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नगा शांति वार्ता: केंद्र सरकार के साथ एनएससीएन-आईएम फिर से वार्ता शुरू करेगा

केंद्र सरकार और नगा संगठनों की अगुवाई कर रहे नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (इसाक-मुइवा) के बीच शांति वार्ता मई से रुकी हुई है. एनएससीएन-आईएम ने कहा है कि वह नगा बहुल क्षेत्रों के एकीकरण और एक अलग झंडे की अपनी मांग पर कायम है और इन पर कोई समझौता नहीं हो सकता.

नई दिल्ली में शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने के दौरान एनएससीएन (आईएम) के महासचिव टी. मुइवाह के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फाइल फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: विद्रोही नगा समूह नेशनलिस्ट सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम-इसाक मुइवा (एनएससीएन-आईएम) नगा मुद्दे का स्थायी समाधान तलाशने के वास्ते बुधवार को यहां केंद्र के साथ शांति वार्ता फिर से शुरू करेगा.

सरकार के साथ बातचीत शुरू करने से एक दिन पहले मंगलवार को एनएससीएन-आईएम ने कहा कि वह नगा बहुल क्षेत्रों के एकीकरण और एक अलग झंडे की अपनी मांग पर कायम है, तथा इन पर कोई समझौता नहीं हो सकता.

केंद्र और एनएससीएन-आईएम के बीच बातचीत मई से रुकी हुई है.

एनएससीएन-आईएम ने अपने मुखपत्र ‘नगालिम वॉइस’ में एक संपादकीय में कहा कि यह एक ‘विडंबना’ है कि अपनी उपलब्धियों का प्रचार पसंद करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके नगा संबंधी मुद्दे को तार्किक निष्कर्ष पर ले जाने की उम्मीद है, लेकिन भारत-नगा वार्ता फ्रेमवर्क एग्रीमेंट (एफए) पर गतिरोध कायम है.

संपादकीय में कहा गया कि सात साल पहले जब प्रधानमंत्री मोदी ने तीन अगस्त 2015 को अपने आवास पर एफए हस्ताक्षर समारोह का आयोजन किया था, तो उनके भाषण ने एक उम्मीद जगाई थी.

प्रधानमंत्री ने इस बात का बड़े गर्व के साथ ऐलान किया था कि उन्होंने दक्षिण पूर्व एशिया में सबसे लंबे समय से चली आ रही उग्रवाद की समस्या का हल निकाल लिया है.

इसके अलावा, इस समारोह का पूरी दुनिया में सीधा प्रसारण किया गया, ताकि नगा मुद्दा सुलझाने में उनकी उपलब्धि को सभी तक पहुंचाया जा सके.

संपादकीय में कहा गया, ‘मोदी नगा मुद्दे से पीछे नहीं हट सकते, लेकिन उन्हें राजनीतिक समझ से एक बार फिर समझौते की रूपरेखा पर गौर करना होगा.’

संपादकीय में कहा गया कि एफए लाने का श्रेय तो उन्होंने ले लिया है. अब नगा मुद्दे को सुलझाने के लिए आगे की कार्रवाई भी करें.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, इसमें कहा गया है कि एफए पर एनएससीएन-आईएम के रुख को बार-बार स्पष्ट रूप से बताया गया है. नेशनल असेंबली (नगा) के 31 मई 2022 के फैसले और नगालैंड के एनएससीएन के नगा राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं द्वारा 26 अगस्त 2022 को स्वीकार किए गए औपचारिक घोषणा-पत्र (प्रस्ताव) ‘एक व्यक्ति, एक राष्ट्र’ पर जोर देने और एफए के पक्ष में खड़े नजर आते हैं.

इसमें कहा गया है, ‘एक व्यक्ति, एक राष्ट्र’ का एकीकरण सिद्धांत ईश्वर प्रदत्त नगा राष्ट्रीय ध्वज का प्रतीक है, नगा राजनीतिक समाधान के नाम पर इससे समझौता नहीं हो सकता.’

नगालैंड के पड़ोसी राज्यों – मणिपुर, असम और अरुणाचल प्रदेश- ने अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले नगा बहुल इलाकों के एकीकरण के विचार का कड़ा विरोध किया है.

गौरतलब है कि उत्तर पूर्व के सभी उग्रवादी संगठनों का अगुवा माने जाने वाला एनएससीएन-आईएम अनाधिकारिक तौर पर सरकार से साल 1994 से शांति प्रक्रिया को लेकर बात कर रहा है. इन संगठनों का दावा है कि नगा कभी भारत का हिस्सा नहीं थे और अपनी संप्रभुता को लेकर उन्होंने कई दशकों तक हिंसक आंदोलन चलाए हैं.

सरकार और संगठन के बीच औपचारिक वार्ता वर्ष 1997 से शुरू हुई. नई दिल्ली और नगालैंड में बातचीत शुरू होने से पहले दुनिया के अलग-अलग देशों में दोनों के बीच बैठकें हुई थीं.

18 साल चली 80 दौर की बातचीत के बाद अगस्त 2015 में भारत सरकार ने एनएससीएन-आईएम के साथ अंतिम समाधान की तलाश के लिए रूपरेखा समझौते (फ्रेमवर्क एग्रीमेंट) पर हस्ताक्षर किए.

एनएससीएन-आईएम के महासचिव थुलिंगलेंग मुईवाह और तत्कालीन वार्ताकार आरएन रवि ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में तीन अगस्त, 2015 को इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.

हालांकि, संगठन के अलग झंडे, संविधान और ग्रेटर नगालिम की अपनी मांग पर अड़े होने की वजह से वार्ता किसी नतीजे पर नहीं पहुंची है. संगठन का कहना है कि सरकार ने एनएससीएन-आईएम की अलग झंडे और संविधान की मांग को माना था लेकिन आरएन रवि ने इसे खारिज कर दिया था.

इसके अलावा, एनएससीएन-आईएम आस-पास के राज्यों असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश के नगा-बहुल क्षेत्रों के एकीकरण के माध्यम से एक ‘ग्रेटर नगालिम‘ (नगालिम) के निर्माण पर जोर दे रहा है.

हाल ही में एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत सरकार कथित तौर पर भारतीय संविधान के भीतर नगा संविधान ‘येहज़ाबो’ को शामिल करने के लिए तैयार हो गई है.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि सरकार कथित तौर पर नगाओं के लिए उनके नागरिक और सांस्कृतिक ध्वज के लिए भी सहमत हो गई है, हालांकि इसे किसी भी सरकारी समारोह में इस्तेमाल नहीं किया जाएगा.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)