हैदराबाद: उस्मानिया यूनिवर्सिटी में उर्दू विभाग की बदहाली की क्या वजह है?

विभिन्न विषयों के लिए उर्दू को शिक्षा के माध्यम के तौर पर अपनाने के लिए ख्यात हैदराबाद की उस्मानिया यूनिवर्सिटी ने बीते दिनों पीएचडी प्रवेश परीक्षा आयोजित की थी, जिसमें उर्दू को छोड़ दिया गया. जहां इसके लिए एक ओर विभाग में स्थायी शिक्षक न होने की बात कही जा रही है, वहीं ख़बरों में राज्य सरकार की उदासीनता को ज़िम्मेदार बताया जा रहा है.

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(फोटो साभार: osmania.ac.in)

विभिन्न विषयों के लिए उर्दू को शिक्षा के माध्यम के तौर पर अपनाने के लिए ख्यात हैदराबाद की उस्मानिया यूनिवर्सिटी ने बीते दिनों पीएचडी प्रवेश परीक्षा आयोजित की थी, जिसमें उर्दू को छोड़ दिया गया. जहां इसके लिए एक ओर विभाग में स्थायी शिक्षक न होने की बात कही जा रही है, वहीं ख़बरों में राज्य सरकार की उदासीनता को ज़िम्मेदार बताया जा रहा है.

(फोटो साभार: osmania.ac.in)

नई दिल्ली: किसी समय विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, इंजीनियरिंग, चिकित्सा और क़ानून जैसे विषयों की शिक्षा के लिए भी माध्यम के रूप में उर्दू भाषा को अपनाने के लिए विख्यात हैदराबाद की उस्मानिया यूनिवर्सिटी पर इन दिनों गंभीर आरोप लग रहे हैं कि यहां से उर्दू को एक विषय के तौर पर भी खत्म करने की ‘साज़िश’ की जा रही है.

आरोप उस समय लगाए गए, जब शैक्षणिक वर्ष 2022-23 के लिए 01 दिसंबर से 03 दिसंबर 2022 के बीच विश्वविद्यालय ने 47 विषयों की पीएचडी प्रवेश परीक्षा ली. विश्वविद्यालय विज्ञप्ति के अनुसार, इस परीक्षा के लिए 9,776 छात्रों ने पंजीकरण कराया था.

प्रवेश परीक्षा के बाद एक-आध स्थानीय ख़बरों में बताया गया कि उर्दू के लिए प्रवेश परीक्षा नहीं ली गई, साथ ही खुले शब्दों में कहा गया कि राज्य में उर्दू को बढ़ावा दिए जाने के सरकार के दावों के बीच विश्वविद्यालय में उर्दू के ख़िलाफ़ ‘साज़िश’ की जा रही है. ख़बर में बुनियादी दावा यही था कि तमाम विभागों के लिए प्रवेश परीक्षा ली गई और उसमें उर्दू को जगह नहीं दी गई.

इस सिलसिले में स्थानीय उर्दू अख़बार सियासत ने विश्वविद्यालय प्रशासन के हवाले से बताया कि उर्दू विभाग में पीएचडी छात्रों के लिए कोई दिशानिर्देश न होने के कारण प्रवेश परीक्षा में उर्दू को शामिल नहीं किया गया.

रिपोर्ट में राज्य सरकार और विश्वविद्यालय के ‘रवैये’ को निशाना बनाते हुए आशंका व्यक्त की गई कि ये आने वाले कुछ सालों में उर्दू को खत्म करने की साज़िश है. यह भी बताया गया कि सरकार की लापरवाही और उर्दू संस्थानों की चुप्पी की वजह से उर्दू में पीएचडी के अभिलाषी छात्रों को विवश होकर दूसरे विश्वविद्यालयों का रुख़ करना पड़ रहा है.

दरयाफ़्त करने पर हाल ही में रिटायर हुए उर्दू के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर एसए शुकूर ने द वायर  को बताया कि उर्दू ही नहीं हिंदी की भी प्रवेश परीक्षा नहीं ली गई है. विश्वविद्यालय विज्ञप्ति से भी इस बात की तस्दीक़ होती है.

हालांकि, इसकी वजह भी स्पष्ट नहीं है. एक ओर कहा जा रहा है कि इस विभाग में पर्याप्त स्थायी फैकल्टी नहीं है, वहीं विश्वविद्यालय के सूत्रों ने कहा कि विभाग में पहले से ही कई शोधार्थी हैं, इसलिए प्रवेश परीक्षा नहीं हुई.

