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ईडब्ल्यूएस आरक्षण: कांग्रेस नेता ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश की समीक्षा के लिए याचिका दायर की

बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ ने शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश और सरकारी नौकरियों में आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) को दिए जाने वाले 10 फीसदी आरक्षण संबंधी संविधान के 103वें संशोधन को बरक़रार रखा था.

(फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: सरकारी संस्थानों में प्रवेश और रोजगार में सामान्य श्रेणी के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) के लिए 2019 में शुरू किए गए 10 फीसदी आरक्षण को बरकरार रखने वाले अपने फैसले की समीक्षा के लिए बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई.

कांग्रेस नेता जया ठाकुर ने शीर्ष अदालत में याचिका दायर करते हुए कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण उनकी जनसंख्या के अनुपात में है, वहीं अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षण अपर्याप्त है, लेकिन सवर्णों के लिए आरक्षण ‘आनुपातिक तौर पर जरूरत से ज्यादा’ है.

बीते 7 नवंबर को शीर्ष अदालत की पांच जजों की संविधान पीठ ने ईडब्ल्यूएस के लिए आरक्षण बरकरार रखा था. पीठ ने 103वें संविधान संशोधन, जिसमें ईडब्ल्यूएस कोटा प्रदान किया गया था, के पक्ष में 3:2 बहुमत से फैसला सुनाया था.

लाइव लॉ के अनुसार, पुनर्विचार की मांग करने वाली याचिका में कहा गया है कि अगड़ी/सवर्ण जाति की आबादी देश की आबादी का केवल 6 फीसदी है, फिर भी सरकारी शिक्षण संस्थानों में 10 फीसदी सीटें और नौकरियां ईडब्ल्यूएस कोटा के चलते ‘अगड़ी जाति के गरीबों’ को प्रदान की जाएंगी.

याचिका में कहा गया है कि संख्या स्पष्ट रूप से दिखाती है कि 10 फीसदी का यह आरक्षण अनुपातहीन है. यह केवल अगड़ी जातियों को प्रदान किया जा रहा है, जो कि भेदभाव के खिलाफ समानता का उल्लंघन है.

मध्य प्रदेश का उदाहरण देते हुए याचिका में तर्क दिया गया है कि हालांकि ओबीसी राज्य की आबादी के 50 फीसदी से अधिक हैं, लेकिन राज्य सेवाओं और शैक्षणिक संस्थाओं में केवल 13 फीसदी पद इन समुदायों के लिए आरक्षित हैं, जबकि एससी और एसटी समुदायों के लिए आरक्षण उनकी आबादी के हिस्से के अनुपात में है.

ठाकुर ने यह भी तर्क दिया है कि क्योंकि ओबीसी, एससी और एसटी ईडब्ल्यूएस आरक्षण का लाभ लेने के हकदार नहीं हैं, इसलिए यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और 16 (अवसर की समानता) का स्पष्ट उल्लंघन है.

समीक्षा की मांग करने वाली याचिका में जजों के बहुमत द्वारा कहे गए कथनों का भी विरोध किया गया है.

लाइव लॉ के मुताबिक, याचिका में कहा गया है कि जस्टिस दिनेश माहेश्वरी ने विपरीत निष्कर्ष दिया कि 103वां संशोधन 50 फीसदी की सीमा का उल्लंघन नहीं कर रहा है, जो कि वास्तव में इंदिरा साहनी मामले में निर्धारित कानूनों का उल्लंघन है, जो जाति आधारित आरक्षण को 50 फीसदी की सीमा पर सीमित रखता है.

याचिका में तर्क प्रस्तुत किया गया है, ‘साथ ही जस्टिस माहेश्वरी का यह निष्कर्ष कि एससी/एसटी/ओबीसी को 103वें संशोधन से बाहर करना समानता का उल्लंघन नहीं करता है, पूरी तरह से समस्याग्रस्त है, क्योंकि इसके लिए मानदंड केवल आर्थिक आधार है.’

याचिका में कहा गया है, ‘जस्टिस (बेला एम.) त्रिवेदी ने 103वें संशोधन को बरकरार रखते हुए कहा कि आरक्षण नीति पर फिर से विचार करना आवश्यक है, जो फैसले में उनके अपने निष्कर्षों के विपरीत है.’

इस बीच, जस्टिस जेबी पारदीवाला के फैसले में कहा गया है कि डॉ. बीआर आंबेडकर आरक्षण पर एक समय सीमा निर्धारित करना चाहते थे, जिसे याचिका में गलत बताया गया है.