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भारत निर्मित कफ सीरप पीने से गांबिया में 66 बच्चों की मौत, डब्ल्यूएचओ की चेतावनी के बाद जांच शुरू

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बताया कि हरियाणा की मेडन फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड द्वारा बनाई गईं खांसी की चार दवाओं में डायथिलिन ग्लाइकॉल और एथिलीन ग्लाइकॉल नामक पदार्थ पाए हैं, जो मनुष्यों के लिए ज़हरीले माने जाते हैं.

प्रतीकात्मक तस्वीर. (फोटो: Pixabay)

नई दिल्ली: हरियाणा की एक फर्म द्वारा बनाई गईं चार दवाओं के कारण गांबिया में 66 बच्चों की मौत हो गई.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने यह जानकारी देते हुए 5 अक्टूबर को घोषणा की कि मेडन फार्मास्युटिकल द्वारा बनाए गए कफ सीरप (खांसी की पीने वाली दवा) में डायथिलिन ग्लाइकॉल और एथिलीन ग्लाइकॉल थे, जो मनुष्यों के लिए जहरीले होते हैं.

डब्ल्यूएचओ ने कंपनी की उन चारों दवाओं के खिलाफ अलर्ट जारी किया है.

डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक  ट्रेडोस एडहेनॉम घेब्रेयेसस ने बुधवार को संवाददाताओं से कहा, ‘ये चार दवाएं भारत की कंपनी मेडन फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड द्वारा बनाए गए सर्दी एवं खांसी के सीरप हैं. डब्ल्यूएचओ भारत में कंपनी एवं नियामक प्राधिकारियों को लेकर आगे जांच कर रहा है.’

उन्होंने कहा कि इन दवाओं के कारण बच्चों की मौत होने से उनके परिवारों को हुई पीड़ा का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता.

डब्ल्यूएचओ ने बताया कि ये चार उत्पाद प्रोमेथाजिन ओरल सॉल्यूशन, कोफेक्समालिन बेबी कफ सिरप, मेकॉफ बेबी कफ सिरप और मैग्रिप एन कोल्ड सिरप हैं. इन उत्पादों की निर्माता कंपनी हरियाणा में स्थित मेडन फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड है और उक्त निर्माता ने इन उत्पादों की सुरक्षा और गुणवत्ता पर डब्ल्यूएचओ को अभी तक गारंटी नहीं दी है.

(फोटो साभार: WHO)

डब्ल्यूएचओ प्रमुख ने कहा कि ये उत्पाद अब तक केवल गांबिया में पाए गए हैं, लेकिन उन्हें अन्य देशों में भी संभवत: वितरित किया गया है. डब्ल्यूएचओ ने परामर्श दिया कि सभी देश मरीजों को और नुकसान पहुंचने से बचाने के लिए इन उत्पादों की बिक्री पर रोक लगाएं.

‘डब्ल्यूएचओ मेडिकल प्रोडक्ट अलर्ट’ उन चार ‘घटिया उत्पादों’ के लिए जारी किया गया है, जिन्हें सितंबर 2022 में गांबिया में चिह्नित किया गया और डब्ल्यूएचओ को इसकी जानकारी दी गई.

डब्ल्यूएचओ ने कहा कि घटिया चिकित्सकीय उत्पाद ऐसे उत्पाद हैं, जो अपने गुणवत्ता मानकों या विशिष्टताओं को पूरा नहीं करते.

चारों में से प्रत्येक दवा के नमूनों का प्रयोगशाला विश्लेषण पुष्टि करता है कि उनमें डायथिलीन ग्लाईकॉल और एथिलीन ग्लाईकॉल अस्वीकार्य मात्रा में मौजूद हैं.

डब्ल्यूएचओ ने उत्पादों से जुड़े जोखिमों को रेखांकित करते हुए कहा कि डायथिलीन ग्लाईकॉल और एथिलीन ग्लाईकॉल मनुष्यों के लिए घातक साबित हो सकते हैं.

विश्व स्वास्थ्य निकाय ने कहा कि डायथिलीन ग्लाईकॉल और एथिलीन ग्लाईकॉल से पेट दर्द, उल्टी, दस्त, मूत्र त्यागने में दिक्कत, सिरदर्द, मानसिक स्थिति में बदलाव और गुर्दे को गंभीर नुकसान हो सकता है, जिससे मरीज की मौत भी हो सकती है.

उसने कहा कि इन उत्पादों को तब तक असुरक्षित माना जाना चाहिए, जब तक संबंधित राष्ट्रीय नियामक प्राधिकरणों द्वारा उनका विश्लेषण नहीं किया जाता.

