भारत

गोरख पांडे: इस दुनिया को जितनी जल्दी संभव हो, बदल देना चाहिए…

पुण्यतिथि विशेष: गोरख पांडे कहते थे कि उनके लिए कविता और प्रेम ही दो ऐसी चीजें थीं, जहां व्यक्ति को मनुष्य होने का बोध होता है. भावनाओं को वे अस्तित्व की निकटतम अभिव्यक्ति मानते थे.

गोरख पांडे. (फोटो साभार: कविता कोश)

हवा का रुख कैसा है, हम समझते हैं/ हम उसे पीठ क्यों दे देते हैं, हम समझते हैं/ हम समझते हैं खून का मतलब/ पैसे की कीमत हम समझते हैं/क्या है पक्ष में, विपक्ष में क्या है, हम समझते हैं/ हम इतना समझते हैं/ कि समझने से डरते हैं और चुप रहते हैं.

चुप्पी का मतलब भी हम समझते हैं/ बोलते हैं तो सोच-समझकर बोलते हैं हम/ हम बोलने की/ आजादी का/ मतलब समझते हैं/ टुटपुंजिया नौकरी के लिए/आजादी बेचने का मतलब हम समझते हैं/मगर हम क्या कर सकते हैं/ अगर बेरोजगारी अन्याय से/तेज दर से बढ़ रही है/ हम आजादी और बेरोजगारी दोनों के/खतरे समझते हैं/ हम खतरों से बाल-बाल बच जाते हैं/हम समझते हैं/ हम क्यों बच जाते हैं, यह भी हम समझते हैं.

….वैसे हम अपने को किसी से कम/ नहीं समझते हैं/हर स्याह को सफेद और/ सफेद को स्याह कर सकते हैं/….करने को तो हम क्रांति भी कर सकते हैं/…लेकिन हम समझते हैं/ कि हम कुछ नहीं कर सकते हैं/ हम क्यों कुछ नहीं कर सकते हैं/ यह भी हम समझते हैं.

इस प्रतिगामी समय में देश में ‘समझदारों’ की जो हालत हो गई है, उसके मद्देनजर स्मृति शेष गोरख पांडे का लिखा समझदारों का यह गीत आज उनके वक्त से कहीं ज्यादा ‘प्रासंगिक’ और चर्चित होना चाहिए था. लेकिन ऐसा नहीं है तो उन्हीं के शब्दों में कहें तो हमें यह भी समझते हैं कि ऐसा क्यों नहीं है.

अलबत्ता, हम आज तक यह नहीं समझ पाए हैं कि अपनी जनता को ‘आएंगे, अच्छे दिन आएंगे/गर्दिश के दिन ये कट जाएंगे/ सूरज झोपड़ियों में चमकेगा/बच्चे सब दूध में नहाएंगे’ कहकर आश्वस्त करते रहने वाले उनके जैसे जनवादी क्रांतिकारी कवि ने 34 साल पहले 1989 में आज के ही दिन अकस्मात अपनी बीमारी से हार क्यों मान ली थी?

निस्संदेह, रिसर्च एसोसिएट के तौर पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के झेलम हॉस्टल में रहते हुए वे सिजोफ्रेनिया से बेतरह त्रस्त हो चले थे और वह धीरे-धीरे उनके अस्तित्व से खेलने लगी थी. बीबीसी की एक रिपोर्ट की मानें, तो इसी दौरान इलाज के सिलसिले में डॉक्टर ने उन्हें बिजली का झटका देकर तीमारदारों को हिदायत दी कि वे उनके होश में आने पर इस बारे में उन्हें कुछ न बताएं.

लेकिन, वे जैसे ही होश में आये, पूछने लगे कि डॉक्टर ने उन्हें लिटाने के बाद क्या किया था और तीमारदारों ने उनके सवाल का चुप्पी से जवाब दिया तो खुद ही निष्कर्ष निकाल लिया था कि डाॅक्टर ने उन्हें बिजली का झटका दिया होगा. इसके बाद उनकी आंखों के आगे निराशा का जाने कैसा अंधेरा छाया कि उन्होंने हॉस्टल के अपने कमरे में ही आत्महत्या कर ली.

