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सरकार द्वारा मीडिया वन पर प्रतिबंध के कारण न बताने पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए

दिसंबर 2021 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मलयालम समाचार चैनल ‘मीडिया वन’ को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का हवाला देते हुए सुरक्षा मंज़ूरी देने से मना कर दिया था और जनवरी में इसके प्रसारण पर रोक लगाने को कहा था. शीर्ष अदालत ने सरकार से बिना विशेष कारण बताए प्रतिबंध लगाने को लेकर सवाल-जवाब किए हैं.

(फोटो साभार: फेसबुक)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को विशेष कारणों का खुलासा किए बिना ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के नाम पर केरल के एक टीवी चैनल मीडिया वन पर प्रतिबंध लगाने के बारे में सरकार से सवाल-जवाब किए.

द हिंदू के मुताबिक, अदालत ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत हिरासत में लिए गए लोगों को भी उनके कैद होने के कारणों का पता चल जाता है.

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ ने केंद्र की तरफ से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज से कहा, ‘एनएसए के तहत हिरासत के मामले में भी, जहां किसी व्यक्ति को अधिकारियों की संतुष्टि के हिसाब से हिरासत में लिया जाता है, उसमें भी उस बंदी को हिरासत की वजह दी जाती है.’

बेंच ने कहा कि मीडिया वन के मामले में अभी तक आपराधिकता नहीं बताई गई  है. पीठ ने कहा, ‘यहां तक ​​कि एक चार्जशीट में उस सामग्री का खुलासा होता है जिसके आधार पर अपराध दर्ज किया जाता है. इस मामले में तो हम चार्जशीट के चरण में भी नहीं हैं… यहां आप सुरक्षा मंजूरी से इनकार कर रहे हैं.’

ज्ञात हो कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 30 सितंबर, 2011 को माध्यमम ब्रॉडकास्टिंग कंपनी लिमिटेड द्वारा शुरू किए गए मीडिया वन टीवी के लिए प्रसारण की अनुमति दी थी. 10 साल लंबी अनुमति 29 सितंबर, 2021 को समाप्त हो गई थी, इसलिए कंपनी ने पिछले साल मई में अगले 10 साल के लिए इसके नवीनीकरण के लिए आवेदन किया था.

29 दिसंबर 2021 को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का हवाला देते हुए सुरक्षा मंजूरी देने से इनकार कर दिया था. इसके बाद मंत्रालय ने इस साल 5 जनवरी को एक नोटिस जारी कर चैनल को यह बताने के लिए कहा था कि सुरक्षा मंजूरी से इनकार के मद्देनजर नवीनीकरण के लिए उसके आवेदन को खत्म क्यों नहीं किया जाना चाहिए?

इसके बाद मंत्रालय ने बीते 31 जनवरी को समाचार चैनल के प्रसारण पर रोक लगाने का आदेश जारी किया था. मार्च महीने में सुप्रीम कोर्ट ने ‘मीडिया वन’ के प्रसारण पर प्रतिबंध लगाने वाले केंद्र के 31 जनवरी के फैसले पर अगले आदेश तक रोक लगा दी थी.

जस्टिस चंद्रचूड़ ने नटराज से कहा, ‘उन्हें [माध्यमम को] कम से कम यह मालूम होना चाहिए कि यहां राष्ट्रीय सुरक्षा का क्या उल्लंघन हुआ था… आप अपनी जानकारी के स्रोतों की रक्षा कर सकते हैं… लेकिन वह कौन-सी जानकारी थी जिसके कारण आपको सुरक्षा मंजूरी से इनकार करना पड़ा? मान लीजिए, आपको जानकारी मिली थी कि कोई अंतरराष्ट्रीय हवाला लेनदेन में शामिल था या उसके नापाक जुड़ाव थे या फिर इसका स्वामित्व एक शत्रु देश के नागरिकों के हाथों में था … आपको स्वाभाविक तौर पर इसका खुलासा करना होगा…’

अदालत ने कहा कि पिछले 10 वर्षों में किए गए निवेश, उनके कर्मचारियों के भविष्य, बाजार में उनके नाम और निश्चित रूप से बीते एक दशक में उनकी बनाई प्रतिष्ठा को देखते हुए इसके लाइसेंस का नवीनीकरण चैनल के लिए महत्वपूर्ण था.

अदालत ने यह भी जताया कि चैनल को जानने का मौका दिए बिना कोर्ट में सीलबंद लिफाफे में सामग्री दिया जाना भी अनुचित था.

मीडिया संस्थान की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे और अधिवक्ता हैरिस बीरन ने तर्क दिया कि स्वतंत्र भाषण और प्रेस पर प्रतिबंध ‘संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के तहत उचित प्रतिबंध’ के दायरे में आना चाहिए.

दवे ने कहा था कि अदालत को इस तरह के प्रतिबंधों की अनुमति नहीं देनी चाहिए. अन्यथा, कोई भी मीडिया या प्रकाशन सुरक्षित नहीं है. किसी को कभी भी बंद किया जा सकता है.

सरकार का कहना था कि 10 साल की और अवधि के लिए प्रसारण अनुमति के नवीनीकरण के लिए गृह मंत्रालय से सत्यापन और मंजूरी की जरूरत है. इसने कहा था कि एक टीवी चैनल के लिए अनुमति का नवीनीकरण अधिकार का मामला नहीं था.

सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने ने जवाब में कहा था, ‘टीवी चैनल के लिए अनुमति का नवीनीकरण किसी कंपनी के अधिकार का मामला नहीं है और इस तरह की अनुमति केवल अपलिंकिंग और डाउनलिंकिंग दिशानिर्देशों और अन्य प्रासंगिक वैधानिक ढांचे के तहत निर्धारित कुछ पात्रता शर्तों को पूरा करने पर ही दी जाती है.’