यह पहला उदाहरण नहीं था कि भारतीय कंपनी द्वारा बनाए गए किसी कफ सीरप के कारण बच्चे मर रहे हैं. इस साल के शुरुआत में डायथिलीन ग्लाईकॉल के कारण हिमाचल प्रदेश में 14 बच्चों की मौत हो गई थी. वह कफ सीरप एक अन्य भारतीय कंपनी द्वारा बनाया गया था.

मिंट के मुताबिक, वह विशेष कफ सीरप 19 बार गुणवत्ता परीक्षण में विफल रहा, फिर भी बाजार में तब तक उपलब्ध रहा जब तक कि इससे 14 बच्चों की मौत नहीं हो गई.

मौतों के बाद भी, कंपनी के खिलाफ सिर्फ यह कार्रवाई हुई कि उसका सीरप बनाने का लाइसेंस रद्द कर दिया.

डब्ल्यूएचओ के आगाह करने के बाद सीडीएससीओ ने जांच शुरू की

डब्ल्यूएचओ द्वारा भारतीय दवा कंपनी की चार दवाइयों को लेकर आगाह किए जाने के मद्देनजर केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) ने मामले की जांच शुरू कर दी है. आधिकारिक सूत्रों ने यह जानकारी दी.

आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र की स्वास्थ्य एजेंसी ने अभी तक सीडीएससीओ के साथ उत्पादों का ‘लेबल’ और विवरण साझा नहीं किया है, जिससे पता लगाया जा सके कि उनका निर्माण कहां हुआ.

उन्होंने बताया कि हालांकि उपलब्ध जानकारी के आधार पर सीडीएससीओ ने हरियाणा में नियामक अधिकारियों के साथ मिलकर मामले की जांच तत्काल शुरू कर दी है.

एक आधिकारिक सूत्र ने कहा, ‘सभी जरूरी कदम उठाए जाएंगे. एक मजबूत नियामक प्राधिकरण के तौर पर डब्ल्यूएचओ से अनुरोध किया गया है कि वह मौत के मामलों से जुड़े कथित चिकित्सा उत्पादों के संबंध में एक रिपोर्ट और उत्पादों के लेबल/तस्वीरें आदि जल्द से जल्द सीडीएससीओ के साथ साझा करे.’

सूत्रों के अनुसार, डब्ल्यूएचओ ने 29 सितंबर को भारत के औषधि महानियंत्रक को सूचित किया था कि वह गांबिया को तकनीकी सहायता प्रदान कर रहा है.

सीडीएससीओ ने कहा कि उसने राज्य नियामक प्राधिकरण के समक्ष मामला उठाया और सूचना मिलने के एक-डेढ़ घंटे के भीतर डब्ल्यूएचओ को जवाब दिया.

सूत्रों ने बताया कि इसके अलावा, हरियाणा राज्य औषधि नियंत्रक के सहयोग से मामले की विस्तृत जांच शुरू की गई है.

उन्होंने कहा, ‘प्रारंभिक जांच में पता चला है कि उक्त उत्पादों के निर्माण के लिए हरियाणा के सोनीपत की ‘मेडन फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड’ कंपनी ने राज्य दवा नियंत्रक से लाइसेंस लिया था और उसके पास इन उत्पादों के विनिर्माण की अनुमति थी. कंपनी ने अभी तक ये उत्पाद केवल गांबिया ही भेजे थे.’

सूत्रों के मुताबिक, दवाओं का आयात करने वाले देश उत्पादों के उपयोग को मंजूरी देने से पहले उनकी गुणवत्ता का पता लगाने के लिए उनकी जांच करते हैं.

उन्होंने बताया कि डब्ल्यूएचओ को मिले जांच के कुछ परिणामों के अनुसार, परीक्षण किए गए 23 नमूनों में से चार में डायथाइलीन ग्लाईकॉल और एथिलीन ग्लाईकॉल के अंश मौजूद थे.

डब्ल्यूएचओ ने भारत से कहा कि वह जल्द ही विश्लेषण संबंधी जानकारी साझा करेगा.

सूत्रों ने कहा, ‘साथ ही डब्ल्यूएचओ द्वारा मौत के कारण की सटीक जानकारी अभी तक प्रदान नहीं की गई है, न ही सीडीएससीओ के साथ उत्पादों के ‘लेबल’ या अन्य विवरण साझा किए गए हैं, जिससे पता चल सके कि उनका निर्माण कहां हुआ और उनका स्रोत क्या है.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)