ऐसा भी नहीं कि इससे पहले 1945 में उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के पंडित मुड़ेरवा गांव में जन्म और पढ़ाई के सिलसिले में बनारस पहुंचने तक के उनके रास्ते में गलीचे बिछे रहे हों या कि हताशा व निराशा के क्षण आए ही नहीं हों. इस बात को 18 मार्च, 1976 को उनके द्वारा अपनी डायरी में लिखे उस अंश से समझा जा सकता है, जिसमें उन्होंने लिखा है कि ‘मैं बनारस तत्काल छोड़ देना चाहता हूं. तत्काल! मैं यहां बुरी तरह ऊब गया हूं. विभाग, लंका, छात्रावास लड़कियों पर बेहूदा बातें. राजनीतिक मसखरी. हमारा हाल बिगड़े छोकरों-सा हो गया है. लेकिन, क्या फिर हमें, खासकर मुझे, जीवन के प्रति पूरी लगन से सक्रिय नहीं होना चाहिए? …दिल्ली में अगर मित्रों ने सहारा दिया, तो हमें चल देना चाहिए. मैं यहां से हटना चाहता हूं. बनारस से कहीं और भाग जाना चाहता हूं.’

साफ है कि तब वे मुश्किलों से हार मानने या उनके समक्ष आत्मसमर्पण करने के बारे में नहीं उनकी निगाह बचाकर कहीं और भाग जाने के बारे में सोच रहे थे. तो क्या 29 जनवरी, 1989 को उनकी निराशा यह सोचकर चरम पर जा पहुंची थी कि बनारस की स्थितियों से भागकर तो वे दिल्ली चले आए लेकिन अब सिजोफ्रेनिया से भागकर कहां और कैसे जाएंगे?

हम आज तक अंदाजे लगाने को ही अभिशप्त हैं. इस कारण और कि अपने कविकर्म में वे कोरी भावुकता, उदासी और मायूसी के गीत गाने से सायास परहेज बरतते थे. इतना ही नहीं, अपने परिवेश की चीजों के बहाने अपने मन की बेचैनियों को कविताओं में ढालते हुए उन्हें छात्रों, व्यापारियों, किसानों, शोषितों और महिलाओं के मुद्दों से जोड़कर गुस्से से भरा क्रांतिधर्मी सृजन करते थे और ‘न उनकी हार नई है न अपनी जीत नई’ के विश्वास से भरे रहते थे.

औरतों के विरुद्ध पितृसत्ता के अमानवीय रवैये के विरुद्ध उनका आक्रोश तो सबसे बढ़कर था. उन्होंने अपनी डायरी में लिखा था कि हमें गुलाम औरत नहीं चाहिए. वह… व्यक्ति होनी चाहिए … दृढ़ होनी चाहिए. चतुर और कुशाग्र भी….ऐसी औरत इस व्यवस्था में बनी-बनाई नहीं मिलेगी. उसे विकसित करना होगा.

उनकी कविताओं की पंक्तियां हैं: ये आंखें हैं तुम्हारी/तकलीफ का उमड़ता हुआ समंदर. इस दुनिया को जितनी जल्दी संभव हो बदल देना चाहिए….गिरती है आधी दुनिया/सारी मनुष्यता गिरती है./हम जो जिंदा हैं/हम दंडित हैं.

दुनिया को जितनी जल्दी संभव हो बदल देने के उत्साह के उजाले में उनकी बीमारीजनित व्यक्तिगत निराशा के चरम पर पहुंच जाने का फिलहाल, कोई कारण रहा भी हो तो दिखता नहीं था. सिवा उनके इस तरह के ‘इकबालिया बयानों’ के कि ‘हम विचारों के स्तर पर जिससे घृणा करते हैं, भावनाओं के स्तर पर उसी से प्यार करते हैं’ या मुझे किसी को उदास करने का हक नहीं, हालांकि ऐसे हालात में खुश रहना बेईमानी है.’ अलबत्ता, उनका सवाल था कि क्या जिंदगी प्रेम का लंबा इंतजार है?

