डॉक्यूमेंट्री विवाद: एबीवीपी की मांग के बाद राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय के छात्र निलंबित

आरोप है कि बीते 26 जनवरी को अजमेर स्थित राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय में कुछ छात्रों ने बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री ‘मोदी: द इंडिया क्वेश्चन’ को देखा था. इसके बाद एबीवीपी द्वारा 24 छात्रों के नाम की सूची जारी करके हंगामा किया गया था और विश्वविद्यालय ने छात्रों को 14 दिन के लिए निलंबित कर दिया.

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राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय. (फोटो साभार: फेसबुक)

आरोप है कि बीते 26 जनवरी को अजमेर स्थित राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय में कुछ छात्रों ने बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री ‘मोदी: द इंडिया क्वेश्चन’ को देखा था. इसके बाद एबीवीपी द्वारा 24 छात्रों के नाम की सूची जारी करके हंगामा किया गया था और विश्वविद्यालय ने छात्रों को 14 दिन के लिए निलंबित कर दिया.

राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय. (फोटो साभार: फेसबुक)

नई दिल्ली: अजमेर स्थित राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय ने कम से कम 11 छात्रों को बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री इंडिया: द मोदी क्वेश्चन देखने के लिए निलंबित कर दिया. इनमें से अधिकांश मुस्लिम हैं. छात्रों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का हवाला दिया गया है.

निलंबन आदेश के अनुसार, पिछले दो दिनों (शुक्रवार और शनिवार) में शिक्षकों और अधिकारियों के निर्देशों की अवहेलना करने के साथ-साथ नामित स्थलों के अलावा अन्य स्थानों पर देर रात में इस डॉक्यूमेंट्री को प्रदर्शित करने के लिए छात्रों को निलंबित कर दिया गया है.

केंद्रीय विश्वविद्यालय के अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) अध्यक्ष विकास पाठक ने कहा कि एसएफआई और एनएसयूआई से जुड़े कुछ छात्रों ने कैंटीन के पास प्रतिबंधित डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग के लिए आमंत्रित किया था, जिसके बाद कार्रवाई की गई.

उन्होंने कहा कि 26 जनवरी को लगभग 40-50 छात्र एकत्र हुए और लैपटॉप सहित उपकरणों पर सार्वजनिक रूप से डॉक्यूमेंट्री देखने लगे.

हालांकि, विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने कहा कि छात्रों पर कार्रवाई का डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग से कोई लेना-देना नहीं है. उन्होंने कहा कि छात्रों के खिलाफ यह नियमित अनुशासनात्मक कार्रवाई है.

विश्वविद्यालय के एक अधिकारी ने नाम न छापने की इच्छा रखते हुए कहा कि ‘डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग पर कार्रवाई नहीं की गई. यह इन छात्रों के खिलाफ एक सामान्य, नियमित, अनुशासनात्मक कार्रवाई थी, जो शैक्षणिक संस्थान की एक नियमित गतिविधि है.’

विश्वविद्यालय प्रशासन ने 27 जनवरी को एक आदेश जारी कर तत्काल प्रभाव से बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया था.

उसके अनुसार ऐसी कोई भी शैक्षणिक गतिविधि, जिसमें एक जगह एकत्रित होकर सभा की आवश्यकता होती है, के लिए कुलसचिव द्वारा डीन (छात्र कल्याण) की सिफारिशों के साथ मंजूरी दी जानी चाहिए. विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रों को देर रात परिसर में नारेबाजी और आवारागर्दी नहीं करने की भी सलाह दी.

दूसरी ओर एक स्वयंसेवी संस्थान पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) ने एक बयान में कहा कि विश्वविद्यालय के विभिन्न विषयों के 10 छात्रों को कथित तौर पर बीबीसी डॉक्यूमेंट्री देखने के लिए निलंबित कर दिया गया था.

पीयूसीएल ने कहा, ‘विश्वविद्यालय से 10 छात्रों को बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री को देखने के आरोप में निलंबित कर दिया गया है. उनमें से आठ मुसलमान, एक इसाई तथा एक हिंदू हैं. 26 जनवरी 2023 को विश्वविद्यालय में फिल्म की स्क्रीनिंग नहीं हुई. मोबाइल पर उक्त फिल्म देखना एक विद्यार्थी का निजी मामला है तथा वह उनकी निजी स्वतंत्रता के हक में आता है.’

पीयूसीएल की अध्यक्ष कविता श्रीवास्तव और महासचिव अनंत भटनागर की ओर से विश्वविद्यालय के कुलपति आनंद भालेराव को लिखे पत्र में कहा गया है, ‘विश्वविद्यालय द्वारा अधिकतर अल्पसंख्यक विद्यार्थियों को निलंबित किए जाने की कार्रवाई के पीछे विद्वेषपूर्ण सांप्रदायिक मानसिकता परिलक्षित होती है. यह खेदजनक है कि इस मामले में विद्यार्थियों की कोई सुनवाई नहीं की गई, न ही मामले की कोई विधिवत जांच हुई.’

पीयूसीएल ने कहा कि यह आश्चर्यजनक है कि बिना किसी विधिवत जांच के उन्हें 15 दिन के लिए विश्वविद्यालय तथा छात्रावास से निकाल दिया गया. उसने मांग की है कि विद्यार्थियों का निलंबन आदेश तुरंत वापस लिया जाए तथा उन्हें विश्वविद्यालय तथा छात्रावास में अविलंब प्रवेश दिया जाए.

