मणिपुर पर किताब के प्रकाशन से पहले मंज़ूरी लेने संबंधी सरकारी आदेश को अदालत में चुनौती

बीते वर्ष मणिपुर पर लिखित एक किताब पर विवाद खड़ा होने के बाद राज्य की भाजपा सरकार ने आदेश जारी किया था कि मणिपुर को लेकर लिखी गई किसी भी किताब के प्रकाशन से पहले एक समिति कि मंज़ूरी लेनी होगी. इस आदेश के ख़िलाफ़ एक पत्रकार ने मणिपुर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की है.

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(प्रतीकात्मक फोटो साभार: अभी शर्मा/CC BY 2.0)

बीते वर्ष मणिपुर पर लिखित एक किताब पर विवाद खड़ा होने के बाद राज्य की भाजपा सरकार ने आदेश जारी किया था कि मणिपुर को लेकर लिखी गई किसी भी किताब के प्रकाशन से पहले एक समिति कि मंज़ूरी लेनी होगी. इस आदेश के ख़िलाफ़ एक पत्रकार ने मणिपुर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की है.

मणिपुर हाईकोर्ट. (फोटो: hcmimphal.nic.in)

इंफाल: वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप फंजौबम ने एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की है, जिसमें राज्य की एन. बीरेन सिंह के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के उस आदेश की वैधता को चुनौती दी गई है, जिसके तहत एक समिति द्वारा मंजूरी दिए जाने से पहले मणिपुर पर लिखी किसी भी किताब के प्रकाशन पर रोक लगा दी गई है.

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, सरकार द्वारा याचिका पर अपना जवाब प्रस्तुत किए जाने में विफल रहने पर और 23 जनवरी को अदालत से समय की मांग करने पर मणिपुर हाईकोर्ट ने इसे 13 फरवरी तक का समय दिया है.

इससे पहले 28 अक्टूबर 2022 को प्रदीप ने शिक्षा और कानून मंत्री टीएच बसंता, जो 15 सदस्यीय समिति के प्रमुख भी हैं, को पत्र लिखा था और उनसे आदेश वापस लेने का आग्रह किया था.

उन्होंने लिखा था कि कोई पुस्तक या प्रकाशित शोध कार्य राज्य की झूठी और अपमानजनक छवि प्रस्तुत करता है तो लेखकों और प्रकाशकों को दंडित करने के और भी वैध तरीके हैं, जैसे कि किताब को बाजार से हटाना.

जब उन्हें सरकार से कोई जवाब नहीं मिला तो उन्होंने अदालत का रुख किया.

13 सितंबर, 2022 के आदेश में यह अनिवार्य किया गया था कि राज्य के इतिहास, संस्कृति, परंपरा और भूगोल पर सभी पुस्तकों को प्रकाशित होने से पहले समिति द्वारा मंजूरी ली जाए. यह आदेश वीवा बुक्स द्वारा सेवानिवृत्त सीआरपीएफ ब्रिगेडियर सुशील कुमार शर्मा द्वारा लिखित पीएचडी थीसिस पर आधारित एक पुस्तक प्रकाशित करने के बाद यह आया था.

‘द कॉम्प्लेक्सिटी कॉल्ड मणिपुर: रूट्स, परसेप्शन एंड रियलिटी’ नामक किताब में दावा किया गया था कि भारत में विलय होने के समय मणिपुर की रियासत में केवल 700 वर्ग मील घाटी क्षेत्र शामिल था. इसका मतलब था कि नगा, कुकी और अन्य जनजातियों वाले राज्य के पहाड़ी क्षेत्र कभी भी मणिपुर का हिस्सा नहीं थे.

इस पुस्तक ने विवाद खड़ा कर दिया था और नागरिक समूहों ने इस पर प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ लेखक और उनके शोध में शामिल मार्गदर्शकों से माफी मांगने की मांग की थी, जिसमें मणिपुर विश्वविद्यालय के एक सेवानिवृत्त प्रोफेसर भी शामिल थे.

दिवंगत ब्रिगेडियर पूर्वोत्तर राज्य में प्रतिनियुक्ति पर थे.