उनके निकट रहने वालों के मुताबिक, उनकी परिवर्तनकामना का कोई तोड़ नहीं था. वे चाहते थे कि चीजें बहुत तेजी से बदल जाएं और इस बदलाव के लिए हमेशा आंदोलित रहते थे. कवि भी वे किसानों-मजदूरों के आंदोलनों में हिस्सा लेते-लेते और शोषित-दमित वर्ग के लिए सोचते करते ही बने थे. उनकी कविता नक्सलवाड़ी किसान विद्रोह की कोख से जन्मी थी और वे कहते थे कि उनके तई कविता और प्रेम ही दो ऐसी चीजें थीं, जहां व्यक्ति को मनुष्य होने का बोध होता है. भावनाओं को वे अस्तित्व की निकटतम अभिव्यक्ति मानते थे.

कविता की बाबत उनकी मान्यता थी कि: ‘कविता लिखना कोई बड़ा काम नहीं मगर बटन लगाना भी बड़ा काम नहीं. हां, उसके बगैर पैंट कमीज बेकार होते हैं.’ बताते हैं कि वे बलिया स्थित अपने गांव जाते तो ज्यादातर वक्त मजदूरों और शोषितों के साथ ही बिताते. पिता और परिजन नाराज होते, तो उनसे कहते, ‘क्या करेंगे इतने खेतों का? बराबरी में बांट दीजिए गांव के लोगों को.

दोगलापन उनसे न व्यवस्था में बर्दाश्त होता था, न ही राजनीतिक व व्यक्तिगत जीवन में. इसीलिए देश में समाजवाद का नाम लेकर समाजवाद की राह दुश्वार करने वाली राजनीति शुरू हुई तो उन्होंने ‘समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई’ जैसा तीखा जनगीत दिया: समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई/हाथी से आई, घोड़ा से आई/अंगरेजी बाजा बजाई, समाजवाद…

ऐसे ही दोगलेपन से बचने के लिए वे दिल्ली में अपना जनेऊ तोड़कर अपने गांव गए तो नाराज पिता से कहा था, ‘ये धागा बांधकर दिन भर झूठ बोलता रहूं. ऐसे मेरे संस्कार नहीं.’ उन्होंने अपने मंझले भाई के उपनयन संस्कार में भी सबके बीच उसका जनेऊ तोड़ दिया था. अपनी बहुचर्चित कविता कुर्सीनामा में भी वे इस दोगलेपन पर ही बरसते हैं:

जब तक वह जमीन पर था/कुर्सी बुरी थी/ जा बैठा जब कुर्सी पर वह/ जमीन बुरी हो गई./उसकी नजर कुर्सी पर लगी थी/ कुर्सी लग गई थी/ उसकी नजर को/उसको नजरबंद करती है कुर्सी/ जो औरों को/नजरबंद करता है./….कुर्सी ही है/जो घूस और प्रजातंत्र का/हिसाब रखती है./कुर्सी खतरे में है तो प्रजातंत्र खतरे में है/कुर्सी खतरे में है तो देश खतरे में है/कुर्सी खतरे में है तो दुनिया खतरे में है/कुर्सी न बचे/तो भाड़ में जाएं प्रजातंत्र/ देश और दुनिया.

देश में जब भी स्वतंत्रता के बाद की जनांदोलनों की जाई हिंदी कविता की बात चलेगी, गोरख पांडे और उनकी कविताएं बहुत याद आएंगी. यह बात भी कि वे इस देश के ऐसी नई जिंदगी के लिए उठ खड़े होने के अभिलाषी थे, जिसमें कोई भी कायदा हिटलरी न हो:

हमारे वतन की नई जिंदगी हो,
नई जिंदगी इक मुकम्मिल खुशी हो.
नया हो गुलिस्तां नई बुलबुलें हों,
मुहब्बत की कोई नई रागिनी हो.

न हो कोई राजा, न हो रंक कोई,
सभी हों बराबर सभी आदमी हों.
न ही हथकड़ी कोई फसलों को डाले,
हमारे दिलों की न सौदागरी हो.

जुबानों पे पाबंदियां हों न कोई,
निगाहों में अपनी नई रोशनी हो.
न अश्कों से नम हो किसी का भी दामन,
न ही कोई भी कायदा हिटलरी हो.

सभी होंठ आजाद हों मयकदे में,
कि गंगो-जमन जैसी दरियादिली हो.
नए फैसले हों नई कोशिशें हों,
नई मंजिलों की कशिश भी नई हो.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)