यूनिवर्सिटी द्वारा जारी पीएचडी परीक्षा के शेड्यूल में उर्दू विषय नहीं है.

बता दें कि इस वक़्त विश्वविद्यालय में उर्दू की कोई परमानेंट फैकल्टी नहीं है. जहां एक तरफ़ पार्ट टाइम स्टाफ/अकेडमिक कंसल्टेंट के भरोसे विभाग को चलाया जा रहा है, वहीं एसए शुकूर के जाने के बाद से ‘यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड सोशल साइंस’ के प्रिंसिपल प्रोफेसर चिंता गणेश (सी. गणेश) के पास उर्दू विभाग की भी अतिरिक्त ज़िम्मेदारी है.

पूर्व विभागाध्यक्ष की मानें तो जब 12-15 सालों से विश्वविद्यालय में कोई बहाली ही नहीं हुई, सारे लोग सेवानिवृत्त हो चुके तो किसी तरह पार्ट टाइम स्टाफ/अकेडमिक कंसल्टेंट द्वारा विभाग को ही चलाया जा सकता है.

वो कहते हैं, ‘परमानेंट फैकल्टी की ग़ैर-मौजूदगी में स्पष्ट है कि यूजीसी के दिशानिर्देश के कारण पीएचडी के लिए कोई निर्देश नहीं दिया जा सकता. नियमित बहालियों के बाद ही उर्दू में पीएचडी हो सकती है.’

ऐसे में सवाल है कि उर्दू के सुनहरी दौर की यादगार उस्मानिया यूनिवर्सिटी में उर्दू की ऐसी हालत क्यों है और क्या सचमुच कोई साज़िश की जा रही है?

प्रो. शुकूर कहते हैं, ‘मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा, लेकिन जैसा कि मैंने आपसे कहा कि ये सिर्फ़ उर्दू के साथ नहीं हुआ, हिंदी के लिए भी प्रवेश परीक्षा नहीं ली गई.’

इस हालत के लिए वो सालों से बहाली न होने को एक बड़ा करण बताते हुए कहते हैं कि राज्य के मुख्यमंत्री की तरफ़ से बहाली को मंज़ूरी दी जा चुकी है, लेकिन अभी ये मामला राज्यपाल के पास है, यहां से स्वीकृति के बाद ही बहाली का रास्ता साफ़ हो पाएगा.

वो ये भी जोड़ते हैं कि सरकार की पॉलिसी समझ से परे है, एक तरफ़ वो निजी संस्थानों को बढ़ावा देती है और दूसरी तरफ़ सरकारी विश्वविद्यालयों पर उसका कोई ध्यान नहीं है. उनका कहना है कि बहाली तो एक तरफ, यहां बजट की भी दिक्क़तें हैं.

एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, ‘पिछले साल विभागाध्यक्ष रहते हुए मैंने विश्वविद्यालय को प्रस्ताव दिया कि जब तक बहाली नहीं होती, यहीं के दूसरे विश्वविद्यालयों के शोध-पर्यवेक्षकों की निगरानी में पीएचडी को जारी रखने की कोशिश की जाए, लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई.’

उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार और विश्वविद्यालय की इस उदासीनता का फ़िलहाल किसी के पास कोई साफ़ जवाब नहीं है. ऐसे में उर्दू विभाग का कार्यभार संभाल रहे प्रोफेसर सी. गणेश भी प्रो. शुकूर जैसी बातें दोहराते हैं कि उर्दू के सारे प्रोफ़ेसर सेवानिवृत्त हो चुके, इसलिए पीएचडी की प्रवेश परीक्षा में उर्दू शामिल नहीं थी.

वो कहते हैं, ‘उर्दू प्रोग्राम को रद्द नहीं किया गया, कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर यहां 4 टीचर हैं, जो पीजी के छात्रों को पढ़ा रहे हैं.’ बहाली की बात पर कहते हैं, ‘ये काम राज्य सरकार का है, मैं बस ये कह सकता हूं कि बहाली के बाद पीएचडी शुरू हो जाएगी.’

कुल मिलाकर परमानेंट फैकल्टी की ग़ैर-मौजूदगी में राज्य सरकार को ज़िम्मेदार ठहराते हुए जहां बताया जा रहा है कि पार्ट टाइम स्टाफ के सहारे उर्दू की गाड़ी जैसे-तैसे खींची जा रही है.

