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भारत में रहने वाला हर शख़्स ‘हिंदू’, किसी को पूजा के तरीके बदलने की ज़रूरत नहीं: भागवत

छत्तीसगढ़ के सरगुजा ज़िले में स्वयंसेवकों के एक कार्यक्रम में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि सभी भारतीयों का डीएनए एक है. जो भारत को अपनी मातृभूमि मानता है, विविधता में एकता वाली संस्कृति को जीना चाहता है, वह किसी भी तरह पूजा करे, कोई भी भाषा बोले, खानपान, रीति-रिवाज कोई हो, वह​ हिंदू है.

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत. (फोटो: पीटीआई)

अंबिकापुर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने मंगलवार को कहा कि भारत में रहने वाला हर व्यक्ति ‘हिंदू’ है और सभी भारतीयों का डीएनए एक है. उन्होंने कहा कि किसी को भी पूजा करने के तरीके को बदलने की जरूरत नहीं है, क्योंकि सब रास्ते एक ही जगह जाते हैं.

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के मुख्यालय अंबिकापुर में स्वयंसेवकों (संघ के स्वयंसेवकों) के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि विविधता में एकता भारत की सदियों पुरानी विशेषता है. एक मात्र हिंदुत्व नाम का विचार दुनिया में ऐसा है जो सभी को साथ लेने में विश्वास करता है.

आरएसएस के सरसंघचालक ने कहा, ‘हम 1925 से कह रहे हैं कि भारत में रहने वाला हर व्यक्ति हिंदू है. जो भारत को अपनी माता मानता है, मातृभूमि मानता है, जो भारत में विविधता में एकता वाली संस्कृति को जीना चाहता है, उसके लिए प्रयास करता है, वह पूजा किसी भी तरह से करे, भाषा कोई भी बोले, खानपान, रीति-रिवाज कोई भी हो, वह​ हिंदू है.’

उन्होंने कहा कि एकमात्र हिंदुत्व नाम का विचार दुनिया में ऐसा है जो विविधताओं को एकजुट करने में विश्वास करता है.

भागवत ने कहा कि हिंदुत्व ने सब विविधताओं को हजारों वर्षों से भारत की भूमि में एक साथ चलाया है, यह सत्य है और इस सत्य को बोलना है और डंके की चोट पर बोलना है.

उन्होंने कहा कि संघ का काम हिंदुत्व के विचार के अनुसार व्यक्ति और राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण करना और लोगों में एकता को बढ़ावा देना है.

भागवत ने सभी की आस्था का सम्मान करने पर जोर दिया और दोहराया कि सभी भारतीयों का डीएनए एक समान है और उनके पूर्वज एक ही थे.

उन्होंने कहा, ‘विविधता होने के बावजूद हम सभी एक जैसे हैं. हमारे पूर्वज एक ही थे. हर भारतीय जो 40 हजार साल पुराने ‘अखंड भारत’ का हिस्सा हैं, सभी का डीएनए एक है. हमारे पूर्वजों ने यही सिखाया था कि हर किसी को अपनी आस्था और पूजा पद्धति पर कायम रहना चाहिए और दूसरों की आस्था और पूजा पद्धति को बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. सब रास्ते एक जगह पर जाते हैं.’

भागवत ने कहा कि सभी के विश्वास और संस्कारों का सम्मान करें, सबको स्वीकार करें और अपने रास्ते पर चलें. अपनी इच्छा पूरी करे, लेकिन इतना स्वार्थी मत बनें कि दूसरों की भलाई का ध्यान न रहे.

सरसंघचालक ने कहा, ‘हमारी संस्कृति हमें जोड़ती है. हम आपस में कितना भी लड़ लें, संकट के समय हम एक हो जाते हैं. जब देश पर किसी तरह की मुसीबत आती है तो हम साथ मिलकर लड़ते हैं. कोरोना महामारी के दौरान इससे निपटने के लिए पूरा देश एक होकर खड़ा हो गया.’

उन्होंने कहा कि संघ का उद्देश्य लोकप्रियता हासिल करना और अपना प्रभाव बनाना नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य सत्य के मार्ग पर चलते हुए लोगों को जोड़ना और समाज को प्रभावशाली बनाना है. संघ का काम समझना है, तो तुलना करके इसे नहीं समझ सकते हैं, गलतफहमी होने की संभावना होती है. संघ के बारे में पढ़ लिखकर अनुमान भी नहीं लगा सकते हैं.

उन्होंने कहा कि संघ को समझना है तो संघ में आना चाहिए, इससे आप संघ को भीतर से देख सकते हैं, खुद के अनुभव से संघ समझ में आता है.

समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, भागवत ने कहा, ‘संघ को समझने के लिए संघ से जुड़ना सबसे अच्छा तरीका है. शाखा में आकर ही संघ को जाना जा सकता है. संघ की शाखा में आने का कोई शुल्क नहीं है, इसे चखकर ही मिठास जानी जा सकती है.’

उन्होंने कहा, ‘संघ की तुलना नहीं की जा सकती, जैसे आकाश की तुलना नहीं की जा सकती. पढ़-लिखकर भी संघ का अर्थ नहीं लगाया जा सकता.’

उन्होंने कहा कि जुदाई की बात चलती है, लेकिन सबको एक रहना है. सबके अलग-अलग देवी-देवता हैं. ऐसे लोग भी हैं जो किसी भी भगवान को नहीं मानते हैं.  यह तब से चल रहा है जब से वेदों में छोटी सोच वाले लोग आपस में झगड़ते थे. भारत न एक पूजा है, न एक भाषा, जातियां अनेक हैं, फिर भी भारत एक है. राजा बदलते रहे, लेकिन भारत वही रहा.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)