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महाराष्ट्र सरकार ने अर्णब गोस्वामी के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट से याचिका वापस ली

पालघर लिंचिंग और लॉकडाउन के बीच बांद्रा रेलवे स्टेशन के बाहर प्रवासी श्रमिकों की भीड़ जमा होने को लेकर कथित भड़काऊ टिप्पणियों के लिए समाचार चैनल रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्णब गोस्वामी के ख़िलाफ़ दो एफआईआर दर्ज हुई थीं, जिनमें जांच पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी. महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार ने इसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट का रुख़ किया था.

अर्णब गोस्वामी (फोटो साभार: ट्विटर)

नई दिल्ली: महाराष्ट्र सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में अपनी वह याचिका वापस ले ली, जिसमें समाचार चैनल रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्णब गोस्वामी के पक्ष में बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा 2020 में सुनाए गए आदेश को चुनौती दी गई थी.

बता दें कि अर्णब पर कथित भड़काऊ टिप्पणी करने के संबंध में दो एफआईआर दर्ज हुई थीं, जिसकी जांच पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी.

वापस ली गई याचिका सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस हिमा कोहली की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध थी.

राज्य के वकील ने कहा कि बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश एक अंतरिम आदेश था और इसलिए उन्हें याचिका वापस लेने के निर्देश मिले हैं. याचिकाकर्ता को उक्त याचिका वापस लेने की स्वतंत्रता प्रदान कर दी गई.

महाराष्ट्र के पालघर में पीट-पीटकर हत्या (मॉब लिंचिंग) के मामले को कथित तौर पर सांप्रदायिक रंग देने और लॉकडाउन के बीच मुंबई के बांद्रा रेलवे स्टेशन के बाहर प्रवासी श्रमिकों की भीड़ जमा होने के संबंध में कथित उकसावे और भड़काऊ टिप्पणियों के लिए उनके खिलाफ ये एफआईआर दर्ज की गई थीं.

पालघर मामले पर अपने एक डिबेट कार्यक्रम में गोस्वामी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर टिप्पणियां की थीं, जिसके बाद कांग्रेस नेताओं ने देश भर में कई जगह एफआईआर दर्ज करवाई थीं.

एक एफआईआर नागपुर में दर्ज की गई थी, जिसे शीर्ष अदालत के आदेश के बाद मुंबई स्थित एनएम जोशी मार्ग पुलिस थाने में स्थानांतरित कर दिया गया था, जबकि दूसरी एफआईआर पायधोनी पुलिस थाने में दर्ज की गई थी.

हालांकि, बॉम्बे हाईकोर्ट ने यह कहते हुए अर्णब को राहत दे दी थी कि ‘हम सार्वजनिक बहस करते समय एक पत्रकार के सिर पर तलवार नहीं लटका सकते हैं.’

अर्णब पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 153, 153ए, 153बी, 295ए, 298, 500, 504, 505(2), 506, 120बी और 117 के तहत मामला दर्ज किया गया था.

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा था, ‘इसमें (टिप्पणी) मुस्लिम समुदाय या ईसाई समुदाय का कोई उल्लेख नहीं था. यह कहना बहुत मुश्किल होगा कि बहस में दो धार्मिक समुदाय शामिल थे. वास्तव में, मुस्लिम समुदाय या ईसाई समुदाय का कोई संदर्भ नहीं था.’

जजों ने आगे कहा था, ‘हमें याचिकाकर्ता द्वारा ऐसा कोई बयान नहीं मिलता है जिसे मुस्लिम समुदाय या ईसाई समुदाय के खिलाफ माना जा सके.’

30 जून, 2020 के आदेश में हाईकोर्ट ने कहा था कि गोस्वामी ने कांग्रेस और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर निशाना साधते समय कोई ऐसा बयान नहीं दिया था, जो कि विभिन्न धार्मिक समूहों के लोगों के बीच वैमनस्य पैदा करता हो या हिंसा भड़काता हो.

उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार ने गोस्वामी के खिलाफ जांच पर रोक लगाने के हाईकोर्ट के फैसले का विरोध किया था. इस पर शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार की अपील पर गोस्वामी और अन्य लोगों से जवाब मांगा था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)