस्वरूप, एफआईआर में तीनों पर झूठे सबूत गढ़कर कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग करने की साजिश रचने का आरोप लगाया गया, ताकि कई लोगों को ऐसे अपराध में फंसाया जा सके जो मौत की सजा के साथ दंडनीय हो.

सीतलवाड़, श्रीकुमार और भट्ट के खिलाफ दर्ज एफआईआर में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के विभिन्न प्रावधानों धारा 468 (धोखाधड़ी के उद्देश्य से जालसाजी), 471 (जाली दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के रूप में उपयोग करना), 120बी (आपराधिक साजिश), 194 (गंभीर अपराध का दोष सिद्ध करने के इरादे से झूठे सबूत देना या गढ़ना), 211 (घायल करने के लिए किए गए अपराध का झूठा आरोप) और 218 (लोक सेवक को गलत रिकॉर्ड देना या अपराध की सजा से व्यक्ति या संपत्ति को जब्त होने से बचाना) का जिक्र है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)