केंद्र को ‘समान विवाह संहिता’ लाने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए: केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि आज फैमिली कोर्ट युद्ध का मैदान बन गए हैं, जो तलाक़ की मांग करने वाले पक्षों की पीड़ा बढ़ा रहे हैं. अदालत ने तलाक अधिनियम, 1869 की धारा 10ए के तहत एक वर्ष की अलगाव की न्यूनतम अवधि के निर्धारण को चुनौती देने वाली एक याचिका पर अपने फैसले में टिप्पणी की कि यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है.

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(फोटो साभार: फेसबुक)

केरल हाईकोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि आज फैमिली कोर्ट युद्ध का मैदान बन गए हैं, जो तलाक़ की मांग करने वाले पक्षों की पीड़ा बढ़ा रहे हैं. अदालत ने तलाक अधिनियम, 1869 की धारा 10ए के तहत एक वर्ष की अलगाव की न्यूनतम अवधि के निर्धारण को चुनौती देने वाली एक याचिका पर अपने फैसले में टिप्पणी की कि यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है.

(फोटो साभार: फेसबुक)

तिरुवनंतपुरम: केरल हाईकोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि पति-पत्नी के कल्याण और भलाई के लिए केंद्र सरकार को भारत में समान विवाह संहिता पर गंभीरता से विचार करना चाहिए.

लाइव लॉ की खबर के मुताबिक, जस्टिस ए. मोहम्मद मुस्ताक और जस्टिस शोबा अन्नम्मा एपेन की खंडपीठ ने कहा कि जब बात वैवाहिक संबंधों की आती है तो वर्तमान कानून पक्षकारों को उनके धर्म के आधार पर अलग करता है.

अदालत ने कहा, ‘एक धर्मनिरपेक्ष देश में कानूनी पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण धर्म के बजाय नागरिकों की समान भलाई सुनिश्चित करने पर केंद्रित होना चाहिए और भलाई के समान उपायों की पहचान करने में धर्म का कोई स्थान नहीं है.’

अदालत ने कहा कि तलाक को विनियमित करने के लिए कानून बनाने की विधायिका की क्षमता पर संदेह नहीं किया जा सकता है, ‘गलती के आधार पर तलाक के आधार’ जिसने तलाक को विनियमित किया है, के परिणाम व्यवहारिक अर्थों में कल्याण को बढ़ावा देने के बजाय कठिनाइयों के रूप में सामने निकलकर आए हैं.

अदालत ने आगे कहा कि कल्याणकारी उद्देश्यों का असर पक्षकारों पर भी दिखना चाहिए.

अदालत ने कहा, ‘आज फैमिली कोर्ट युद्ध का एक और मैदान बन गए हैं, जो तलाक की मांग करने वाले पक्षों की पीड़ा को बढ़ा रहे हैं. यह इस कारण से स्पष्ट है कि फैमिली कोर्ट्स एक्ट से पहले अधिनियमित पर्याप्त कानून सामान्य हित या अच्छे को बढ़ावा देने के बजाय प्रतिकूल हितों पर निर्णय लेने के लिए एक मंच पर तैयार किया गया था. समय आ गया है कि पक्षकारों पर लागू होने वाले कानून में एक समान मंच से बदलाव किया जाए.’

न्यायालय ने तलाक अधिनियम, 1869 की धारा 10ए के तहत एक वर्ष की अलगाव की न्यूनतम अवधि के निर्धारण को चुनौती देने वाली एक याचिका पर अपने फैसले में यह टिप्पणी की कि यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है. इसमें आगे कहा गया है कि तलाक पर कानून को विवाद के बजाय पक्षकारों पर ध्यान देना चाहिए.

अदालत ने कहा, ‘वैवाहिक विवादों में कानून को न्यायालय की सहायता से पक्षकारों के मतभेदों का समाधान करने में मदद करनी चाहिए. यदि कोई समाधान संभव नहीं है, तो कानून को न्यायालय को यह तय करने देना चाहिए कि पक्षकारों के लिए बेहतर क्या होगा. तलाक मांगने की प्रक्रिया पक्षकारों के बीच कड़वाहट को बढ़ावा देने वाली नहीं होनी चाहिए.’

केरल हाईकोर्ट ने यह आदेश एक युवा ईसाई दंपति द्वारा दायर याचिका पर दिया, जिसमें तलाक अधिनियम-1869 की धारा 10(ए) के तहत तय की गई अलगाव की न्यूनतम अवधि (एक साल) को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए उसे चुनौती दी गई थी.

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि वह युगल द्वारा दायर तलाक याचिका को दो सप्ताह के भीतर निपटाए तथा संबंधित पक्षों की और उपस्थिति पर जोर दिए बिना उनके तलाक को मंजूर करे.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)