वहीं, नाम न छापने की शर्त पर एक कॉन्ट्रैक्ट टीचर ने कहा कि इसे आप उर्दू माध्यम की पहली यादगार यूनिवर्सिटी कह सकते हैं, लेकिन अब यहां उर्दू पर कोई तवज्जो नहीं है.

उनका कहना है, ‘पीएचडी की छोड़िए, यहां तो एमए उर्दू की क्लास भी नहीं हो रही.’ उनका ये भी दावा है कि उर्दू विभाग में सेवानिवृत्त प्रोफेसर आज भी अमल-दख़ल रखते हैं, वो विभाग में कुछ होने ही नहीं देते.

उनके लिए ‘माफ़िया’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उनका आरोप है कि यूनिवर्सिटी के मुख्य विभाग में ऐसे लोग रखे गए हैं, जिन्हें उर्दू बिल्कुल नहीं आती. पूरा विभाग ही इन प्रोफेसरों की दख़ल-अंदाजी की वजह से जर्जर हो चुका है.

उनका कहना है, ‘यूनिवर्सिटी के कॉलेजों में कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कुछ ढंग के लोग हैं, लेकिन उनको भी यहां आने नहीं दिया जा रहा. कुलपति भी हमारी बात नहीं सुनते.’

उनकी मानें तो यहां उर्दू का पतन हो चुका है और नॉन उर्दू प्रोफेसर की की देख-रेख में विभाग को चलाने का बस नाटक किया जा रहा है.

इस तरह के तमाम आरोप-प्रत्यारोप के बीच जहां सरकार की लापरवाही की बात कही जा रही है, वहीं ज़्यादा हैरत नहीं होनी चाहिए कि इस प्रवेश परीक्षा में हिंदी को शामिल नहीं किए जाने पर कहीं से कोई सवाल तक नहीं उठाया गया.

कॉन्ट्रैक्ट शिक्षक का कहना है कि यहां दूसरे विश्वविद्यालय भी हैं, इसलिए छात्रों के लिए अलग से ये कोई मुद्दा नहीं है. उनको शिकायत है कि जाने क्यों भाषाओं को लेकर काम करने वाली संस्थाएं भी चुप हैं.

उनका कहना है, ‘आख़िर ये नौबत ही क्यों आई कि परमानेंट फैकल्टी के रहते बहाली नहीं हुई, विभाग उस समय क्या कर रहा था, क्या अपने लोगों को कॉन्ट्रैक्ट बहाली की सौगात बांट रहा था?’

उनकी मानें तो देश के किसी और शैक्षणिक संस्था में ऐसा कुछ हो जाए तो कम से कम आवाज़ तो उठती ही है, लेकिन यहां तो हिंदी-हिंदी करने वाली केंद्र सरकार को भी हमारी ख़बर नहीं है, फिर उर्दू के साथ विश्वविद्यालय और राज्य सरकार की लापरवाही पर कौन बोलेगा?

बहरहाल, उर्दू माध्यम की पहली यादगार यूनिवर्सिटी के बारे में अब तक कहीं से कोई ताक़तवर या सामूहिक आवाज़ सुनाई नहीं पड़ी है, और बताया जा रहा है कि धीरे-धीरे विश्वविद्यालय की उर्दू पहचान को मिटाने की कोशिशें भी जारी हैं.

एक रिपोर्ट के मुताबिक़, ऐसे तो ये कोशिश देश की आजादी के साथ ही शुरू हो गई थी, जब यहां शिक्षा के माध्यम को बदलकर अंग्रेजी कर दिया गया, और अब हाल के दिनों में विश्वविद्यालय के लोगो से अरबी और उर्दू को हटाकर तेलुगू और हिंदी को जगह दी गई है.

बता दें कि देशभक्ति की भावना ने इस विश्वविद्यालय को जन्म दिया था, और इसे ब्रिटिश इंडिया में विदेशी भाषा के वर्चस्व के खिलाफ विद्रोह की यादगार भी कहा जाता है.

शायद इसलिए यहां उच्च शिक्षा के लिए माध्यम के तौर पर उर्दू को अपनाने पर रबींद्रनाथ टैगोर ने लिखा था कि ‘मैं इस दिन की प्रतीक्षा कर रहा था, जब विदेशी भाषा के बंधनों से मुक्त होकर हमारी शिक्षा हमारे लोगों के लिए स्वाभाविक रूप से सुलभ हो जाएगी… बहुत ख़ुशी हुई कि उर्दू को एक माध्यम के तौर पर अपनाया जा रहा है.’