एबीवीपी द्वारा कथित तौर पर डॉक्यूमेंट्री देखने वाले 24 छात्रों की सूची जारी करने और उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग करने के बाद गठित की गई प्रॉक्टोरियल जांच के बाद छात्रों को अकादमिक और छात्रावास दोनों से 14 दिनों के लिए निलंबित कर दिया गया.

कार्रवाई का सामना करने वाले अधिकांश स्नातकोत्तर छात्र हैं, जिन्होंने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध छात्रों के निकाय एबीवीपी के दबाव में घुटने टेक दिए, जिसने गुरुवार शाम को हंगामा खड़ा किया था और उन छात्रावास में उन छात्रों के कमरों में जबरन घुसने की कोशिश की, जिन्होंने कथित तौर पर बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री देखी थी.

नाम न जाहिर करने की शर्त पर एक निलंबित छात्र ने द वायर को बताया कि आदेश एबीवीपी छात्रों द्वारा कैंपस नें तनावपूर्ण माहौल खड़ा करने के बाद जारी किए गए. उन्होंने ‘जय श्री राम’ और ‘देश के गद्दारों को, गोली मारो सा** को’ जैसे नारे लगाए थे.

छात्र ने आरोप लगाया कि जिन छात्रों को निलंबित किया गया है, उनमें से कुछ ने तो डॉक्यूमेंट्री देखने के आयोजन में हिस्सा भी नहीं लिया था.

उन्होंने कहा, ‘यह स्पष्ट है कि विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने केवल उन छात्रों को निशाना बनाया, जिनका नाम एबीवीपी की सूची में था. प्रॉक्टर ने हममें से किसी को भी हमारा पक्ष सुनने के लिए नहीं बुलाया.’

सुरक्षाकर्मियों ने शनिवार को निलंबित छात्रों को यह कहते हुए परिसर से बाहर निकाल दिया कि वे तब तक विश्वविद्यालय परिसर में नहीं रह सकते जब तक उनकी निलंबन अवधि समाप्त नहीं हो जाती.

बता दें कि बीबीसी ने दो भागों वाली डॉक्यूमेंट्री ‘इंडिया: द मोदी क्वेश्चन’ में बताया गया है कि ब्रिटेन सरकार द्वारा करवाई गई 2002 के गुजरात दंगों की जांच (जो अब तक अप्रकाशित रही है) में नरेंद्र मोदी को सीधे तौर पर हिंसा के लिए जिम्मेदार पाया गया था.

साथ ही इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और देश के मुसलमानों के बीच तनाव की भी बात कही गई है. यह 2002 के फरवरी और मार्च महीनों में गुजरात में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा में उनकी भूमिका के संबंध में दावों की पड़ताल भी करती है, जिसमें एक हजार से अधिक लोगों की जान चली गई थी.

दो भागों की डॉक्यूमेंट्री का दूसरा एपिसोड, केंद्र में मोदी के सत्ता में आने के बाद – विशेष तौर पर 2019 में उनके दोबारा सत्ता में आने के बाद – मुसलमानों के खिलाफ हिंसा और उनकी सरकार द्वारा लाए गए भेदभावपूर्ण कानूनों की बात करता है. इसमें मोदी को ‘बेहद विभाजनकारी’ बताया है.

गौरतलब है कि देश के विभिन्न राज्यों के कैंपसों में भी डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग को लेकर विवाद जारी है.

बीते 24 जनवरी को दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के छात्रों ने आरोप लगाया था कि जब उन्होंने परिसर में डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग करने की कोशिश की तो बिजली काट दी गई. इसके बाद जेएनयू के छात्रों ने अपने लैपटॉप और मोबाइल फोन पर डॉक्यूमेंट्री देखी.

बीते 25 जनवरी को दिल्ली के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया में बीबीसी डॉक्यूमेंट्री दिखाने की योजना को लेकर एक वामपंथी समूह के सदस्यों सहित कई छात्रों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया था और कक्षाएं निलंबित कर दी गई थीं.

वाम समर्थित छात्र संगठन स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) ने दावा किया था कि दिल्ली पुलिस ने 70 से अधिक ऐसे छात्रों को हिरासत में लिया है, जो डॉक्यूमेंट्री को दिखाने की घोषणा के बाद चार छात्रों को हिरासत में लिए जाने का विरोध करने के लिए में जामिया में एकत्र हुए थे.

बीते 27 जनवरी को छात्र संगठनों के डॉक्यूमेंट्री के प्रदर्शन के आह्वान के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस में भारी पुलिस बल तैनात किया गया था. पुलिस ने नॉर्थ कैंपस में बड़ी संख्या में लोगों के जमा होने पर भी रोक लगा थी. विश्वविद्यालय में पुलिस ने 24 लोगों को हिरासत में लिया और कैंपस में धारा 144 लागू कर दी थी.

कुछ छात्रों ने आरोप लगाया था कि दिल्ली पुलिस ने आंबेडकर विश्वविद्यालय परिसर में घुसकर एसएफआई के कार्यकर्ताओं को डॉक्यूमेंट्री के प्रदर्शन से रोका. हालांकि छात्रों ने फोन और लैपटॉप पर डॉक्यूमेंट्री देखने की वैकल्पिक व्यवस्था की थी.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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