ऐसे में बस कल्पना कीजिए कि जिस विश्वविद्यालय की बुनियाद में उर्दू हो, वहां उर्दू के ओहदे भी ख़ाली पड़े हैं और इस पर एक-आध स्थानीय ख़बरों के अलावा कहीं कोई बात नहीं की जा रही है.

इतिहास

यहां ज़रूरी लगता है कि सरकार, विश्वविद्यालय और शायद आम लोगों को भी सरसरी तौर पर इसके गौरवशाली इतिहास की याद दिलाई जाए. इस सिलसिले में मजीद बेदार, मुजीबुल इसलाम, हसनुद्दीन अहमद और यहां एक समय में रेफरेंस लाइब्रेरियन की हैसियत से काम कर चुके मुस्तफ़ा अली ख़ान फ़ातिमी की किताबें बताती हैं कि हैदराबाद में 1873 से ही विश्वविद्यालय के स्थापना की कोशिशें हो रही थीं.

फिर 1894 में निज़ाम कॉलेज जहां अंग्रेज़ी माध्यम से शिक्षा दी जा रही थी, के दीक्षांत समारोह में एक बार फिर इस विश्वविद्यालय स्थापना की बात कही गई और 1914 में इसने आंदोलन का रूप ले लिया.

उसी समय अंग्रेज़ी और जर्मन जैसी भाषाओं के पठन सामग्री के उर्दू अनुवाद के मामले पर भी विचार-विमर्श शुरू हो गया था.

सर्वविदित है कि हैदराबाद के निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान ने इस विश्वविद्यालय की स्थापना की थी, लेकिन इसके पीछे बाबा-ए-उर्दू मौलवी अब्दुल हक़ और सर अकबर हैदरी जैसे कई दूसरे लोगों की सोच और कोशिशें शामिल थीं.

ग़ौरतलब है कि उस समय शिक्षाविदों का ये मानना था कि 1835 के आसपास अंग्रेज़ी को शिक्षा का माध्यम बनाकर ग़लती की गई थी, इसलिए इसके नतीजे अच्छे नहीं आ रहे थे और छात्र अपने विषयों में अच्छा नहीं कर रहे थे. इस तरह की बातों और दलीलों से सहमत होते हुए शिक्षा मंत्री सर रास मसूद ने हैदर की दरख़्वास्त को अपनी अनुशंसा के साथ 24 अप्रैल 1917 को निज़ाम हैदराबाद के सामने पेश किया.

इसके बाद 26 अप्रैल 1917 को निज़ाम ने विश्वविद्यालय के स्थापना को मंज़ूरी देते हुए कहा कि इस विश्वविद्यालय का सिद्धांत ये होना चाहिए कि यहां उच्च शिक्षा का माध्यम उर्दू भाषा हो और एक भाषा के तौर पर अंग्रेज़ी की शिक्षा हर छात्र के लिए अनिवार्य की जाए.

इस तरह देश में पहली बार उर्दू माध्यम के साथ उस्मानिया यूनिवर्सिटी की स्थापना हुई. 28 अगस्त 1919 को नवाब सदर यार जंग ने कुलपति की हैसियत से इस विश्वविद्यालय का उद्घाटन किया और किराये की एक बिल्डिंग में इसकी शुरुआत हुई.

उल्लेखनीय है कि उस्मानिया को जहां देश का सातवां सबसे पुराना और दक्षिण भारत का तीसरा सबसे पुराना विश्वविद्यालय माना जाता है, वहीं उर्दू को हर तरह से मालामाल करने में इसका योगदान असाधारण है.

अपने समय के तमाम बड़े शिक्षाविद और साहित्यकार किसी न किसी तरह से इससे जुड़े रहे, लेकिन अब यहां एक विषय के तौर पर भी उर्दू को पढ़ाने वाले शिक्षक नदारद हैं. एक ऐसा विश्वविद्यालय जिसे उसके गौरवशाली इतिहास के कारण अलग से कोई विशिष्ट पहचान दी जानी चाहिए थी, विडंबना ही है कि आज यहां उर्दू और हिंदी जैसी भाषा के लिए आवाज़ उठाने वाला भी कोई नहीं है.